नई दिल्ली. 29 मई 2026 को थिएटर में रिलीज होने वाली ‘रजनी की बारात’ एक फैमिली एंटरटेनर है, जो एक छोटे शहर में सेट है और एक ही झटके में पुरानी सोच को तोड़ती है. बिहार के दरभंगा के वाइब्रेंट कल्चर के बीच, डायरेक्टर आदित्य अमन ने एक हिम्मती लड़की, ‘रजनी’ (उल्का गुप्ता) की कहानी बुनी है, जो एक बैंड के साथ, अपने प्यार को पूरा करने के लिए इंस्पेक्टर मलखान सिंह के दरवाजे पर खड़ी होती है. यह फिल्म मॉडर्न सिनेमा का आईना है, जो एंटरटेनमेंट और ‘गर्ल पावर’ का एक अनोखा, देसी अंदाज देती है.
कहानी
फिल्म ‘रजनी की बारात’ की शुरुआत ही देखने वाले को अंदर तक हिला देती है. बिहार के कल्चरल और हिस्टोरिकल शहर दरभंगा की धुंधली सुबह और शांत सड़कों के बीच, मेन कैरेक्टर, रजनी (उल्का गुप्ता), अपने गुजर चुके पिता के पुराने, जंग लगे स्कूटर के पास खड़ी है. वह रो रही है, उसकी आंखों में बिना जवाब वाले सवाल भरे हैं और वह आसमान की तरफ देखती है, अपनी याद में एक ही कहावत दोहराती है- ‘राम जाने…’ यह शुरुआती सीन ही रजनी के कैरेक्टर की इमोशनल गहराई को दिखाता है. रजनी, एक बहुत ही बिंदास, बेबाक, फिर भी उतनी ही सेंसिटिव लड़की है, जो दरभंगा की गलियों, लोकल चाय की दुकानों और चौराहों पर पली-बढ़ी है. उसके घर में उसकी मां (सुनीता राजवार) हैं, जिनकी सुबह रजनी को डांटने से शुरू होती है और उसकी दादी (जरीना वहाब), जो रजनी की सबसे बड़ी ढाल और सहारे की चीज हैं.
कहानी में रोमांस तब शुरू होता है जब रजनी को शहर के एक सीधे-सादे, शर्मीले और शायर लड़के रज्जन (कनिष्क विजय) से प्यार हो जाता है. रज्जन एक अच्छा कवि है, लेकिन असल जिंदगी में वह इतना डरपोक है कि अपने पिता के सामने बोल भी नहीं पाता और उसके पिता कोई आम आदमी नहीं, बल्कि शहर के सबसे डरपोक, सख्त और प्यार करने वालों के पक्के दुश्मन इंस्पेक्टर मलखान सिंह (अश्वथ भट्ट) हैं. मलखान सिंह का बस एक ही नियम है- ‘जब तक मैं यहां हूं, शहर में प्यार के रिश्ते नहीं चलेंगे…’
अपना असर बढ़ाने के लिए, मलखान सिंह रज्जन की शादी एक अमीर घराने की लड़की राधा (इशिता सिंह) से करवा देता है., लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट एक दिन आता है जब इंस्पेक्टर मलखान सिंह खुद रज्जन और रजनी को एक पार्क में रंगे हाथों पकड़ लेते हैं. जहां रज्जन डर के मारे कांपता है और घुटनों के बल गिर जाता है, वहीं रजनी बिना डरे, मलखान सिंह की आंखों में देखकर अपने प्यार का इजहार कर देती है. जब मलखान सिंह शादी रोकने की पूरी कोशिश करता है, तो रजनी एक ऐतिहासिक और बागी फैसला लेती है- वह ऐलान करती है कि वह खुद रज्जन के घर अपनी ‘बारात’ लेकर जाएगी. यहीं से छोटे शहर के यूट्यूबर्स (निश्चल आनंद), दोस्तों (पुष्पक आनंद और चांदनी चौधरी) और पूरे मोहल्ले की गॉसिप का एक मजेदार खेल शुरू होता है, जो क्लाइमैक्स तक फिल्म को एक रोलरकोस्टर राइड में बदल देता है.
