जो वंदे मातरम् स्वतंत्रता संग्राम का नारा था, जो वंदे मातरम् आजादी के दीवानों का तराना था, वो राष्ट्रगीत आज सियासत का मुद्दा बन गया। कांग्रेस ने पूरा राष्ट्रगीत गाने से इनकार कर दिया है। कांग्रेस के इस रूख को अमित शाह ने देश को तोड़ने की साजिश बताया है, कांग्रेस की देशविरोधी मानसिकता का सबूत बताया है। अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस तुष्टीकरण के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है। देश के लोगों को कांग्रेस का असली चेहरा अच्छी तरह पहचान लेना चाहिए। असल में कांग्रेस ने वर्किंग कमेटी की मीटिंग में बाकायदा प्रस्ताव पारित करके फैसला किया है कि भले ही पार्लियामेंट ने कानून बना दिया हो, भले ही राष्ट्रगीत का अपमान कानूनन जुर्म हो लेकिन कांग्रेस के किसी भी कार्यक्रम में पूरा राष्ट्रगीत नहीं गाया जाएगा। कांग्रेस के कार्यकर्ता वंदे मातरम् के सिर्फ दो पैरा ही गाएंगे। कांग्रेस के इस फैसले को अमित शाह ने संसद का अपमान बताया है। कांग्रेस ने अपने रेजोल्यूशन में 1937 की वर्किंग कमेटी के प्रस्ताव का हवाला दिया है।
अमित शाह ने कांग्रेस पर बोला हमला
दरअसल, आज गृह मंत्री अमित शाह तमिलनाडु में थे। महाबलीपुरम में साउथ जोनल काउंसिल की मीटिंग शुरू होने वाली थी लेकिन इससे पहले अमित शाह खुद कैमरे के सामने आए और कांग्रेस पर हमला किया। अमित शाह ने कहा कि वंदे मातरम् पर वो कांग्रेस का रुख देखकर हैरान हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में पूरा राष्ट्रगीत गाने से इंकार कर दिया, संसद में पारित कानून को मानने से इंकार कर दिया। अमित शाह ने कहा कि “कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के प्रेशर में 1937 में वंदे मातरम् के टुकड़े किए, उसी वक्त देश के विभाजन की नींव पड़ी। आज भी कांग्रेस की न नीयत बदली है-न नीति। कांग्रेस तुष्टीकरण के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। बीजेपी, कांग्रेस के इस देश विरोधी चरित्र को जनता के सामने उजागर करेगी।”
कांग्रेस का क्या तर्क है?
सरकार ने पार्लियामेंट के मॉनसून सेशन में कानून बना कर वंदे मातरम् के सभी छह स्टैंजा को कंप्लसरी बना दिया। लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने पहले इनफॉर्मल आदेश जारी किया कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सिर्फ दो स्टैंजा गाए जाएंगे। इसके बाद कल कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की मीटिंग हुई। उसमें CWC ने बाकायदा प्रस्ताव पारित कर दिया कि कांग्रेस 1937 के अधिवेशन में पास हुए रेजोल्यूशन को ही मानेगी जिसमें वंदे मातरम् के पहले दो स्टैंजा को मान्यता दी गई थी। कांग्रेस के नेताओं का तर्क है कि “जिस मीटिंग में ये प्रस्ताव पास हुआ था उसमें महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस, सरदार पटेल और रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे तमाम बड़े बड़े नेता मौजूद थे। क्या ये सारे नेता देश विरोधी थे? जिस प्रस्ताव को 1937 में मंजूरी दी गई थी वो गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की सलाह पर पेश किया गया था, क्या रवीन्द्रनाथ टैगोर भी तुष्टीकरण कर रहे थे?” केसी वेणुगोपल ने कहा कि बीजेपी को वंदे मारतम् से कोई प्यार नहीं हैं। बीजेपी वंदे मातरम् के नाम पर नफरत के बीज बो रही है, इसलिए कांग्रेस बीजेपी के प्रेशर में नहीं आएगी।
1937 का रिजोल्यूशन क्या था?
कांग्रेस के नेता बार-बार 1937 के रिजोल्यूशन की बात कर रहे हैं। दरअसल, 1937 के कांग्रेस अधिवेशन में पास हुए रिजोल्यूशन की कॉपी में लिखा है कि वंदे मातरम् को कभी भी भारत के किसी समूह या समुदाय को चुनौती देने के लिए नहीं गाया गया और न ही कभी ऐसा माना गया कि वंदे मातरम् से किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचती है। इस रेजोल्यूलेशन में कहा गया था कि वंदे मातरम के पहले दो छंदों में ऐसी कोई बात नहीं है, जिस पर किसी को आपत्ति हो। गीत के बाकी छंदों पर कुछ ऐसे धार्मिक संदर्भ और धार्मिक विचारधारा है, जिन पर भारत के दूसरे रिलिजीयश ग्रुप्स को आपत्ति हो सकती है। इसलिए कांग्रेस कार्य समिति के कुछ मुस्लिम नेताओं ने इस गीत के एक हिस्से पर आपत्ति जताई है। कार्यसमिति इस आपत्ति को उचित और वैध मानती है। इसलिए सभी बातों को ध्यान में रखते हुए समिति की सिफारिश है कि जहां भी राष्ट्रीय सभाओं में “वंदे मातरम्” गाया जाए, वहां सिर्फ इसके पहले दो छंद गाए जाएं।
महात्मा गांधी ने क्या कहा था?
