नई दिल्ली. ‘ओमलो’ एक कल्ट और हार्ड-हिटिंग हिंदी-राजस्थानी सोशल ड्रामा है, जो पेट्रियार्कल सोच, घरेलू हिंसा और पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे साइकोलॉजिकल ट्रॉमा को दिखाता है. थार रेगिस्तान के एक रेतीले गांव के बैकग्राउंड पर बनी डायरेक्टर सोनू रणदीप चौधरी की यह फिल्म समाज की कड़वी सच्चाई की एक झलक दिखाती है, जिसमें घिसे-पिटे एंटरटेनमेंट फॉर्मूलों को छोड़ दिया गया है. चाइल्ड एक्टर शंभो महाजन की मासूमियत और सोनाली शर्मिष्ठा की शानदार परफॉर्मेंस, बिना भारी डायलॉग के भी दर्शकों को बहुत पसंद आती है. वेव्स ओटीटी पर रिलीज हुई यह 1 घंटा 32 मिनट की फिल्म आर्टहाउस सिनेमा पसंद करने वालों के लिए एक हार्ड-हिटिंग और जरूर देखने लायक अनुभव है.
कहानी
फिल्म की शुरुआत राजस्थान के बीकानेर और श्री डूंगरगढ़ के एक दूर और पिछड़े गांव से होती है. सिर पर भारी काम का बोझ उठाए, सावित्री (सोनाली शर्मिष्ठा) थार रेगिस्तान की चिलचिलाती गर्मी में अपने बच्चों के साथ घर लौटती है. यह शुरुआती सीन दर्शकों को गांव के माहौल की मुश्किलों और रोजमर्रा की परेशानियों से आसानी से जोड़ता है. इसके साथ ही, एक बहुत ही कल्ट और सिंबॉलिक सीन सामने आता है, जहां एक ऊंट को खुले रेगिस्तान में उसकी रस्सी खोलकर आजाद कर दिया जाता है. हालांकि, ऊंट अपनी अचानक मिली आजादी को लेकर बहुत अनिश्चित दिखता है. यही सिंबॉलिज्म फिल्म का दिल है. यह दिखाता है कि सदियों से मानसिक बेड़ियों में बंधा समाज अगर आजादी पा भी ले, तो भी उसे अपनाने में हिचकिचाता है.
जब सावित्री घर आती है, तो उसे पता चलता है कि उसके ससुर गुजर गए हैं. यहीं से कहानी एक गहरा और गहरा इमोशनल मोड़ लेती है. एक तरफ अंतिम संस्कार और सामाजिक रीति-रिवाजों का बहुत ज्यादा दबाव है और दूसरी तरफ घर में पैसों की बहुत ज्यादा तंगी है. सावित्री का पति (सोनू रणदीप चौधरी) एक गैर-जिम्मेदार और शराबी आदमी है, जो अपनी ही पत्नी को बहुत ज्यादा मानसिक और शारीरिक शोषण करता है. इस सारी चीख-पुकार, दर्द और लाचारी के बीच, उनका छोटा बेटा ओमलो (शंबो महाजन) अपनी बड़ी मासूम आंखों से चुपचाप देखता रहता है. वह अपनी मां का दर्द बांटना चाहता है और इस कठोर सामाजिक रीति-रिवाज को बदलना चाहता है, लेकिन उसकी कम उम्र और मुश्किल हालात उसे लाचार बना देते हैं. यह कहानी किसी एक इंसान की नहीं, बल्कि उस अनकहे दर्द की है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है और मासूम बच्चों के बचपन को पूरी तरह से खा रहा है.
एक्टिंग
इस रियलिस्टिक फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकारों की मजबूत और नेचुरल परफॉर्मेंस है. चाइल्ड एक्टर शंबो महाजन, जो टाइटल (ओमलो) रोल में हैं. अपनी मासूमियत से दर्शकों का मन मोह लेते हैं. उनके पास ज्यादा डायलॉग नहीं हैं, लेकिन आंखों में बस बेबसी और खामोशी के साथ वह कई इंटेंस सीन में शानदार परफॉर्मेंस देते हैं. सोनाली ने सावित्री के रोल में एक कल्ट परफॉर्मेंस दी है. वह स्क्रीन पर कोई ग्लैमरस एक्ट्रेस नहीं लगतीं, बल्कि एक आम राजस्थानी गांव की पीड़ित और सेल्फ-रिस्पेक्टिंग महिला लगती हैं. उनके चेहरे पर घरेलू हिंसा की थकान और दर्द इतना गहरा है कि दर्शक तुरंत उनसे कनेक्ट कर लेते हैं. सोनू रणदीप चौधरी ने एक शराबी, क्रूर और गैर-जिम्मेदार पति के नेगेटिव रोल में कमाल का काम किया है. उन्होंने अपने किरदार की कड़वाहट और क्रूरता को इतनी अच्छे से दिखाया है कि दर्शक उनसे नफरत करने लगते हैं, जो एक एक्टर के तौर पर उनकी सबसे बड़ी कामयाबी है. वहीं सपोर्टिंग कास्ट में वंदना गुप्ता ने अपने कम स्क्रीन टाइम में एक दमदार और असरदार परफॉर्मेंस दी है. देवा शर्मा और महेश जिलोवा ने भी कहानी की जरूरत के हिसाब से अपने किरदारों को पूरी ईमानदारी और इंटेंसिटी के साथ जीवंत कर दिया है.