डायरेक्शन
डायरेक्टर आदित्य अमन ने इस फिल्म से यह साबित कर दिया है कि वह छोटे शहरों की नब्ज को बहुत अच्छे से समझते हैं. आमतौर पर जब बॉलीवुड फिल्में बिहार को बैकग्राउंड में लेकर बनती हैं, तो वे सिर्फ बंदूक, मिर्जापुर-स्टाइल गैंग वॉर, गरीबी, जातिवाद या माइग्रेशन जैसे मुद्दों पर फोकस करती हैं. लेकिन, आदित्य अमन ने इस स्टीरियोटाइप को तोड़ा है. उन्होंने बिहार को खूबसूरत, रंगीन, प्रोग्रेसिव और कल्चरल रूप से रिच दिखाया है. वह फिल्म में ‘गर्ल पावर’ या ‘विमेन एम्पावरमेंट’ के मुद्दे को किसी भारी-भरकम लेक्चर की तरह पेश नहीं करते, बल्कि हल्के-फुल्के, मजेदार और इमोशनल सीन के जरिए दर्शकों के दिलों को छूते हैं. रजनी, उसकी मां और उसकी दादी के बीच के घरेलू सीन इतने साफ हैं कि आपको ऐसा लगता है जैसे आप अपने ही पड़ोस के किसी घर में झांक रहे हों.
सुनीता राजवार ने एक मिडिल-क्लास बिहारी मां का रोल किया है, जो अपनी बेटी के भविष्य को लेकर परेशान भी है और उससे बहुत प्यार भी करती है. उनकी कॉमिक टाइमिंग शानदार है. वहीं, दादी के रोल में जरीना वहाब ने फिल्म में मां जैसा प्यार और अपनापन भर दिया है. कनिष्क विजय ने एक दबे-कुचले, डरे हुए, लेकिन सच्चे प्रेमी का रोल पूरी ईमानदारी से किया है. उनकी मासूमियत दर्शकों को पसंद आती है. इसके अलावा, लोकल यूट्यूबर ‘जेपी ज्वालाप्रसाद’ के रोल में निश्चल आनंद और दोस्तों के रोल में पुष्पक आनंद (निशांत) और चांदनी चौधरी (कुसुम) ने फिल्म का ह्यूमर और एंटरटेनमेंट का लेवल कम रखा है.
सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी शानदार है. कैमरा दरभंगा की असली जगहों, उसके पुराने घरों पर बनी नक्काशी, तालाब के किनारे और छोटे शहरों के बाजारों की तंग गलियों को बहुत खूबसूरती से कैप्चर करता है. लाइटिंग का इस्तेमाल बहुत अच्छे से किया गया है, खासकर फिल्म के इमोशनल और रोमांटिक सीन में. कलर पैलेट में एक खास इंडियन गर्मजोशी है, जो फिल्म को एक अच्छा और दिलचस्प अनुभव बनाती है.
म्यूजिक
‘रजनी की बारात’ का म्यूजिक फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाता है. फिल्म में लोक संगीत का इस्तेमाल बहुत समझदारी से किया गया है. इसके रोमांटिक गाने कानों को सुकून देते हैं, वहीं रजनी जब अपनी बारात लेकर निकलने की तैयारी करते हैं तो बैकग्राउंड में बजने वाले ढोल और लोक धुनों का फ्यूजन दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है. बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के सीन के असर को दोगुना करने में पूरी तरह कामयाब है.
कमियां
हालांकि फिल्म हर तरह से बेहतरीन है, लेकिन कुछ जगहों पर इसकी कमियां साफ दिखती हैं. इंटरवल के ठीक बाद फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी हो जाती है, जहां कहानी कुछ देर के लिए भटकती हुई लगती है. हीरो को रजनी से काफी कमजोर दिखाया गया है. कुछ सीन में ऐसा लगता है कि उनके किरदार को थोड़ा और एग्रेसिव बनाया जा सकता था ताकि उनकी केमिस्ट्री और साफ दिखती.
अंतिम फैसला
‘रजनी की बारात’ सिर्फ एक लड़के और लड़की के बीच की आम लव स्टोरी नहीं है, बल्कि बदलते भारत के छोटे शहरों की बेटियों की कहानी है जो अब अपने हक, अपने प्यार और अपने फैसलों के लिए समाज की पुरानी सोच वाली दीवारों को चुनौती देने की हिम्मत रखती हैं. यह फिल्म समाज के उन डबल स्टैंडर्ड पर भी तीखा और मीठा वार करती है जो मानते हैं कि प्यार या शादी का इजहार करने में हमेशा लड़कों को ही पहला कदम उठाना चाहिए. बेहतरीन एक्टिंग, शानदार डायरेक्शन, हंसी और आंसुओं का यह खूबसूरत मेल इस वीकेंड आपके पूरे परिवार के साथ थिएटर में जरूर देखना चाहिए. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3 स्टार.