सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने जब 7 अगस्त 2026 को मक्का में एक ऐतिहासिक Joint Defence Agreement पर साइन किए, तो इसके Middle East की सिक्योरिटी के लिए एक गेम-चेंजर होने का दावा किया गया। समझौते के बाद कहा गया कि अब तीनों में से किसी एक देश पर हमला, सभी पर हमला माना जाएगा। मक्का समझौते का मकसद एक ऐसा सामूहिक डिफेंस तैयार करना था, जो सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान को बाहरी हमलों से सुरक्षित कर पाए। लेकिन सवाल है कि क्या यह मक्का डिफेंस पैक्ट सच में कोई डर या खौफ पैदा भी कर पाया है?
दरअसल, 7 अगस्त को हुए मक्का समझौते की स्याही अभी तक पूरी तरह से सूखी भी नहीं थी कि यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब में अलग-अलग जगहों पर ताबड़तोड़ हमलों की झड़ी लगा दी। अभी ताजा मामला 20 अगस्त का है, जब हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के नजरान अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और प्रमुख क्रूड ऑयल कंपनी Aramco के ठिकानों पर ड्रोन अटैक किए। ऐसे में यह सवाल खड़ा होना लाज़मी है कि जब तीन बड़े मुस्लिम देश सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान एक-दूसरे की सुरक्षा की गारंटी ले रहे हैं, तो हूती लगातार सऊदी अरब पर हमले करने की हिम्मत कैसे दिखा पा रहे हैं? क्या उन्हें डिफेंस पैक्ट का डर नहीं या वे मक्का समझौते को कागज का शेर ही मानते हैं।
मक्का पैक्ट के जरिए नया सिक्योरिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की कोशिश
7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुआ मक्का पैक्ट पश्चिम एशिया की बदलती जियोपॉलिटिक्स के लिए अहम पड़ाव माना जा रहा था। इस डील की प्रमुख बात यही बताई गई कि यह नाटो जैसा समझौता ही है। अगर तीनों में से किसी एक भी देश पर हमला किया जाता है तो उसे तीनों देशों पर अटैक माना जाएगा।
गौरतलब है कि सऊदी अरब की आर्थिक शक्ति, पाकिस्तान की सैन्य ताकत और तुर्की की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को मिलाकर एक नया सिक्योरिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का प्रयास किया गया। तुर्की के विदेश मंत्री Hakan Fidan ने भले ही इसे NATO के ‘आर्टिकल 5’ जैसा बताया, लेकिन अब जब NATO के देशों की एकता पर ही सवाल हैं तो उसकी नकल मक्का पैक्ट पर कितना भरोसेमंद है, ये देखने वाली बात होगी।
डिफेंस पैक्ट के बाद भी Saudi Arabia में हमले कर रहे हूती
मक्का डिफेंस पैक्ट का मकसद हमलों को रोकना था, लेकिन जब 7 अगस्त 2026 को ये समझौता हुआ, उसके बाद से हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी फैसिलिटी को कई बार निशाना बनाया है। इस टेबल में देखिए हूती विद्रोहियों ने 7 अगस्त के बाद कब-कब सऊदी अरब पर हमले किए।
| 9 अगस्त 2026 | जजान में हमला | Aramco की फैसिलिटी को निशाना बनाया। |
| 13 अगस्त 2026 | जजान में अटैक | Aramco रिफाइनरी को टारगेट किया। |
| 14 अगस्त 2026 | नजरान में हमला | Aramco फैसिलिटी पर अटैक किया। |
| 18 अगस्त 2026 | जजान में अटैक | Aramco रिफाइनरी पर हमला बोला। |
| 20 अगस्त 2026 | नजरान में हमला | इंटरनेशनल एयरपोर्ट और Aramco फैसिलिटी को निशाना बनाया। |
(सोर्स- AP/Houthis)
7 अगस्त 2026 के मक्का डिफेंस पैक्ट के बाद भी सऊदी अरब में हूती विद्रोहियों के हमले जारी रहे। 9 अगस्त 2026 को Jazan में Aramco की एक फैसिलिटी पर ड्रोन से हमले का दावा किया गया। फिर, 13 अगस्त को जजान में ही Aramco रिफाइनरी को फिर ड्रोन से निशाना बनाया गया।। इसके बाद 14 अगस्त को हूती विद्रोहियों ने नजरान स्थित Aramco फैसिलिटी पर ड्रोन से अटैक किया। फिर, 18 अगस्त को भी जजान में Aramco रिफाइनरी को कई ड्रोन्स ने टारगेट किया।
इसके बाद 20 अगस्त को हूती विद्रोहियों ने नजरान के इंटरनेशनल एयरपोर्ट और Aramco को ड्रोन से निशाना बनाने का दावा किया। यानी मक्का डिफेंस पैक्ट के बाद सिर्फ महज 13 दिनों में ही सऊदी अरब के जजान और नजरान के क्षेत्र में Aramco की फैसिलिटीज और एयरपोर्ट पर हूती विद्रोहियों के हमले हुए।
IRGC के सख्त रुख से मिले संकेत
जान लें कि अभी मध्य-पूर्व के संघर्ष के केंद्र में ईरान है। मक्का डिफेंस पैक्ट में भले ही ये बात न कही गई हो कि ये ईरान या किसी देश के खिलाफ नहीं है, लेकिन 20 अगस्त के अटैक से ठीक पहले ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का बयान बड़ा संकेत देता है। IRGC के प्रवक्ता होसैन मोहेबी ने 19 अगस्त को ईरानी न्यूज एजेंसी मेहर को बताया था कि सऊदी अरब हूती विद्रोहितयों को हराने में नाकामयाब होगा। सऊदी अरब, जिसकी सैन्य ताकत इजरायल से भी कम है, वह हूती और यमनी लड़ाकों का सामना कैसे कर सकता है? यह मुमकिन नहीं है।
क्या नाकामयाब साबित हुआ मक्का समझौता?
हालांकि, मक्का समझौते के कुछ दिन बाद ही हूती विद्रोहियों के हमलों के आधार पर सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के डिफेंस पैक्ट को नाकामयाब घोषित करना जल्दबाजी हो सकती है क्योंकि कोई भी रक्षा या कूटनीतिक समझौता रातों-रात जमीन पर नहीं उतर जाता है। लेकिन सवाल है कि जिस मिडिल-ईस्ट में सऊदी अरब को अमेरिका जैसी ताकत पूरी तरह सुरक्षा नहीं दे पाई, उसकी रक्षा तुर्की और पाकिस्तान कैसे कर पाएंगे। भविष्य में ये समझौता जमीन पर कैसे लागू होता है और क्या किसी भी एक देश पर हमला होने की स्थिति में ये तीनों देश सैन्य रूप से एक साथ आ पाएंगे, यही मक्का डिफेंस पैक्ट की असली परीक्षा होगी।
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