कुछ फिल्में केवल मनोरंजन के लिए होती हैं, और कुछ ऐसी होती हैं जो दिल में उतरकर हमेशा के लिए बस जाती हैं. कायोज ईरानी की ‘सरजमीं’ ऐसी ही एक फिल्म है, जिसका आगाज धीरे-धीरे होता है, मगर यह एक भावनात्मक तूफान में बदल जाती है. कश्मीर के तनावपूर्ण माहौल में बनी यह फिल्म बिना किसी लाग-लपेट के सीधे अपनी कहानी पर आती है, और दर्शक को इसमें रमने में ज्यादा समय नहीं लगता. यह आपको एक ऐसे परिवार के भीतर खींच लेती है, जो बिखरने की कगार पर है.
कहानी की धुरी पर हैं कर्नल विजय मेनन (पृथ्वीराज सुकुमारन), जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की रक्षा में लगा दिया है. उनकी पत्नी मेहर (काजोल) ने अपने बेटे को हर मुश्किल से बचाने में अपनी जिंदगी खपा दी, लेकिन तब क्या होता है, जब उनका अपना बेटा- हरमन (इब्राहिम अली खान) ही देश के लिए एक खतरा बन जाता है? एक ऑपरेशन के दौरान, विजय को पता चलता है कि उनका लापता बेटा हरमन किसी आतंकवादी संगठन से जुड़ा हो सकता है. इस सच का सामना करते हुए, उनकी पत्नी मेहर इस भावनात्मक उथल-पुथल में फंस जाती है, क्योंकि परिवार एक ऐसी स्थिति का सामना करता है जहां व्यक्तिगत रिश्ते राष्ट्रीय जिम्मेदारियों से टकराव में आ जाते हैं.
काजोल अपने किरदार में जान डाल देती हैं. उनका दर्द चीखने-चिल्लाने वाला नहीं है, बल्कि वह अंदरूनी और गहरी पीड़ा सा मालूम पड़ता है, जो दर्शक को भीतर तक झकझोर देता है. पृथ्वीराज का किरदार उस दर्द को दर्शाता है, जिसे केवल एक पिता ही महसूस कर सकता है- जब अनुशासन विश्वासघात जैसा लगने लगता है. दोनों ने मां और पिता की भूमिका में शानदार अभिनय कर दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है.
लेकिन, फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज इब्राहिम अली खान हैं. उन्होंने हरमन को केवल एक खलनायक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे लड़के के रूप में निभाया है जो किसी भी चीज में विश्वास करने के लिए बेताब है. उनके चेहरे के हाव-भाव और डरावनी आंखें बिना संवाद के भी गहरा प्रभाव छोड़ जाती हैं. उन्होंने अपने रियल पिता सैफ अली खान के मशहूर ‘लंगड़ा त्यागी’ वाले किरदार की याद दिलाई है. इब्राहिम ने इस किरदार के लिए अपने भीतर के शैतान को बाहर निकालकर जोरदार अभिनय किया है. एक ‘चॉकलेटी बॉय’ से एक कच्चे और गंभीर आतंकवादी में उनका परिवर्तन प्रभावशाली है. उन्होंने हरमन के किरदार में एक खास संवेदनशीलता और गंभीरता ला दी है, जो आपको उसकी कहानी जानने के लिए मजबूर करती है.
फिल्म का लेखन बेहद धारदार है और विजुअल्स शानदार हैं, लेकिन कहीं भी दिखावटी नहीं लगते. ‘सरजमीन’ एक क्रूर और विचारोत्तेजक सवाल पूछती है- आप क्या करेंगे जब युद्ध बाहर नहीं, बल्कि आपके अपने घर के अंदर हो? यह ऐसी फिल्म नहीं है जिसे आप देखकर भूल जाएंगे. यह आपके साथ रहती है, आपके जहन में गहरे उतर जाती है.
‘सरजमीन’ देशभक्ति, प्यार और बीच की उस जमीन की कहानी है, जो सीधे दिल पर वार करती है. यह निश्चित रूप से ‘मिशन कश्मीर’ और ‘फिजा’ वाले ऋतिक रोशन की याद दिलाती है. इब्राहिम अली खान ‘सरजमीन’ के साथ निश्चित रूप से एक बड़ी छलांग लगा रहे हैं, और यह फिल्म एक बेहतरीन थ्रिलर का वादा करती है जो उन्हें हिंदी सिनेमा में एक अलग पहचान दिला सकती है. काजोल और पृथ्वीराज जैसे अनुभवी कलाकारों के दमदार अभिनय के साथ, फिल्म सही दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.