Last Updated:

Aam Khoila Recipe: छत्तीसगढ़ में गर्मी के मौसम में कच्चे आम से आमा खोईला (अमचूर) तैयार किया जाता है. इसे धूप में सुखाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. दाल, सब्जी और चटनी में इसका उपयोग खट्टापन और स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है. यह पारंपरिक घरेलू मसाला छत्तीसगढ़ की खाद्य संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक खानपान संस्कृति में आमा खोईला (अमचूर) का विशेष स्थान है. गर्मी के मौसम में जब बाजारों और बगीचों में कच्चे आमों की भरमार रहती है, तब ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं और परिवार सालभर के उपयोग के लिए आमा खोईला तैयार करते हैं. यह पूरी तरह प्राकृतिक मसाला है, जिसे कच्चे आम को काटकर धूप में सुखाने के बाद बनाया जाता है. दाल, सब्जी, चटनी और कई पारंपरिक व्यंजनों में इसका उपयोग खट्टापन और स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है. लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाला आमा खोईला न केवल भोजन का स्वाद बढ़ाता है, बल्कि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक खाद्य विरासत को भी जीवित रखता है.

आमा खोईला छत्तीसगढ़ की रसोई में वर्षों से उपयोग किया जाने वाला पारंपरिक खाद्य पदार्थ है. ग्रामीण इलाकों में इसे गर्मी के मौसम में तैयार कर पूरे वर्ष उपयोग में लाया जाता है. जब ताजे आम उपलब्ध नहीं होते, तब यही अमचूर भोजन में खट्टापन लाने का काम करता है.

कच्चे आम से होता है निर्माण
आमा खोईला बनाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले खट्टे कच्चे आमों का चयन किया जाता है. आमों को अच्छी तरह धोकर उनका छिलका हटाया जाता है और छोटे या पतले टुकड़ों में काटा जाता है. इससे उन्हें सुखाने में आसानी होती है. कटे हुए आम के टुकड़ों को साफ कपड़े, चटाई या बांस की टोकरी में फैलाकर तेज धूप में सुखाया जाता है. आमतौर पर 4 से 7 दिनों तक धूप में रखने से टुकड़े पूरी तरह सूख जाते हैं. इस दौरान रात में उन्हें घर के अंदर रखा जाता है ताकि नमी न लगे.

पाउडर और टुकड़ों दोनों रूपों में उपयोग
पूरी तरह सूख जाने के बाद आम के टुकड़ों को सीधे संग्रहित किया जा सकता है या फिर मिक्सी में पीसकर अमचूर पाउडर तैयार किया जाता है. दोनों रूपों में इसका उपयोग दाल, सब्जी, चटनी और विभिन्न व्यंजनों में किया जाता है. आमा खोईला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. यदि इसे सूखे और एयरटाइट डिब्बे में रखा जाए तो यह कई महीनों तक खराब नहीं होता और अपने स्वाद को बनाए रखता है.

पारंपरिक ज्ञान को संजोए रखने की पहल
ग्रामीण परिवारों में आमा खोईला तैयार करने की परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. आज भी कई परिवार बाजार के तैयार मसालों की बजाय घर में बने आमा खोईला को प्राथमिकता देते हैं, जिससे पारंपरिक स्वाद और घरेलू गुणवत्ता दोनों बनी रहती हैं.

About the Author

Mohd Majid

with more than more than 5 years of experience in journalism. It has been two and half year to associated with Network 18 Since 2023. Currently Working as a Senior content Editor at Network 18. Here, I am cover…और पढ़ें



Source link

Write A Comment