नई दिल्ली. ऐसे समय में जब सिनेमा में बड़े यूनिवर्स, डार्क थ्रिलर या जबरदस्त एक्शन फिल्मों का बोलबाला है, ‘दुल्हनिया ले आएगी’ ताजी हवा के झोंके की तरह आती है. यह हमें याद दिलाती है कि हर फिल्म को दिल जीतने के लिए बड़े बजट या दिमाग घुमा देने वाले ट्विस्ट की जरूरत नहीं होती. एक आसान, जुड़ाव महसूस करने वाली और दिल को छू लेने वाली कहानी दर्शकों के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान ला सकती है.

कहानी
फिल्म नव्या (खुशाली कुमार) के इर्द-गिर्द घूमती है. नव्या 32 साल की है और पुराने भारतीय मिडिल-क्लास परिवार के रिवाज के अनुसार, उसके परिवार की पहली और सबसे बड़ी चिंता उसकी शादी है. रिश्ते की तलाश शुरू होती है और जब नव्या की जिंदगी में सब कुछ ठीक और सुलझ जाता है, तो कहानी में एक साथ कई दूल्हे आ जाते हैं. इसके बाद कंफ्यूजन, कॉमेडी, गलतफहमियों, ड्रामा और इमोशंस का एक मजेदार खेल होता है जो दर्शकों को आखिर तक बांधे रखता है. पूरी फिल्म में सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि इस सारे कंफ्यूजन के बीच नव्या किस दूल्हे से शादी करेगी. सबसे अच्छी बात यह है कि मेकर्स ने इस सस्पेंस और ड्रामा को बिना ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए आसानी से हैंडल किया है.

एक्टिंग
पूरी फिल्म खुशाली के कंधों पर टिकी है. उन्होंने स्क्रीन पर नव्या का किरदार सिर्फ निभाया ही नहीं है, बल्कि उसे पूरी तरह से जिया है. स्क्रीन पर उनका आना एक अलग फ्रेशनेस लाता है. चाहे वह कॉमिक टाइम वाले सीन हों, रोमांटिक पल हों या आजादी और इज्जत के लिए उनके संघर्ष में उनके इमोशनल ब्रेकडाउन हों. खुशाली हर रोल में बिल्कुल नेचुरल लगती हैं. उनके पिछले प्रोजेक्ट्स के मुकाबले इस फिल्म में उनकी एक्टिंग ग्रोथ और मैच्योरिटी साफ दिखती है. वेटरन एक्टर महेश मांजरेकर अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से हर सीन में जान डाल देते हैं. पीयूष मिश्रा, हमेशा की तरह, अपने यूनिक स्टाइल, डायलॉग डिलीवरी और बॉडी लैंग्वेज से एक गहरी छाप छोड़ते हैं. उनके डायलॉग थिएटर में अच्छे लगते हैं. ‘प्यार का पंचनामा 2’ फेम ओमकार कपूर कहानी में अपनी जवानी वाली एनर्जी और चार्म लेकर आए हैं. स्नेहिल दीक्षित मेहरा (बीसी आंटी), जिन्होंने सोशल मीडिया के जरिए डिजिटल स्पेस में अपनी पहचान बनाई, अपना रोल पूरी ईमानदारी से निभाती हैं और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग दिखाती हैं. फिल्म में कोई भी कैरेक्टर सिर्फ एक खास जगह भरने के लिए नहीं लिखा गया है.

डायरेक्शन और राइटिंग
फिल्म का डायरेक्शन काफी स्मूद है. डायरेक्टर को अपनी टारगेट ऑडियंस और वह उन्हें क्या देना चाहते हैं, इसकी पूरी जानकारी थी. फिल्म महान या आर्ट सिनेमा जैसी होने का दिखावा नहीं करती. राइटिंग की बात करें तो, डायलॉग रोजमर्रा की जिंदगी से बहुत ज्यादा इंस्पायर्ड हैं और यही बात ऑडियंस को कहानी से जोड़ती है. इसे सीरियस बनाने के बजाय, 30 की उम्र की एक लड़की पर समाज और रिश्तेदारों की तरफ से शादी के लिए डाले जाने वाले प्रेशर को हल्के-फुल्के सरकाजम और ह्यूमर के साथ दिखाया गया है. कहानी बिना किसी जबरदस्ती के ड्रामा के नैचुरली आगे बढ़ती है.

सिनेमैटोग्राफी और म्यूजिक
फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट बहुत ब्राइट, कलरफुल और वाइब्रेंट है. बड़े पर्दे पर शादी के रंगीन सीन, लहंगे और सेटिंग सुंदर और आकर्षक लगते हैं. फिल्म का म्यूजिक फिल्म के मूड के हिसाब से एकदम सही है. शादी और त्योहार के गाने माहौल को और अच्छा बनाते हैं, जबकि बैकग्राउंड स्कोर इमोशनल और कॉमिक सीन के असर को बढ़ाता है. फिल्म की एडिटिंग ठीक-ठाक है, हालांकि दूसरे हाफ में पेस थोड़ी धीमी लगती है. अगर एडिटिंग टेबल पर 10-15 मिनट के फालतू सीन काट दिए जाते, तो फिल्म और टाइट और क्रिस्प हो सकती थी.

कमियां
हल्की-फुल्की रोम-कॉम होने की वजह से मेन कहानी काफी हद तक अंदाजा लगाने लायक है. समझदार दर्शक आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि किस प्वाइंट पर क्या होने वाला है. इंटरमिशन के बाद, गलतफहमियों और ड्रामा का सिलसिला लंबा खिंचता हुआ लगता है, जिससे फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी हो जाती है, जहां आप थोड़ा बोरियत महसूस कर सकते हैं.

अंतिम फैसला
‘दुल्हनिया ले आएगी’ एक साफ-सुथरी, एंटरटेनिंग और दिल को छू लेने वाली फैमिली एंटरटेनर है. इसकी कहानी बहुत बड़ी या मुश्किल नहीं है, लेकिन जो भी है उसे ईमानदारी और एंटरटेनमेंट के साथ दिखाया गया है. अगर आप इस वीकेंड अपने परिवार के साथ बिना किसी मेंटल स्ट्रेस के एक हल्की-फुल्की कॉमेडी-ड्रामा देखना चाहते हैं और थिएटर से एक बड़ी मुस्कान के साथ बाहर निकलना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक बढ़िया च्वाइस है. मेरी ओर से फिल्म को 5 में 3 स्टार.



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