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गोंडा का देसी खाना बना इंटरनेशनल स्टार, हर महीने विदेश जा रही बाटी, जानिए

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उत्तर प्रदेश का पारंपरिक स्वाद अब दुनिया भर में अपनी पहचान बना रहा है. गोंडा जिले का मशहूर ‘बाबा बाटी चोखा’ इसका शानदार उदाहरण है, जो अब सऊदी अरब तक पहुंच चुका है. मिट्टी के चूल्हे की सोंधी खुशबू और पारंपरिक तरीके से तैयार इस देसी व्यंजन ने 25 साल की मेहनत के बाद लोकल से ग्लोबल तक का सफर तय कर लिया है.

Baba Bati Chokha Gonda: उत्तर प्रदेश के पारंपरिक खान-पान का जादू अब केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सात समंदर पार भी अपनी चमक बिखेर रहा है. गोंडा जिले के बहराइच रोड स्थित मशहूर ‘बाबा बाटी चोखा’ ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाते हुए सऊदी अरब तक का सफर तय कर लिया है. मिट्टी के चूल्हे की सोंधी महक और सिलबट्टे पर पिसी चटनी के संगम से तैयार यह देसी व्यंजन अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डिमांड में है. 25 सालों के संघर्ष और स्वाद के प्रति समर्पण ने आज इस छोटे से ठिकाने को ग्लोबल ब्रांड बना दिया है.

गोंडा के बहराइच रोड पर स्थित बाबा बाटी चोखा के संचालक श्रीराम पांडेय बताते हैं कि उनके हाथ के बने बाटी-चोखा की मांग अब सऊदी अरब जैसे देशों में भी होने लगी है. लोकल 18 से खास बातचीत में उन्होंने साझा किया कि पहले यह स्वाद केवल स्थानीय लोगों और आसपास के क्षेत्रों तक ही सीमित था, लेकिन एक ग्राहक के माध्यम से यह विदेशों तक पहुंचा.

गोंडा का एक युवक, जो पहले यहां नियमित रूप से बाटी खाता था, जब सऊदी अरब में नौकरी के लिए गया, तो वह अपने साथ यहां की बाटी ले गया. वहां के लोगों को इसका स्वाद इतना पसंद आया कि अब हर महीने यहां से लगभग 50 बाटी विशेष रूप से सऊदी अरब भेजी जाती हैं.

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इस दुकान की नींव करीब 24 से 25 साल पहले पड़ी थी. श्रीराम पांडेय याद करते हुए बताते हैं कि शुरुआत में वे एक चाय की दुकान चलाते थे. पास की एक बाटी की दुकान बंद होने के बाद उन्होंने खुद इस कला में हाथ आजमाया और आज नतीजा सबके सामने है. जिस बाटी-चोखा की शुरुआत कभी 3 रुपये प्रति जोड़े से हुई थी, आज उसकी गुणवत्ता और लोकप्रियता के कारण उसकी कीमत 15 रुपये प्रति पीस है. बाटी को खास बनाने के लिए इसमें सत्तू के साथ 14 से 16 प्रकार के गुप्त मसालों का मिश्रण उपयोग किया जाता है.

बाबा बाटी चोखा की सबसे बड़ी विशेषता इसका शुद्ध और पारंपरिक तरीका है. चोखा तैयार करते समय श्रीराम पांडेय उसमें हाथ का स्पर्श नहीं करते, बल्कि लकड़ी के ‘मुकद्दर’ का उपयोग करके उसे तैयार करते हैं. इसके अलावा, स्वाद को दोगुना करने वाली चटनी आज भी सिलबट्टे पर ही पीसी जाती है, किसी मशीन का प्रयोग नहीं होता. ग्राहकों को बाटी-चोखा ‘पारस’ के पत्तों पर परोसा जाता है, जो इसके स्वाद में प्राकृतिक सोंधापन भर देता है.

शुद्धता और स्वाद के इसी मेल के कारण आज इस दुकान से प्रतिदिन 3 से 4 हजार रुपये की कमाई हो रही है. मिट्टी के चूल्हे पर धीमी आंच में पकी बाटी और ताज़ा तैयार किया गया मसालेदार चोखा न केवल भूख मिटाता है, बल्कि लोगों को अपनी जड़ों से भी जोड़े रखता है. श्रीराम पांडेय का यह व्यवसाय आज छोटे स्तर के उद्यमियों के लिए एक प्रेरणा बन चुका है कि कैसे एक स्थानीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय पहचान पा सकता है.



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