डायरेक्शन
सोनू रणदीप चौधरी ने इस फिल्म में न सिर्फ शानदार परफॉर्मेंस दी है, बल्कि एक डायरेक्टर और राइटर के तौर पर एक कल्ट विजन भी दिखाया है. वह कहानी को कमर्शियल सिनेमा की तरह मेलोड्रामैटिक या बहुत ज्यादा ड्रामैटिक बनाने की बड़ी गलती से बचते हैं. उनका फोकस रियलिज्म पर रहता है. उन्होंने राजस्थान के गांवों के असली कल्चर, उनकी बोली, सख्त लाइफस्टाइल और सदियों पुराने पेट्रियार्कल सोशल स्ट्रक्चर को स्क्रीन पर बहुत ध्यान से बुना है. स्क्रीनप्ले थोड़ा धीमा हो सकता है, लेकिन ऑडियंस को बोर करने के बजाय यह उन्हें कहानी के इंटेंस माहौल में पूरी तरह डुबो देता है.
सिनेमैटोग्राफी
टेक्निकल फ्रंट पर सिनेमैटोग्राफर विल्सन रैबिनसे का काम बेहद शार्प और तारीफ के काबिल है. उन्होंने बंद स्टूडियो सेट्स के बजाय श्री डूंगरगढ़ और बीकानेर की असली और सख्त लोकेशन्स का बहुत अच्छा इस्तेमाल किया है. उन्होंने रेगिस्तान की कभी न खत्म होने वाली दूरी, रेत की चिलचिलाती गर्मी और गांव के मिट्टी के घरों की सादगी को इतने कल्ट स्टाइल में कैप्चर किया है कि हर फ्रेम एक लाइव डॉक्यूमेंट्री जैसा लगता है. विजुअल्स फिल्म के सीरियस मूड को और सपोर्ट करते हैं.
म्यूजिक
फिल्म का म्यूजिक इसके इमोशनल कोशंट में एक जबरदस्त एज जोड़ता है. नेशनल अवॉर्ड-विनिंग कंपोजर गाजी खान बरना और भुवन आहूजा का कल्ट राजस्थानी लोक म्यूजिक सीन की सेंसिटिविटी को बढ़ाता है. मिट्टी की खुशबू से सजे ये गाने दिल को छू जाते हैं. वहीं, देवेंद्र भोम का बैकग्राउंड स्कोर (BGM) एक शांत लेकिन दमदार असर डालता है. जहां शांति की जरूरत थी, उन्होंने सीन की कड़ी खामोशी को अपने मुख्य हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया, ताकि म्यूजिक का ओवरडोज न हो.
कमियां
हर आर्टिस्टिक फिल्म की तरह ‘ओमलो’ में भी कुछ कमियां हैं, जो आम मसाला फिल्म पसंद करने वालों के लिए थोड़ी मुश्किल हो सकती हैं. फिल्म का स्क्रीनप्ले बहुत धीमी रफ्तार से आगे बढ़ता है. यह धीमापन उन दर्शकों के लिए थोड़ा भारी पड़ सकता है जो कमर्शियल, हार्ड-हिटिंग थ्रिलर या तेज रफ्तार वाली फिल्मों के आदी हैं. फिल्म का मकसद दर्शकों का मनोरंजन करना या उन्हें हंसाना नहीं है, बल्कि एक कठोर सामाजिक संदेश देना है. इसलिए जो दर्शक सिर्फ टाइम-पास या हल्का-फुल्का सिनेमा देखना चाहते हैं, उन्हें यह फिल्म काफी गंभीर और भारी लग सकती है.
अंतिम फैसला
कुल मिलकार अगर पूरे सिनेमाई अनुभव का निष्पक्ष रूप से विश्लेषण किया जाए, तो ‘ओमलो’ सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि समाज के उन हिस्सों की कठोर सच्चाइयों का एक कठोर और संवेदनशील डॉक्यूमेंट है, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. यह फिल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि बचपन में देखा गया दर्द और हिंसा कैसे किसी व्यक्ति के पूरे भविष्य को एक उथल-पुथल भरी भूलभुलैया में बदल सकती है. ओमलो का किरदार यहां सिर्फ एक बच्चा नहीं है, बल्कि उस कभी न खत्म होने वाले अंधेरे के बीच बदलाव की एक चमकती हुई उम्मीद है. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार.