Highlights
- 1918 में फ्लू से दिल्ली शहर में 7,044 और पूरे प्रांत में 23,175 मौतें हुईं।
- भीषण महामारी के बाद 1920 में दिल्ली ने साधारण इन्फ्लूएंजा को संक्रामक रोग घोषित किया।
- आज H1N1 रिपोर्टेबल है, लेकिन हर मौसमी फ्लू मरीज की रिपोर्ट अनिवार्य नहीं।
नई दिल्ली: आज से करीब 108 साल पहले दिल्ली में एक बीमार यूरोपीय व्यक्ति के आने के बाद फैले इन्फ्लूएंजा ने ऐसी तबाही मचाई थी कि कुछ ही महीनों में शहर में 7,044 लोगों की जान चली गई थी। 1918-19 की इस महामारी की भयावहता के बाद ब्रिटिश भारत प्रशासन ने सितंबर 1920 में साधारण इन्फ्लूएंजा को दिल्ली में आधिकारिक रूप से संक्रामक रोग घोषित कर दिया था। दिल्ली अभिलेखागार में सुरक्षित दस्तावेजों के मुताबिक, यह फैसला 1918 की भीषण फ्लू महामारी के बाद लिया गया। इन्फ्लूएंजा को पंजाब म्यूनिसिपल एक्ट के तहत संक्रामक रोगों की सूची में शामिल किया गया, जिससे दिल्ली नगर पालिका को इसके फैलाव को रोकने के लिए विशेष अधिकार मिल गए।
शिमला से आया था शुरुआती मरीज
1918 की एक मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, प्रांत के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के तत्काल संज्ञान में आने वाला शुरुआती मामला एक यूरोपीय व्यक्ति का था। वह शिमला से दिल्ली आया था, जहां उसके परिवार के कई सदस्य इसी बीमारी से पीड़ित थे। करीब एक हफ्ते बाद उसी घर में रहने वाला एक अन्य यूरोपीय भी संक्रमण की चपेट में आ गया। रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर महीने में बीमारी को लेकर बहुत ज्यादा चिंता या डर की स्थिति नहीं थी। मरीजों में बुखार, गले में खराश और खांसी जैसे लक्षण दिखाई दे रहे थे। लेकिन अक्टूबर आते-आते हालात तेजी से बिगड़ गए। संक्रमण के मामले बढ़ने लगे, बीमारी गंभीर होने लगी और मौतों का सिलसिला भी तेज हो गया।
1918 से 1920 तक दिल्ली में क्या हुआ था?
एक दिन में सामने आए 181 मामले
दिल्ली के सिविल अस्पताल में अक्टूबर के पहले सप्ताह में रोजाना एक-दो मामले आ रहे थे। लेकिन तीसरे सप्ताह तक यह संख्या बढ़कर प्रतिदिन 100 से ज्यादा हो गई। 14 अक्टूबर को इन्फ्लूएंजा के 181 मामले दर्ज किए गए थे। गंभीर मरीजों में निमोनिया, ब्रोंकाइटिस, प्लूरिसी यानी फेफड़ों के आसपास की झिल्ली में सूजन और एम्पायमा जैसी जटिलताएं पैदा हो रही थीं। कुछ मरीज तेज भ्रम और असामान्य मानसिक स्थिति में चले जाते थे, जबकि कुछ की अचानक हृदय गति रुकने से मौत हो जाती थी। रिपोर्ट में कहा गया कि पूरे प्रांत के डॉक्टर मरीजों की भारी संख्या के कारण लगभग पूरी तरह थक चुके थे और उनकी व्यवस्था ठप होने की स्थिति में पहुंच गई थी।
अकेले दिल्ली में हुई थीं 23175 मौतें
1918 में दिल्ली के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के एक आधिकारिक संदेश के अनुसार, अक्टूबर और नवंबर के दौरान पूरे दिल्ली प्रांत में इन्फ्लूएंजा से 23,175 लोगों की मौत हुई थी। इनमें से 7,044 मौतें दिल्ली शहर में दर्ज की गईं, जबकि ग्रामीण इलाकों में 16,131 लोगों ने जान गंवाई। 1918-19 की इन्फ्लूएंजा महामारी भारत के आधुनिक इतिहास की सबसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदाओं में से एक थी।