असल में वंदे मातरम् का विरोध मुस्लिम लीग कर रही थी और इसे मोहम्मद अली जिन्ना ने बड़ा इश्यू बनाया था। जिन्ना के प्रेशर में ही 1937 के कांग्रेस अधिवेशन से वंदे मातरम को लेकर रिजोल्यूशन पास हुआ था लेकिन उस वक्त कांग्रेस के बहुत से नेता इस फैसले से खुश नहीं थे। महात्मा गांधी ने भी 18 नवंबर 1937 को पंडित नेहरु को चिट्ठी लिखी थी। इसमें गांधी जी ने लिखा कि वंदे मातरम् को लेकर विवाद अभी तक खत्म नहीं हुआ है। बंगाल के बहुत से लोग कांग्रेस वर्किंग कमेटी के फैसले से नाराज हैं। इसकी जानकारी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें दी है। गांधी जी ने नेहरू जी को लिखा कि सुभाष चन्द्र बोस वंदे मातरम् के सिर्फ दो पैरा गाने के फैसले से पैदा हुई नाराजगी को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं।
नेहरू ने नेता जी को सफाई दी
गांधी जी ने जो लिखा, उसकी जानकारी पंडित नेहरू को पहले से थी। इसलिए नेहरू ने भी नेता जी सुभाष चंद्र बोस को चिट्ठी लिखी। उन्हें डिटेल में बताया कि कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् के छह में से सिर्फ दो स्टैंजा गाने का फैसला हुआ। नेहरू ने नेता जी को सफाई दी और लिखा कि “वंदे मातरम् का बैकग्राउंड मुसलमानों को परेशान कर सकता है। मुसलमान मानते हैं कि ये गीत हिंदू देवी-देवताओं के लिए लिखा गया है। इसमें हिंदू देवी का उल्लेख है। इसलिए मुसलमानों की भावनाओं को ख्याल रखते हुए वंदे मातरम् के चार स्टैंजा हटाने का फैसला किया गया है।”
कई मुस्लिम नेताओं ने गाया था पूरा वंदे मातरम्
कांग्रेस के नेता आज दावा कर रहे हैं कि मुसलमानों को वंदे मातरम् के आखिरी चार पैरा पर एतराज है। आजादी से पहले भी मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया था। इसलिए 1937 के अधिवेशन में वंदे मातरम् के सिर्फ दो पैरा गाने का फैसला हुआ था। लेकिन एक इंट्रेस्टिंग फैक्ट ये भी है कि 1896 में कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन हुआ था। उस वक्त रहमतुल्लाह कांग्रेस के अध्यक्ष थे। रहमतुल्लाह ने इस अधिवेशन में पूरा वंदे मातरम गाया था। 1913 में करांची में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। उस वक्त नवाब सैयद मोहम्मद बहादुर कांग्रेस के अध्यक्ष थे। नवाब बहादुर ने पूरा वंदे मातरम् गाया था। 1918 में बॉम्बे अधिवेशन हुआ तब सैयद हसन इमाम कांग्रेस अध्यक्ष थे, उन्होंने पूरा वंदे मातरम् गाया। 1920 के नागपुर अधिवेशन में मौलना अबुल कलाम आजाद ने पूरा वंदे मातरम् गाया। 1927 के मद्रास अधिवेशन में एम ए अंसारी ने वंदे मातरम् के पूरे छह पैरा गाए। ये सब मुस्लिम नेता थे, बड़े स्कॉलर थे लेकिन किसी ने कभी वंदे मातरम् का विरोध नहीं किया।
मुस्लिम लीग के अधिवेशन में वंदे मातरम् के खिलाफ प्रस्ताव
इसके बाद 17 अक्टूबर 1937 को लखनऊ में मुस्लिम लीग का अधिवेशन हुआ। उसमें वंदे मातरम् के खिलाफ प्रस्ताव पास हुआ। फिर जिन्ना ने कांग्रेस पर दबाव बनाया और सिर्फ 11 दिन के बाद 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम् के दो ही पैरा गाने का फैसला हो गया। इसीलिए बीजेपी के नेता आरोप लगा रहे हैं कि उस वक्त भी मुस्लिम लीग के प्रेशर में कांग्रेस ने राष्ट्रगीत पर समझौता किया था और आज भी कांग्रेस वोट बैंक के चक्कर में राष्ट्रगीत का विरोध कर रही है।
भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने क्या कहा?
अब बीजेपी के नेता कांग्रेस के नेताओं को यही इतिहास याद दिला रहे हैं। निशिकांत दुबे ने कहा कि “कांग्रेस तब भी जिन्ना के सामने झुकी थी, अब भी वो जिन्ना की विचारधारा पर चल रही है। कांग्रेस जिन्ना की असली वारिस है।” आज कांग्रेस के कई मुस्लिम नेता भी वंदे मातरम के इश्यू पर पार्टी का बचाव करने मैदान में उतरे। इमरान मसूद ने कहा कि “वंदे मातरम् का देश के बंटवारे से कुछ लेना-देना नहीं था। Two Nation Theory तो सबसे पहले वीर सावरकर ने दी थी।”
ये भी पढ़ें- कांग्रेस नहीं गाएगी पूरा वंदे मातरम्, पर क्यों? Coffee Par Kurukshetra में देखें पूरी चर्चा
‘वंदे मातरम् के टुकड़े-टुकड़े करने वालों के जनता करेगी टुकड़े-टुकड़े’, जीतन राम मांझी ने किया पोस्ट