‘जीरो टू हीरो’ यानी ‘शून्य से शिखर तक का सफर’ का तात्पर्य है किसी व्यक्ति का शुरुआत में बहुत ही निचले स्तर पर होने के बावजूद, कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प, सही सोच और लगन से सफलता के शीर्ष मुकाम तक पहुंचना. यह एक ऐसे व्यक्ति की यात्रा का वर्णन करता है, जो विपरीत परिस्थितियों से निकलकर जीवन में महत्वपूर्ण मुकाम हासिल करता है. हालांकि, जीवन की शुरुआत में आने वाली निराशा, असफलताएं और चुनौतियां इस सफर का हिस्सा होती हैं, लेकिन आत्मविश्वास और अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहना सबसे महत्वपूर्ण होता है. शिखर तक पहुंचने के लिए सतत और कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, साथ ही अपनी नाकामियों को सीखने के अवसर के रूप में देखने और उनसे सबक लेकर आगे बढ़ने के साथ जीवन के प्रति सकारात्मक सोच रखने व एक स्पष्ट दृष्टिकोण रखने से कोई भी मंजिल को पाना मुश्किल नहीं होता है.

डॉ. राजेश के. अग्रवाल ऐसे ही एक नायक हैं, जिनकी जीवन यात्रा पर बनी बायोपिक फिल्म ‘विजेता : जीरो टू हीरो- ए रियल लाइफ जर्नी’ उनकी असाधारण यात्रा की बेहतरीन झलक पेश करता है. जो आज सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. यह एक ऐसे शख्स की कहानी है जो कोलकाता की गलियों से निकलकर यूएई के सबसे सम्मानित अरबपतियों में से एक बन गया. राजीव एस. रुइया द्वारा निर्देशित, संदीप नाथ द्वारा लिखित और डॉ. राजेश के. अग्रवाल द्वारा आरकेजी मूवीज के बैनर तले बनाई गई ‘विजेता’ एक भावनात्मक, सशक्त और प्रेरणादायक कहानी होने का दम भरती है. यह फिल्म एक ऐसी कहानी पेश करती है, जो व्यक्तिगत जीत के साथ-साथ व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता, अंडरवर्ल्ड के खतरों और व्यक्तिगत नुकसान की चुनौतियों से जूझकर आगे बढ़ने के हौसलों को भी बखूबी दिखाती है, जिसके कारण यह फिल्म प्रतिकूल परिस्थितियों पर विजय का प्रतीक बन जाती है.

फिल्म की कहानी के अनुसार, कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे राजेश के. अग्रवाल ने किशोरावस्था में ही आर्थिक मदद के मकसद से ऊनी और होजरी के अपने पारिवारिक व्यवसाय में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था. 1970 के दशक के आखिरी दौर में बनियान के निर्माण से पैकेजिंग तक के एक फलते-फूलते वस्त्र उद्योग को खड़ा करने तक उनकी उन्नति विशुद्ध दृढ़ता और अडिग मूल्यों से प्रेरित थी. लेकिन, उनकी महत्वाकांक्षाएं वस्त्र उद्योग से कहीं आगे तक पहुंच गईं. स्थिरता पर केंद्रित एक दृष्टिकोण के साथ उन्होंने आरकेजी इंटरनेशनल एफजेडसी की स्थापना करने के साथ मेटल रिसाइक्लिंग के क्षेत्र में कदम रखा और देखते ही देखते सफलता के उच्च शिखर तक पहुंच गए.

उनकी कंपनी 33 देशों में परिचालन करने वाली एक वैश्विक दिग्गज कंपनी बन गई. इसी के साथ वह न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय पुनर्चक्रण ब्यूरो (बीएमआर) के बोर्ड सदस्य और राजदूत बन गए, बल्कि वैश्विक स्थिरता नीतियों को भी प्रभावित करने लगे. दरअसल, ‘विजेता’ केवल वित्तीय सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह लचीलेपन, नैतिकता और सभी बाधाओं से ऊपर उठने की इच्छाशक्ति की कहानी भी है. कोलकाता में सफल व्यवसाय स्थापित करने के बाद, एक दृढ़निश्चयी उद्यमी राजेश अपने परिवार के साथ मुंबई चला जाता है, जहां उनकी बढ़ती सफलता जबरन वसूली करने वालों का अवांछित ध्यान आकर्षित करती है. यह फिल्म एक साहसी, जज्बाधारी, हिम्मती और हौसलेमंद नायक की कहानी कहती है.

मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी कहने वाली फिल्म ‘विजेता’ चुनौतियों पर विजय पाकर सफलता पाने की एक अविश्वसनीय, लेकिन सच्ची कहानी पर आधारित एक सशक्त सिनेमाई सफर पर ले जाती है और दर्शकों को ‘जीरो से हीरो’ बनने के लिए प्रेरित करती है. फिल्म ‘विजेता’ धैर्य और विजय के मिश्रण से उपजे एक सशक्त संघर्ष की एक सच्ची गाथा की झलक दिखाती है. कहानी की शुरुआत एक साधारण परिवेश में कड़ी मेहनत करते एक युवक के दृश्यों से होती है और यह शुरुआत ही उसके विनम्र आरंभ का प्रतीक भी साबित होता है. इसके बाद इसकी कहानी विश्वासघात, प्रतिद्वंद्विता और अंडरवर्ल्ड की दुनिया से मिलने वाली धमकियों के बीच तेजी से आगे बढ़ती है, जो नायक के संघर्ष करने के जज्बे की तीव्रता को शिद्दत से दिखाती है. व्यावसायिक सफलता प्राप्त करने के साथ जैसे ही राजेश के परिवार का जीवन स्थिरता की ओर कदम बढ़ाता है, उन्हें कानूनी परेशानियों का सामना करने के साथ अंडरवर्ल्ड से जबरन वसूली की धमकियों का सामना करना पड़ता है. लेकिन, चुनौतियों के बीच, राजेश अपने परिवार की रक्षा और एक समृद्ध भविष्य सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ संकल्पित रहता है और अंतत: विजय हासिल करके ही दम लेता है.

कहानी का चरम बिंदु उस सीन में नजर आता है, जहां मुख्य पात्र राजेश एक दहाड़ती भीड़ के सामने सीना ठोककर शान से खड़ा है और यही सीन फिल्म की टैगलाइन- ‘जीरो टू हीरो: ए रियल-लाइफ जर्नी’ को सार्थक करता है. कुल मिलाकर कहें तो इसकी पटकथा इस फिल्म को व्यक्तिगत संघर्षों और जीवन से बड़े टकरावों को पर्दे पर जीवंत करती है. इस फिल्म में राजेश के. अग्रवाल की केंद्रीय भूमिका में रवि भाटिया हैं और रवि फिल्म में छाए हुए हैं. यूं कहिए कि पूरी फिल्म उन्हीं के मजबूत कंधों पर टिकी है. उनके किरदार में जीत-हार से लेकर संघर्ष-अवसाद, आशा-निराशा जैसे सभी भावों का मिश्रण है और सभी रूप में वह बेजोड़ साबित हुए हैं. उनके पिता की भूमिका में दिग्गज अभिनेता ज्ञान प्रकाश, तो पत्नी के रूप में भारती अवस्थी ने उनका बेजोड़ साथ दिया है.

फिल्म में दीक्षा ठाकुर, गोदान कुमार, प्रीटी अग्रवाल, नीरव पटेल जैसे अन्य कलाकार भी राजेश अग्रवाल के जीवन को आकार देते और रिश्तों को जीवंत करते हैं. खास बात यह है कि मूल रूप से अयोध्या की भारती अवस्थी की बॉलीवुड में यह डेब्यू फिल्म है और निश्चित ही उन्होंने अपनी पहली ही फिल्म से अभिनय की अमिट छाप छोड़ी है. अपने अपने किरदारों में गोदान कुमार और नीरव पटेल भी अभिनय के शिखर को छूते नजर आते हैं. बहरहाल, कोई भी फिल्म कितनी भी बेहतरीन क्यों न हो, उसमें कुछ खामियां तो होंगी ही. इस फिल्म का पहला भाग अच्छी गति से आगे बढ़ता है, लेकिन दूसरे भाग में गति थोड़ी धीमी हो जाती है, जो थोड़ा उबाऊ लग सकता है. इसके अलावा, संगीत और बेहतर हो सकता था, जो संगीत प्रेमियों के लिए थोड़ा निराशाजनक हो सकता है.

बता दें, इस फिल्म की शूटिंग भोपाल में हुई है. ‘माय फ्रेंड गणेशा’, ‘माय फ्रेंड गणेशा 2′,’एक्स रेः द इनर इमेज’ जैसी फिल्मों के जरिये दर्शकों का भरपूर मनोरंजन कर चुके निर्देशक राजीव एस. रुईया ने इस बायोपिक फिल्म के हर एंगल पर न केवल अपनी पैनी निगाह रखी है, बल्कि किस कलाकार से क्या और कैसा काम लेना है, यह भी बखूबी कर दिखाया है. फिल्म का छायांकन भी अद्भुत है. बीते हुए समय को दिखाने के लिए सेपिया टोन का इस्तेमाल, संघर्ष के लिए गहरे कंट्रास्ट का उपयोग और विजयोल्लास के लिए भव्य दृश्य का फिल्मांकन कहानी की वास्तविक नाटकीयता में गहरे रंग भरता है. कुल मिलाकर देखा जाए तो आप इस फिल्म को अपने पूरे परिवार के साथ देख सकते हैं. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3 स्टार.



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