1918-19 में दिल्ली में फ्लू से हुई मौतें।
महामारी की दूसरी लहर बनी जानलेवा
श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट, दिल्ली के इंटरनल मेडिसिन निदेशक डॉ. अरविंद अग्रवाल के अनुसार, जून 1918 में बीमारी का पहला प्रकोप अपेक्षाकृत हल्का था। लेकिन रेलवे नेटवर्क के जरिए यह तेजी से देशभर में फैल गई। सितंबर में महामारी की दूसरी लहर आई, जो पहले से कहीं ज्यादा घातक साबित हुई। डॉ. अग्रवाल के मुताबिक,
‘मरीजों में तेज बुखार, कमजोरी, शरीर और हाथ-पैरों में दर्द, सिरदर्द, आंखों में दर्द या जलन, खांसी और ब्रोंकाइटिस जैसे लक्षण दिखाई देते थे। गंभीर मामलों में कुछ ही दिनों के भीतर निमोनिया हो जाता था। 1918-19 की महामारी में युवा वयस्कों पर बीमारी का असर विशेष रूप से गंभीर था।’
1918 में फ्लू के प्रमुख लक्षण क्या थे?
1918 में फ्लू के प्रमुख लक्षण क्या थे?
‘इसे बॉम्बे इन्फ्लूएंजा वायरस कहा गया’
अपोलो स्पेक्ट्रा अस्पताल, दिल्ली के सीनियर कंसल्टेंट और इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. संचयन रॉय ने बताया कि उस समय इस वायरस को ‘बॉम्बे इन्फ्लूएंजा वायरस’ कहा गया था। उन्होंने कहा,
‘उस समय वायरस की अधिक विस्तृत पहचान संभव नहीं थी। संभावना है कि यह H1N1 रहा हो, लेकिन यह इन्फ्लूएंजा A और B का मिश्रण भी हो सकता था।’
महामारी के बड़े पैमाने और मौतों की संख्या को देखते हुए दिल्ली के अधिकारियों ने विचार शुरू किया कि क्या इन्फ्लूएंजा को शहर के संक्रामक रोग कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए।
दूसरे शहरों और इंग्लैंड की व्यवस्था की हुई स्टडी
दिल्ली अभिलेखागार की जुलाई 1920 की एक फाइल से पता चलता है कि सैनिटेशन सब-कमेटी ने इन्फ्लूएंजा, इन्फ्लूएंजा निमोनिया और तीव्र निमोनिया को पंजाब म्यूनिसिपल एक्ट के तहत संक्रामक रोगों की सूची में शामिल करने पर विचार किया। कमेटी ने बॉम्बे, मद्रास और इंग्लैंड की व्यवस्थाओं का भी अध्ययन किया, जहां इन्फ्लूएंजा और निमोनिया के कुछ प्रकारों की सूचना अधिकारियों को देना पहले से जरूरी था।
सितंबर 1920 में इन्फ्लूएंजा बना संक्रामक रोग
दिल्ली के अधिकारियों ने साधारण इन्फ्लूएंजा को भी ‘नोटिफायबल’ रोग बनाने की सिफारिश की। उनका मानना था कि इससे बीमारी के मामलों का समय रहते पता लगाया जा सकेगा और नगर पालिका को इसके प्रसार को रोकने के अधिकार मिलेंगे। कमेटी ने माना कि इन्फ्लूएंजा की पहचान कई बार मुश्किल होती है, लेकिन मामलों की सूचना देना जरूरी और उपयोगी है। इसके बाद नगर पालिका ने अधिसूचना का मसौदा तैयार कराया और सितंबर 1920 में मुख्य आयुक्त ने साधारण इन्फ्लूएंजा को आधिकारिक तौर पर संक्रामक रोग घोषित कर दिया।
1.2 करोड़ से ज्यादा मौतों का अनुमान
