नई दिल्ली. आज का समय में सोशल मीडिया के डिजिटल कॉरिडोर से लेकर चाय की दुकानों और गलियों तक, राय बनती और बदलती रहती है, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इस बदलते माहौल की जड़ें कहां हैं? अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें, तो हमें लगभग एक सदी पीछे जाना होगा. समय का पहिया घूमा है, भारत के राजनीतिक और सामाजिक हालात बदले हैं, लेकिन एक संगठन अपनी शुरुआत से ही चर्चा, विवाद और जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS).

20 फरवरी को थिएटर में रिलीज हुई फिल्म ‘शतक’ इस पुराने जमाने को आज के नजरिए से देखने की एक गंभीर और बड़ी कोशिश है. किसी भी मुद्दे को घुमा-फिराकर पेश करने के बजाय, यह कहानी को आसान शब्दों में दर्शकों के सामने पेश करती है. यह दिखाती है कि कैसे 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर की एक छोटी सी गली में शुरू हुआ एक आइडिया दुनिया के सबसे बड़े संगठनों में से एक बन गया है. फिल्म अतीत और आज के बीच एक सीधा पुल बनाती है, जिससे यह समझ मिलती है कि आज का ‘भारत’ अतीत के संघर्षों और संकल्पों से कैसे बना है.

कहानी:
फिल्म ‘शतक’ एक ऐसे माहौल में शुरू होती है जहां सब कुछ सीमित और छोटा लगता है. वहां न तो बड़े रिसोर्स हैं, न ही कोई बड़ी इमारतें और न ही कोई बहुत बड़ी भीड़, लेकिन एक चीज जो बहुत बड़ी लगती है, वह है सोच. फिल्म की स्क्रिप्ट बहुत कंट्रोल में है. कहीं भी यह जल्दबाजी में नहीं लगती, बल्कि यह धीरे-धीरे दर्शकों को उस दौर में ले जाती है जहां एक छोटा सा बीज बोया जा रहा था.

कहानी का स्ट्रक्चर सीधा-सादा है, जो इसकी सबसे बड़ी ताकत है. डायरेक्टर आशीष मॉल ने यह पक्का किया है कि दर्शक कहानी के फैक्ट्स में उलझने के बजाय आइडियोलॉजी के सफर का अनुभव करें. फिल्म दिखाती है कि कैसे डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने कुछ ही लोगों के साथ मिलकर डिसिप्लिन और देशभक्ति जगाई. यह सिर्फ एक ऑर्गनाइजेशन की कहानी नहीं है, बल्कि एक देश को फिर से बनाने के सपने की कहानी है, जिसे ‘शतक’ बहुत ही शानदार तरीके से दिखाती है. आज हिस्टोरिकल फिल्मों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बीते हुए दौर को सही तरह से दिखाना है. ‘शतक’ इस मामले में एक नया बेंचमार्क सेट करती है. चाहे 1920 के दशक का नागपुर हो या आजादी के समय का दिल्ली और कश्मीर, हर फ्रेम को बहुत ईमानदारी और डिटेल के साथ बनाया गया है. फिल्म की टेक्निकल ताकत ही वजह है कि आप सिर्फ एक दर्शक जैसा महसूस नहीं करते, बल्कि इस हिस्टोरिकल सफर के गवाह बन जाते हैं.

किरदारों की गहराई
फिल्म में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के किरदार को जिस सादगी से दिखाया गया है, वह तारीफ के काबिल है. उन्हें एक बड़े हीरो के तौर पर दिखाने के बजाय, फिल्म उन्हें कम रिसोर्स लेकिन साफ डायरेक्शन वाले एक दूरदर्शी के तौर पर दिखाती है. स्क्रीन पर उनकी सादगी दर्शकों पर गहरा असर डालती है. जब कहानी संघ के दूसरे चालक माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी) के जमाने में आती है, तो फिल्म का टोन बदल जाता है. यह वह दौर था जब भारत आजादी की दहलीज पर था और बंटवारे की दुखद घटना से भी जूझ रहा था. गांधी की हत्या के बाद संगठन पर लगे बैन और उस समय के तनाव भरे माहौल को बहुत समझदारी से दिखाया गया है. न तो कोई शोर है और न ही बेवजह का ड्रामा. अंदर का मानसिक और वैचारिक संघर्ष किरदारों की आंखों और उनके खामोश डायलॉग के जरिए दर्शकों तक पहुंचता है.

