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खट्टा-मीठा स्वाद जो भूल न पाएंगे! पहाड़ों में सूखे आम से बनती है लाजवाब चटनी

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Dry Mango Amchoor Chutney Recipe: उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सूखे आम की चटनी यानी अमचूर की चटनी न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाती है, बल्कि सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद मानी जाती है. पहाड़ी रसोई में अमचूर की यह चटनी सिर्फ स्वाद का तड़का नहीं, बल्कि हाजमे की रामबाण दवा भी मानी जाती है. गुड़ की मिठास, हींग की खुशबू और भुने जीरे का तीखापन इस चटनी को इतना लजीज बना देता है कि लोग दाल-भात और पराठों के साथ इसे बड़े चाव से खाते हैं. सबसे खास बात यह है कि बिना फ्रिज के भी यह हफ्तों तक खराब नहीं होती.

उत्तराखंड की पारंपरिक रसोई में सूखे आम की चटनी, जिसे खटाई या अमचूर की चटनी कहा जाता है, खास स्थान रखती है. यह चटनी अपने खट्टे, मीठे और हल्के तीखे स्वाद के कारण लोगों की पसंदीदा मानी जाती है. पहाड़ों में पुराने समय से इसे घरों में बनाया जाता रहा है. खासतौर पर सर्दियों के मौसम या आम के सीजन खत्म होने के बाद इसका अधिक उपयोग किया जाता है. यह चटनी दाल-भात, पराठे, रोटी और पहाड़ी व्यंजनों के साथ बेहद स्वादिष्ट लगती है. स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ यह लंबे समय तक सुरक्षित भी रहती है.

गृहणी विमला दानू बताती है कि अमचूर की चटनी बनाने के लिए सबसे पहले सूखे आम यानी अमचूर के टुकड़ों का उपयोग किया जाता है. लगभग 100 से 150 ग्राम सूखे आम के टुकड़ों को अच्छी तरह धोकर 2 से 3 घंटे तक गर्म पानी में भिगोया जाता है. इससे आम नरम हो जाते हैं, उनका स्वाद भी अच्छे से निकलता है. पुराने समय में गर्मियों में आम को सुखाकर पूरे साल के लिए सुरक्षित रखा जाता था. यही सूखे आम बाद में चटनी और अन्य व्यंजनों में इस्तेमाल किए जाते थे. पहाड़ों में यह तरीका आज भी अपनाया जाता है. प्राकृतिक स्वाद और लंबे समय तक सुरक्षित रहने के कारण लोग बाजार के तैयार मसालों की बजाय पारंपरिक अमचूर को अधिक पसंद करते हैं.

जब सूखे आम के टुकड़े नरम हो जाते हैं, तब उन्हें पानी सहित कड़ाही में डालकर पकाया जाता है. इसमें स्वादानुसार गुड़ मिलाया जाता है, जिससे चटनी में खट्टेपन के साथ हल्की मिठास भी आ जाती है. इसके बाद भुना जीरा पाउडर, काला नमक, लाल मिर्च, हींग और थोड़ा गरम मसाला डाला जाता है. ये मसाले चटनी के स्वाद को और खास बना देते हैं. कुछ लोग इसमें सूखी लाल मिर्च भी डालते हैं ताकि तीखापन बढ़ सके. पहाड़ों में हर घर की चटनी का स्वाद थोड़ा अलग होता है क्योंकि लोग अपने स्वाद के अनुसार मसाले मिलाते हैं. <span style=”color: currentcolor;”>अमचूर की चटनी को धीमी आंच पर पकाया जाता है ताकि उसका स्वाद अच्छी तरह तैयार हो सके. जब मिश्रण धीरे-धीरे उबलने लगता है, तब गुड़ और मसाले आम के साथ अच्छे से मिल जाते हैं. इससे चटनी में खास खुशबू और स्वाद आता है. ग्रामीण महिलाएं बताती हैं कि जल्दी पकाने की बजाय धीमी आंच पर पकाई गई चटनी ज्यादा स्वादिष्ट बनती है. कुछ देर बाद चटनी गाढ़ी हो जाती है और तैयार हो जाती है. इसके बाद इसे ठंडा करके कांच के जार में भरकर रखा जाता है. यह कई दिनों तक खराब नहीं होती. पहाड़ों में यह पारंपरिक तरीका वर्षों से अपनाया जा रहा है और आज भी लोग उसी स्वाद को पसंद करते हैं.</span>

