Highlights
- हूतियों के लगातार हमलों से पाकिस्तान ने ईरान को सऊदी की सुरक्षा पर चेतावनी दी है।
- डिफेंस पैक्ट के चलते पाकिस्तान सऊदी को सैन्य और सुरक्षा मदद बढ़ा सकता है।
- हमले नहीं रुके तो हूतियों के खिलाफ सीमित सीधी कार्रवाई की संभावना भी बनेगी।
Pakistan Warns Iran: यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के दक्षिणी इलाकों में तेल ठिकानों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। इन हमलों में 73 लोग घायल हुए हैं। इसके बाद पाकिस्तान ने ईरान को साफ चेतावनी दी है कि वह हूतियों को नियंत्रित करे। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अपने रक्षा समझौते का हवाला देते हुए कहा है कि अगर सऊदी की सुरक्षा पर हमला जारी रहता है तो उसके लिए चुप रहना आसान नहीं होगा। ऐसे में सवाल है कि अगर हूती हमले नहीं रुकते हैं तो पाकिस्तान की अगली चाल क्या हो सकती है? ये 3 संभावनाएं सबसे ज्यादा नजर आ रही हैं।
पहली संभावना: पाकिस्तान पहले कूटनीतिक दबाव बढ़ाएगा
सबसे पहली और फिलहाल सबसे आसान संभावना यही है कि पाकिस्तान सीधे युद्ध में उतरने के बजाय ईरान पर दबाव बढ़ाए। पाकिस्तान ने पहले ही तेहरान से कहा है कि वह हूतियों पर अपना प्रभाव इस्तेमाल करे और सऊदी अरब पर हमले रुकवाए। इसकी वजह भी साफ है। हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन हासिल है और पाकिस्तान नहीं चाहता कि सऊदी की रक्षा के नाम पर वह सीधे ईरान के साथ युद्ध में फंस जाए। पाकिस्तान के लिए ईरान एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है। इसलिए इस्लामाबाद पहले बातचीत, चेतावनी और क्षेत्रीय कूटनीति का रास्ता अपना सकता है। पाकिस्तान की प्रतिक्रिया को देखकर लग रहा है कि वह खुद भी जंग में उतरने से बचना चाहता है और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दे रहा है।
दूसरी संभावना: सऊदी की सुरक्षा के लिए सैन्य मदद बढ़ाना
अगर हूती हमले लगातार जारी रहते हैं और सऊदी के तेल या सैन्य ठिकानों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचता है, तो पाकिस्तान पर सैन्य मदद बढ़ाने का दबाव बन सकता है। यहां पाकिस्तान-सऊदी रक्षा समझौता अहम हो जाता है। दोनों देशों के बीच सितंबर 2025 में हुआ रणनीतिक रक्षा समझौता किसी एक पर होने वाले हमले को दोनों पर हमला मानने की बात करता है। यही वजह है कि पाकिस्तान अब सऊदी की सुरक्षा को केवल रियाद की समस्या नहीं मान रहा। हालांकि इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि पाकिस्तान तुरंत यमन में अपने सैनिक भेज देगा। वह सऊदी की जमीन पर एयर डिफेंस, खुफिया जानकारी, सुरक्षा और सैन्य समन्वय जैसी मदद बढ़ा सकता है।
हूतियों के हमले नहीं रुके तो पाकिस्तान के सामने 3 रास्ते नजर आ रहे हैं।
तीसरी संभावना: हूतियों के खिलाफ सीधी कार्रवाई
सबसे गंभीर स्थिति तब बनेगी, जब हूती हमले रुकने के बजाय और तेज हो जाएं और पाकिस्तान को लगे कि सऊदी की सुरक्षा सीधे खतरे में है। ऐसी स्थिति में यमन में हूती ठिकानों के खिलाफ सीमित सैन्य कार्रवाई की संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती। हालांकि यह पाकिस्तान के लिए सबसे जोखिम भरा विकल्प होगा। इसका मतलब ईरान के साथ तनाव बढ़ना और पूरे मिडिल ईस्ट में संघर्ष का एक नया मोर्चा खुलना हो सकता है। पाकिस्तान के सामने पहले से आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियां हैं, इसलिए वह सीधे युद्ध में उतरने से पहले कई बार सोचेगा। मौजूदा रिपोर्टों के मुताबिक इस्लामाबाद की कोशिश यही है कि सऊदी को सुरक्षा मिले, लेकिन पाकिस्तान खुद किसी बड़ी लड़ाई में न फंसे।
मोचा पर कब्जे से क्यों बढ़ी चिंता?
इस पूरे संकट में यमन का मोचा शहर भी अहम है। मोचा लाल सागर के किनारे बसा है और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण इलाके में आता है। अगर हूतियों का इस इलाके पर नियंत्रण मजबूत होता है तो उनकी पहुंच बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास तक बढ़ने की चिंता पैदा होती है। बाब-अल-मंदेब लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच का महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है। यहां तनाव बढ़ने का असर सिर्फ यमन या सऊदी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जहाजों और तेल की सप्लाई पर भी पड़ सकता है। हूतियों ने पहले ही समुद्री रास्तों और सऊदी के खिलाफ हमलों को अपने अभियान का हिस्सा बनाया है।
पाकिस्तान इस समय बुरी तरह फंसा नजर आ रहा है।
सऊदी पर हमले ने संकट को कितना बढ़ा दिया?
8 सितंबर के हमलों में हूतियों ने दक्षिणी सऊदी अरब के अबहा, जिजान, नजरान और खमीस मुशैत जैसे इलाकों में मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। इन हमलों में तेल प्रतिष्ठानों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया और 73 लोग घायल हुए। इसके जवाब में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में हूती ठिकानों पर हवाई हमले किए। यानी अब हमला और जवाबी हमला दोनों तेज हो रहे हैं। यही वजह है कि 2022 की युद्धविराम के बाद बनी अपेक्षाकृत शांति फिर कमजोर पड़ती दिख रही है। अगर यह सिलसिला जारी रहता है तो तेल, समुद्री व्यापार और पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। वहीं, अब तो यह भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान-सऊदी और तुर्की के डिफेंस पैक्ट की हवा निकल गई है।
ईरान पर टिकी हैं पूरी दुनिया की निगाहें
पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम भूमिका ईरान की है। पाकिस्तान ने इसी वजह से सीधे हूतियों के बजाय पहले ईरान को चेतावनी दी है। इस्लामाबाद समझता है कि अगर तेहरान हूतियों पर अपना प्रभाव इस्तेमाल करके हमले रोकता है तो बड़े युद्ध का खतरा टाला जा सकता है। लेकिन अगर हमले जारी रहते हैं, सऊदी की ऊर्जा और सैन्य सुविधाओं पर नुकसान बढ़ता है और बाब-अल-मंदेब का संकट गहराता है, तो पाकिस्तान पर अपने रक्षा समझौते को लागू करने का दबाव बढ़ सकता है। इसलिए फिलहाल ऊपर बताए गए तीन रास्ते दिख रहे हैं। पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह सऊदी की रक्षा भी करे और खुद ईरान के साथ बड़े युद्ध में फंसने से भी बचे।
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