डॉ. अरविंद अग्रवाल ने बताया कि 1921 की जनगणना में 1918 और 1919 की महामारी से भारत में 85 लाख लोगों की मौत का अनुमान लगाया गया था। हालांकि, ऐतिहासिक रिसर्च में यह संख्या 1.2 करोड़ या उससे भी ज्यादा बताई गई है। महामारी का असर इतना ज्यादा था कि देश के कई हिस्सों में कब्रिस्तान और श्मशान घाटों की व्यवस्था भी मृतकों की संख्या के दबाव में चरमरा गई थी। इससे पहले से ही महामारी से जूझ रहे इलाकों की मुश्किलें और बढ़ गईं। अंतिम मृतक संख्या का सटीक अनुमान लगाना आज भी मुश्किल है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कई इलाकों में मृत्यु पंजीकरण व्यवस्था पूरी तरह काम नहीं कर रही थी। कई मौतों को इन्फ्लूएंजा के बजाय केवल बुखार या दूसरी सांस संबंधी बीमारियों के नाम पर दर्ज किया गया।
आज हर मौसमी फ्लू केस की रिपोर्ट जरूरी नहीं
एक सदी से ज्यादा समय बाद इन्फ्लूएंजा की अलग-अलग किस्मों की रिपोर्टिंग व्यवस्था काफी अधिक स्पष्ट हो चुकी है। डॉ. संचयन रॉय ने बताया कि दिल्ली की आधिकारिक संक्रमण नियंत्रण गाइडलाइंस में स्वाइन फ्लू या इन्फ्लूएंजा A (H1N1) को रिपोर्ट किए जाने वाले संक्रमणों में शामिल किया गया है। उन्होंने कहा,
‘संदिग्ध या पुष्टि हो चुके रिपोर्टेबल संक्रमणों की जानकारी तय सार्वजनिक स्वास्थ्य और अस्पताल निगरानी व्यवस्था के जरिए देना जरूरी होता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मौसमी फ्लू से पीड़ित हर मरीज की अलग-अलग रिपोर्ट अनिवार्य हो। इन्फ्लूएंजा A में H1N1 और H3N2 शामिल हैं, जबकि इन्फ्लूएंजा B भी लोगों में फैलता रहता है। H1N1 को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से विशेष महत्व दिया जाता है। वहीं H3N2, इन्फ्लूएंजा B और अन्य प्रकार के इन्फ्लूएंजा की निगरानी लैब रिपोर्टिंग और इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम के जरिए की जाती है।’
राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र यानी नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की लैब रिपोर्टिंग प्रणाली में इन्फ्लूएंजा A, महामारी वाला H1N1, H3N2, इन्फ्लूएंजा B और अन्य प्रकारों की जांच का प्रावधान है।
हर मरीज की H1N1 जांच जरूरी नहीं
डॉ. रॉय ने बताया कि हर फ्लू मरीज की जांच जरूरी नहीं होती। राष्ट्रीय गाइडलाइंस के तहत हल्के लक्षण वाले कैटेगरी A और कैटेगरी B के कई मरीजों का H1N1 टेस्ट नहीं किया जाता। वहीं, कैटेगरी C के मरीजों की जांच, अस्पताल में भर्ती और इलाज की जरूरत होती है। उन्होंने कहा,
‘ऐसे मामलों में सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग केवल लैब से संक्रमण की पुष्टि होने पर निर्भर नहीं करती। संदिग्ध मरीजों की क्लिनिकल निगरानी और जरूरत पड़ने पर लैब जांच, दोनों के आधार पर रिपोर्टिंग की जाती है।’
एक सदी पहले दिल्ली में 7,044 लोगों की मौत के बाद जिस इन्फ्लूएंजा को संक्रामक रोगों की सूची में शामिल किया गया था, आज उसकी अलग-अलग किस्मों के लिए कहीं अधिक विस्तृत निगरानी और रिपोर्टिंग व्यवस्था मौजूद है। (PTI से इनपुट्स के साथ)
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