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गर्मी से राहत पाने के लिए दक्षिण भारत की पारंपरिक डिशेज बेहतरीन विकल्प बनकर सामने आई हैं. ये व्यंजन न सिर्फ स्वाद में लाजवाब हैं, बल्कि शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने में भी मदद करते हैं. पच्ची पुलुसु से लेकर मैंगो करी और थायिर सडम तक, ये सभी इस सीजन के सुपरफूड साबित हो रहे हैं.
जैसे-जैसे गर्मी का पारा चढ़ रहा है, उत्तर से लेकर दक्षिण तक लोग चिलचिलाती धूप और लू से बचने के उपाय ढूंढ रहे हैं. ऐसे में दक्षिण भारत की पारंपरिक रसोई से निकले कुछ व्यंजन न सिर्फ स्वाद में लाजवाब हैं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने में भी मदद करते हैं. आंध्र प्रदेश के चटपटे पच्ची पुलुसु से लेकर केरल की मलाईदार मैंगो करी तक, ये व्यंजन इस मौसम के सुपरफूड बनकर उभर रहे हैं.
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के घरों में गर्मियों के दौरान पच्ची पुलुसु, यानी बिना पका हुआ इमली का शोरबा, सबसे पसंदीदा व्यंजन है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे बनाने के लिए गैस जलाने की जरूरत नहीं पड़ती. इमली के पानी में कच्ची प्याज, हरी मिर्च और थोड़ा सा गुड़ मिलाकर इसे तैयार किया जाता है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इसमें मौजूद इमली इलेक्ट्रोलाइट्स को संतुलित करती है, जबकि कच्ची प्याज लू से बचाने में मददगार होती है.
तमिलनाडु में गर्मियों का मतलब है थायिर सडम. यह सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि एक भावना है. उबले हुए नरम चावल को ताजे दही के साथ मैश किया जाता है और इसमें राई, करी पत्ता और अदरक का हल्का तड़का लगाया जाता है. दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स पाचन तंत्र को दुरुस्त रखते हैं और चिलचिलाती दोपहर में पेट को तुरंत ठंडक पहुंचाते हैं. कई घरों में इसमें अंगूर या अनार के दाने भी मिलाए जाते हैं, जो इसे और भी ताज़ा बना देते हैं.
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केरल के अंगामली क्षेत्र से मशहूर हुई यह मैंगो करी गर्मियों की खास सौगात है. कच्चे आम को नारियल के दूध और मसालों के साथ पकाकर तैयार किया जाने वाला यह व्यंजन हल्का और सुपाच्य होता है. नारियल का दूध शरीर की आंतरिक गर्मी को कम करता है, वहीं कच्चे आम का खट्टापन विटामिन-सी की कमी को पूरा करता है. यह चावल के साथ बेहतरीन कॉम्बिनेशन बनाता है.
कर्नाटक की रसोई में गर्मी की थकान मिटाने के लिए सौथेकयी मोसारु पाल्या, यानी खीरा-दही सलाद, सब्जी, का उपयोग किया जाता है. चूंकि खीरे में लगभग 95% पानी होता है, इसलिए यह शरीर को हाइड्रेटेड रखने का आसान तरीका है. दही के साथ मिलकर यह एक ऐसा कूलिंग एजेंट बनता है, जो गर्मी से होने वाली जलन और डिहाइड्रेशन को कम करने में मदद करता है.
तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों में चल्ला पुल्लु, यानी छाछ आधारित शोरबा, का सेवन बेहद जरूरी माना जाता है. वहीं अंबली को ‘गरीबों का अमृत’ कहा जाता है, जो तपती धूप में काम करने वाले लोगों को लंबे समय तक ठंडक और ऊर्जा देता है. ये दोनों ही व्यंजन गर्मी से लड़ने का एक प्राकृतिक और किफायती तरीका पेश करते हैं. ऐसे में इस सीजन अपनी डाइट में इन्हें शामिल करना एक समझदारी भरा फैसला हो सकता है.