नई दिल्ली. डायरेक्टर रेनी हार्लिन ने इस पूरी ट्रायोलॉजी (तीन फिल्मों की सीरीज) को एक साथ शूट किया. पहला पार्ट 2024 में रिलीज हुआ, दूसरा 2025 में और अब आखिरी चैप्टर 6 फरवरी, 2026 को भारत में रिलीज हुआ है, लेकिन क्या यह एंडिंग जबरदस्त सफल है? आइए विस्तार से जानते हैं.

कहानी
कहानी वहीं से शुरू होती है जहां पिछला पार्ट खत्म हुआ था. हमारी ‘फाइनल गर्ल’ माया (मैडलिन पेट्सच), अभी भी अपनी जान बचाने के लिए भाग रही है. इस बार, वह एक अजीब धार्मिक जंगल समुदाय के बीच फंस गई है. उसके साथ ग्रेगरी (गेब्रियल बासो) है, जो एक और सर्वाइवर है और अभी भी पिछले ट्रॉमा से जूझ रहा है. एक नया ट्विस्ट तब आता है जब माया की बहन डेबी (राहेल शेंटन), अपनी बहन को ढूंढते हुए इस डरावने शहर में आती है. उसे नहीं पता कि जवाबों से ज्यादा नकाबपोश हत्यारे उसका इंतजार कर रहे हैं. शेरिफ रोटर (रिचर्ड ब्रेक), जो शुरू से ही संदिग्ध लग रहा था, इस पार्ट में अपने असली रंग दिखाता है. लेकिन समस्या यह है कि जब तक यह खुलासा होता है, दर्शक पहले ही बोरियत की हद तक पहुंच चुके होते हैं.

डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले
रेनी हार्लिन एक अनुभवी डायरेक्टर हैं, लेकिन ‘द स्ट्रेंजर्स: चैप्टर 3’ में उनकी पकड़ ढीली लगती है. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी पेसिंग है. फिल्म में कई ऐसे सीन हैं जहां किरदार एक बार में 30 मिनट तक अंधेरे में इधर-उधर भागते रहते हैं. ऐसा लगता है कि फिल्म बनाने वालों के पास सिर्फ 20 मिनट की कहानी थी, लेकिन उन्हें इसे दो घंटे की फिल्म में खींचने के लिए मजबूर किया गया. फिल्म देखते समय ऐसा लगता है जैसे 90 के दशक की कोई घिसी-पिटी हॉरर फिल्म देख रहे हों. वेस क्रेवन की ‘स्क्रीम’ (1996) का सस्पेंस और पेस इस 2026 की फिल्म में बिल्कुल गायब है.

एक्टिंग
एक्टर्स अपनी पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट उनके हाथ बांध देती है. ‘रिवरडेल’ स्टार मैडेलाइन को शायद उम्मीद थी कि यह फिल्म उन्हें हॉरर की नई ‘क्वीन’ बनाएगी, लेकिन उनके एक्सप्रेशन वही पुराने हैं. उनमें वह ‘सर्वाइवर स्पिरिट’ नहीं है जो कभी नेव कैंपबेल या जेमी ली कर्टिस में देखी गई थी. गेब्रियल के पास डरे हुए दिखने के अलावा कुछ खास करने को नहीं है. रिचर्ड ब्रेक, एक अच्छे एक्टर हैं, लेकिन उन्हें एक ऐसे विलेन के रूप में दिखाया गया है जिसके मकसद और कनेक्शन बचकाने लगते हैं. ऑस्कर विजेता राहेल की मौजूदगी थोड़ी हैरान करने वाली है. उन्हें ‘नए खून’ के तौर पर लाया गया था, लेकिन उनका ट्रैक भी वही पुराना ‘भागो और मारो’ वाला रूटीन ही रहता है.

एक छूटा हुआ मौका
फिल्म में एक बहुत ही दिलचस्प आइडिया छिपा हुआ था- एक अमेरिकी कम्युनिटी जो अपने बीच खूनी हत्यारों को पनाह देती है, बशर्ते वे सिर्फ ‘बाहरी लोगों’ का शिकार करें. यह कॉन्सेप्ट आज के समय में बहुत असरदार हो सकता था, लेकिन इस पर फोकस करने के बजाय, मेकर्स ने सिर्फ खून-खराबे और जंप स्केयर पर ध्यान दिया. फिल्म की लाइटिंग इतनी तेज है कि यह नकाबपोश हत्यारों का डर पूरी तरह खत्म कर देती है. ओरिजिनल फिल्म में जो रहस्यमयी अंधेरा था, वह यहां पूरी तरह गायब है.

कमियां
ऐसा लगता है कि मेकर्स ने सिर्फ पैसे कमाने के लिए एक छोटी कहानी को तीन फिल्मों में खींच दिया. चैप्टर 1 और 2 पहले ही फ्लॉप थे, और चैप्टर 3 ने ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है. हॉरर फिल्मों में थोड़ी तर्कहीनता स्वीकार्य है, लेकिन यहां किरदार इतने बेवकूफी भरे फैसले लेते हैं कि आप डरने के बजाय उन पर हंसने लगते हैं. फिल्म डराती नहीं है; यह आपको थका देती है. फिल्म खत्म होने के बाद आपको एक भी यादगार सीन याद नहीं रहेगा.

अंतिम फैसला
‘द स्ट्रेंजर्स- चैप्टर 3’ उन लोगों के लिए एक सबक है जो सोचते हैं कि वे पुरानी हिट फिल्म का नाम इस्तेमाल करके और उसे ट्रायोलॉजी बनाकर दर्शकों को बेवकूफ बना सकते हैं. 2008 की ओरिजिनल फिल्म एक क्लासिक थी जिसे दोस्तों के साथ स्लीपओवर के दौरान देखा जा सकता था, लेकिन यह 2026 वाला वर्जन पूरी तरह से बकवास है. थिएटर में तभी जाएं जब आपके पास बहुत सारा खाली समय हो और आप देखना चाहते हों कि हॉरर फिल्में कितनी खराब हो सकती हैं. नहीं तो, घर पर पुरानी ‘द स्ट्रेंजर्स’ को दोबारा देखना कहीं बेहतर ऑप्शन है. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 2 स्टार.



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