अमेरिकी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनी Anthropic ने अपने खास साइबर सुरक्षा प्रोजेक्ट Project Glasswing का दायरा बढ़ा दिया है. अब भारत समेत 15 से अधिक देशों की चुनिंदा सरकारी और निजी संस्थाओं को इस प्रोजेक्ट का एक्सेस दिया जा रहा है.
कंपनी का दावा है कि प्रोजेक्ट ग्लासविंग दुनिया के महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर सिस्टम को सुरक्षित बनाने के लिए तैयार किया गया है. इसके तहत AI की मदद से सॉफ्टवेयर में मौजूद गंभीर सुरक्षा खामियों को बहुत तेजी से खोजा जा सकता है, ताकि साइबर अपराधी उनका फायदा न उठा सकें.
भारत की कुछ सरकारी एजेंसियों और निजी संस्थाओं को भी Claude Mythos Preview नाम के एडवांस AI मॉडल का एक्सेस दिया गया है. यह मॉडल सॉफ्टवेयर सिस्टम में कमजोरियों की पहचान करने के लिए बनाया गया है.
Project Glasswing की 5 बड़ी बातें
साइबर सुरक्षा के लिए खास AI प्रोजेक्ट
एंथ्रोपिक ने प्रोजेक्ट ग्लासविंग को एक सीमित और हाई-सिक्योरिटी पहल के तौर पर शुरू किया है. इसका मकसद सॉफ्टवेयर इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षित बनाना और सुरक्षा खामियों को समय रहते ठीक करना है.
Claude Mythos Preview है इसकी ताकत
इस प्रोजेक्ट का सबसे अहम हिस्सा Claude Mythos Preview AI मॉडल है. कंपनी के मुताबिक ये मॉडल बड़ी मात्रा में कोड को स्कैन कर सकता है और सुरक्षा से जुड़ी कई कमजोरियों को इंसानों की तुलना में कहीं तेजी से पहचान सकता है.
दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां भी शामिल
प्रोजेक्ट ग्लासविंग में अमेज़न, ऐपल, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, सिस्को, क्राइडस्ट्राइक और JPMorgan Chase जैसी बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं. ये संस्थाएं AI मॉडल की मदद से अपने सॉफ्टवेयर और महत्वपूर्ण सिस्टम की सुरक्षा मजबूत कर रही हैं.
10,000 से ज्यादा गंभीर खामियां खोजने का दावा
एंथ्रोपिक का कहना है कि Claude Mythos Preview अब तक 10,000 से अधिक हाई और क्रिटिकल लेवल की सुरक्षा खामियों की पहचान कर चुका है. इनमें कुछ प्रमुख ऑपरेटिंग सिस्टम से जुड़ी कमजोरियां भी शामिल हैं.
भारत समेत 15 से ज्यादा देशों में विस्तार
कंपनी ने हाल ही में घोषणा की थी कि प्रोजेक्ट ग्लासविंग को 15 से ज्यादा देशों की करीब 150 संस्थाओं तक पहुंचाया जाएगा. इनमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे देश शामिल हैं. इससे पहले अप्रैल में केवल 50 संस्थाओं को इसका एक्सेस मिला था.
क्यों खास है यह प्रोजेक्ट?
साइबर हमलों के बढ़ते खतरे के बीच AI बेस्ड सिक्योरिटी सिस्टम की मांग तेजी से बढ़ रही है. प्रोजेक्ट ग्लासविंग इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इसका मकसद सुरक्षा खामियों को पहले ही खोजकर उन्हें ठीक करना है, ताकि जरूरी डिजिटल सिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर सुरक्षित रह सकें.
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि AI की हैकिंग क्षमताओं को लेकर जताई जा रही चिंताएं थोड़ी बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जा रही हैं, लेकिन ये तकनीक साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है.