WhatsApp Block Smartphone Device: देश में तेजी से बढ़ते डिजिटल अरेस्ट स्कैम पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक व्यापक रणनीति पेश की है, जिसमें मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp की भूमिका को भी अहम माना गया है. सरकार ने अदालत को बताया है कि व्हाट्सएप ऐसे मामलों में केवल अकाउंट ही नहीं, बल्कि डिवाइस आईडी को भी ब्लॉक करने की संभावना पर विचार करने को तैयार हो गया है. यह कदम साइबर ठगों के उस तरीके को रोकने के लिए अहम माना जा रहा है, जिसमें वे बार-बार सिम और अकाउंट बदलकर एक ही फोन से धोखाधड़ी करते रहते हैं.
मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 12 मई को होनी है, जहां चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत (CJI Surya Kant) की अध्यक्षता वाली पीठ गृह मंत्रालय की ओर से दाखिल स्टेटस रिपोर्ट पर विचार करेगी. इस रिपोर्ट में चार प्रमुख क्षेत्रों (प्लेटफॉर्म जवाबदेही, बैंकिंग सुरक्षा, सिम ट्रेसबिलिटी और पीड़ितों के मुआवजे के लिए कानूनी ढांचे) पर विस्तृत एक्शनप्लान पेश की गई है. यह पूरा मामला तब सुर्खियों में आया था, जब हरियाणा के अंबाला की 73 वर्षीय महिला ने शिकायत की कि ठगों ने खुद को CBI (Central Bureau of Investigation) अधिकारी बताकर और फर्जी अदालत आदेश दिखाकर उनसे एक करोड़ रुपये से अधिक की ठगी कर ली. इसके बाद अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए दिसंबर में एक इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (IDC) का गठन किया था.
व्हाट्सएप के प्रस्तावित कदम
सरकार के मुताबिक, व्हाट्सएप ने यह भी सहमति जताई है कि वह डिलीट किए गए अकाउंट्स का डेटा कम से कम 180 दिनों तक सुरक्षित रखेगा, ताकि जांच एजेंसियों को डिजिटल सबूत जुटाने में मदद मिल सके. इसके अलावा प्लेटफॉर्म ने फर्जी प्रोफाइल की पहचान के लिए लोगो-मैचिंग सिस्टम, संदिग्ध मैसेज पर चेतावनी, अनजान नंबरों के लिए अकाउंट की उम्र दिखाना और हाई-रिस्क इंटरएक्शन में प्रोफाइल फोटो छिपाने जैसे फीचर्स लागू किए हैं. सरकार ने अदालत को बताया कि जनवरी से शुरू हुए 12 हफ्तों में व्हाट्सऐप ने 9,400 से अधिक ऐसे अकाउंट्स पर कार्रवाई की, जो डिजिटल अरेस्ट घोटालों से जुड़े थे. जांच में सामने आया कि इन घोटालों का बड़ा हिस्सा दक्षिण-पूर्व एशिया, खासकर कंबोडिया में संचालित संगठित साइबर गिरोहों से जुड़ा है. ठग अक्सर दिल्ली पुलिस, CBI या ATS Department जैसे नाम और आधिकारिक लोगो का इस्तेमाल कर लोगों को डराते हैं.
बैंकिंग और मनी ट्रेल पर सख्ती
स्टेटस रिपोर्ट में Reserve Bank of India द्वारा तैयार एक SOP को भी लागू करने की सिफारिश की गई है. इसके तहत संदिग्ध खातों पर अस्थायी रोक (डेबिट फ्रीज), बैंकों के बीच त्वरित समन्वय और धोखाधड़ी की रकम वापस करने के लिए प्रायरिटी सिस्टम शामिल है. सरकार चाहती है कि यह व्यवस्था पूरे देश में एक समान तरीके से लागू हो. इसके साथ ही मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में Prevention of Money Laundering Act (PMLA) के प्रावधानों के इस्तेमाल को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश मांगे गए हैं, ताकि साइबर धोखाधड़ी से जुड़े लेन-देन पर कड़ी निगरानी रखी जा सके.
सिम ट्रेसबिलिटी और बायोमेट्रिक सिस्टम
सरकार ने Department of Telecommunications को निर्देश देने की मांग की है कि वह यूजर पहचान से जुड़े नियमों को लागू करे और बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन सिस्टम शुरू करे. इससे सिम कार्ड जारी करने की प्रक्रिया पर नजर रखी जा सकेगी और धोखाधड़ी में इस्तेमाल होने वाले नंबरों को जल्दी ट्रैक और बंद किया जा सकेगा. हालांकि, विशेषज्ञों ने इस पर चिंता भी जताई है. उनका कहना है कि बायोमेट्रिक सिस्टम से उन लोगों को परेशानी हो सकती है, जिनके फिंगरप्रिंट स्पष्ट नहीं होते, और इसके दुरुपयोग की आशंका भी बनी रहती है.
मुआवजे का अभाव और बढ़ते मामले
स्टेटस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साइबर धोखाधड़ी के पीड़ितों के लिए अभी कोई स्पष्ट मुआवजा ढांचा नहीं है. 2024 में ऐसे मामलों में 206% की बढ़ोतरी हुई और कुल नुकसान 22,845 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जबकि 22 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए. सरकार ने कानून मंत्रालय से इस पर स्पष्ट रुख मांगने की अपील की है. केंद्र सरकार की यह पहल डिजिटल अरेस्ट जैसे उभरते साइबर अपराधों के खिलाफ एक समन्वित और सख्त ढांचा तैयार करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है. हालांकि, इसके साथ ही गोपनीयता, नियामक प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों को लेकर बहस भी तेज हो गई है, जो आने वाले समय में इस नीति के स्वरूप को तय करेगी.