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उत्तराखंड में अमचूर की चटनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की परंपरा भी काफी पुरानी है. चटनी तैयार होने के बाद इसे पूरी तरह ठंडा किया जाता है और फिर साफ कांच के एयरटाइट जार में भरकर रखा जाता है. इससे चटनी कई दिनों तक खराब नहीं होती. पहाड़ी क्षेत्रों में पहले फ्रिज की सुविधा नहीं होने के कारण लोग ऐसे पारंपरिक तरीकों से खाद्य पदार्थ सुरक्षित रखते थे. गुड़ और मसाले भी चटनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करते हैं. ग्रामीण परिवार अक्सर एक बार में अधिक मात्रा में चटनी बनाकर रखते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर आसानी से उपयोग किया जा सके.

सूखे आम की चटनी केवल स्वाद बढ़ाने वाली चीज नहीं बल्कि सेहत के लिए भी फायदेमंद मानी जाती है. अमचूर में विटामिन और पाचन में मदद करने वाले गुण पाए जाते हैं. वहीं जीरा, हींग और काला नमक जैसे मसाले पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में मदद करते हैं. ग्रामीण लोग भारी भोजन के साथ इस चटनी का सेवन करना पसंद करते हैं. इससे खाना जल्दी पचता है और स्वाद भी बढ़ जाता है. गुड़ मिलाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है. पहाड़ों में पारंपरिक खानपान में ऐसे कई व्यंजन शामिल हैं, जो स्वाद और स्वास्थ्य दोनों का ध्यान रखते हैं. <span style=”color: currentcolor;”>उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में अमचूर की चटनी बनाने का तरीका थोड़ा अलग देखने को मिलता है. कहीं इसमें ज्यादा गुड़ डाला जाता है तो कहीं तीखापन बढ़ाने के लिए सूखी लाल मिर्च का इस्तेमाल किया जाता है. कुछ लोग इसमें धनिया पाउडर या सौंफ भी मिलाते हैं. पहाड़ों में हर घर की रसोई का स्वाद अलग होता है और यही खासियत इस चटनी में भी दिखाई देती है. ग्रामीण महिलाएं अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार चटनी तैयार करती हैं. शादी-ब्याह और विशेष अवसरों पर भी यह चटनी भोजन के साथ परोसी जाती है. स्थानीय लोग इसे पारंपरिक स्वाद और पहाड़ी संस्कृति से जुड़ी खास पहचान मानते हैं. यही वजह है कि इसकी लोकप्रियता लगातार बनी हुई है.</span>

आधुनिक फास्ट फूड और बाजार की चटनियों के दौर में भी उत्तराखंड की पारंपरिक अमचूर चटनी लोगों को खूब पसंद आ रही है. खासकर नई पीढ़ी अब पारंपरिक व्यंजनों की ओर फिर से आकर्षित हो रही है. सोशल मीडिया और स्थानीय मेलों में भी पहाड़ी खानपान को बढ़ावा मिल रहा है. कई लोग घर पर पुरानी रेसिपी सीखकर यह चटनी बना रहे हैं. स्थानीय बाजारों में भी पारंपरिक पहाड़ी चटनियों की मांग बढ़ी है. ग्रामीण महिलाएं इसे घरेलू उत्पाद के रूप में बेचकर रोजगार भी प्राप्त कर रही हैं. स्वाद, स्वास्थ्य और पारंपरिक पहचान के कारण अमचूर की चटनी आज भी लोगों की पहली पसंद बनी हुई है.

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