राइटिंग और विजन
किसी भी फिल्म की जान उसकी स्क्रिप्ट होती है. नितिन सावंत, रोहित गहलोत और उत्सव दान ने जिस तरह से सौ साल के सफर को शब्दों में पिरोया है, वह कमाल का है. सब्जेक्ट मैटर सीरियस है और इसमें कई पॉलिटिकल कॉन्ट्रोवर्सी हो सकती थीं, लेकिन राइटर ने कहानी को सीधा और क्लियर रखा है, ध्यान भटकने से बचाया है. अनिल धनपत अग्रवाल का ओरिजिनल कॉन्सेप्ट इस फिल्म की रीढ़ है. उनका विजन सिर्फ किसी ऑर्गनाइजेशन की जीत दिखाना नहीं था, बल्कि एक आइडिया की कंटिन्यूटी दिखाना था. इस सफर को जीने का उनका पक्का इरादा स्क्रीन पर साफ दिखता है.

डायरेक्शन और प्रोडक्शन
फिल्म को डायरेक्ट करने में डायरेक्टर आशीष मॉल का कंट्रोल तारीफ के काबिल है. उन्होंने बहुत ज्यादा इमोशनल होने से बचा है. जहां कहानी को रुकने की जरूरत है, वहां फिल्म रुकती है और ऑडियंस को सोचने का समय देती है. प्रोड्यूसर वीर कपूर का सपोर्ट फिल्म के स्केल और प्रोडक्शन वैल्यू में साफ दिखता है. फिल्म की ईमानदारी और सब्जेक्ट के लिए सम्मान पूरी फिल्म में साफ दिखता है. इसे सेंसेशनल बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई है, इसके बजाय कहानी को नैचुरली बहने दिया गया है.

कमियां
किसी भी फिल्म की तरह ‘शतक’ में भी कुछ कमियां खटकती हैं. सबसे बड़ी चुनौती इसकी धीमी गति है. सौ साल के इतिहास को समेटने के चक्कर में कई जगह फिल्म डॉक्युमेंट्री जैसी लगने लगती है, जिससे मनोरंजन का तत्व कम हो जाता है. फिल्म में मुश्किल और विवादास्पद सवालों को गहराई से छूने के बजाय सरलता से छोड़ दिया गया है, जो गंभीर दर्शकों को अखर सकता है. इसके अलावा, CGI और VFX का बहुत ज्यादा इस्तेमाल कई बार सीन को बनावटी बना देता है, जिससे इंसानी भावनाओं का नैचुरलपन छिप जाता है. कुछ जरूरी ऐतिहासिक लोगों को स्क्रीन पर बहुत कम समय मिलता है, जिससे उनके योगदान का पूरा असर नहीं दिख पाता.

अंतिम फैसला
‘शतक’ सिर्फ एक हिस्टोरिकल फिल्म या किसी ऑर्गनाइजेशन का प्रमोशन नहीं है. यह एक ऐसी फिल्म है जो विश्वास, सब्र और कमिटमेंट की ताकत को सलाम करती है, जो शोर मचाने के बजाय चुपचाप काम करने में यकीन रखती है. हालांकि फिल्म मुश्किल सवालों से बच सकती है, लेकिन यह एक देश बनाने के लिए जरूरी बुनियादी जवाबों को मजबूती से समझती है. फिल्म के आखिरी सीन तक, दर्शक न सिर्फ पहले पचास से सौ साल के इतिहास को समझता है, बल्कि उसे महसूस भी करता है. कुल मिलाकर देखा जाए तो आप इस फिल्म को अपने पूरे परिवार के साथ देख सकते हैं. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3 स्टार.



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