अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते गुरुवार को सऊदी अरब के साथ सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम के समझौते में एक और शर्त जोड़ दी। ट्रंप ने कहा कि इस डील के लिए सऊदी अरब को Abraham Accords के माध्यम से इजरायल के साथ अपने रिश्ते सामान्य करने होंगे। दिलचस्प है कि जब बीते बुधवार को इस डील की घोषणा की थी, तो न तो अमेरिका के ऊर्जा विभाग और न ही सऊद अरब की सरकार ने इस बात का कोई जिक्र किया था। किसी ने भी यह नहीं बताया था कि डील सऊदी अरब और इजरायल के रिश्तों पर निर्भर करेगी।

अप्रत्याशित है Abraham Accord वाली शर्त

एक दिन बाद डोनाल्ड ट्रंप के सोशल मीडिया पोस्ट में यह कहना कि सिविल न्यूक्लियर डील सऊदी अरब के Abraham Accord में शामिल होने पर निर्भर करेगा, अप्रत्याशित है। इससे डील को अंतिम मंजूरी में मुश्किलें आना तय मानी जा रही हैं। हालांकि, 2020 में मंजूर किए गए Abraham Accord से इजरायल के साथ राजनयिक संबंध रखने वाले अरब और अन्य मुस्लिम बहुल देशों की संख्या बढ़ी है।

इजरायल-फिलिस्तीन पर क्या है सऊदी अरब का रुख?

गौरतलब है कि सऊदी अरब को Abraham Accord में शामिल करना एक बहुत बड़ी राजनयिक उपलब्धि होगी। हालांकि, सऊदी अरब पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए पहले फिलिस्तीनी राज्य के गठन का साफ रास्ता बनाना जरूरी होगा। वहीं, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू फिलिस्तीन के गठन के विचार को अपने देश की सिक्योरिटी के लिए अव्यावहारिक बताते हुए खारिज कर चुके हैं।

Abraham Accord क्या है?

अब्राहम समझौता, अमेरिका की मध्यस्थता में हुए कई संयुक्त राजनयिक समझौतों की सीरीज है। इसका उद्देश्य इजरायल और मुस्लिम बहुल देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा के संबंधों को नॉर्मल करना है। 15 सितंबर, 2020 को व्हाइट हाउस में इसपर हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते ने इजराइली-फिलिस्तीनी संघर्ष के हल को शर्त बनाए बिना इजरायल-मुस्लिम बहुल देशों के सार्वजनिक संबंध स्थापित किए।

अब्राहम समझौता में कौन-कौन से देश शामिल?

Abrahan Accord का नाम बाइबिल के पैगंबर अब्राहम के नाम पर रखा गया है, जिन्हें यहूदी, इस्लाम और ईसाई तीनों धर्मों में सम्मानित माना जाता है। Abraham Accord में UAE, बहरीन, मोरक्को, सूडान, कजाकिस्तान और सोमालीलैंड शामिल हो चुके हैं। दूसरी तरफ, सऊदी अरब के साथ अमेरिका की सिविल न्यूक्लियर पर भी सवाल उठ रहे हैं कि जब इसी तरह की डील ईरान के साथ थी उसे ना क्यों कहा गया और सऊदी के साथ नया समझौता कर लिया गया।

ये भी पढ़ें- लाल सागर में हूती विद्रोहियों का कहर! किया सऊदी के 2 ऑयल टैंकरों पर बैलिस्टिक-क्रूज मिसाइलें दागने का दावा





Source link

Write A Comment