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Babool ki Fali ka Achar Recipe and Benefits: राजस्थान की पारंपरिक रसोई में बबूल की फली का अचार अपने अनोखे स्वाद और औषधीय गुणों के लिए बेहद लोकप्रिय है. गृहणी सुशीला के अनुसार, इसे बनाने के लिए ताजी हरी फलियों को उबालकर उनकी कड़वाहट निकाली जाती है और फिर उन्हें सुखाकर मसालों के साथ तैयार किया जाता है. इस अचार में सरसों का तेल, मेथी, सौंफ, राई और हींग जैसे पाचक मसालों का उपयोग होता है, जो इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखते हैं. 2 से 3 दिन की धूप दिखाने के बाद यह अचार पूरी तरह तैयार हो जाता है. यह न केवल खाने का जायका बढ़ाता है, बल्कि पाचन और रोग प्रतिरोधक क्षमता सुधारने में भी मददगार साबित होता है. शहरों में भी अब इस पारंपरिक राजस्थानी अचार की मांग तेजी से बढ़ रही है.

अचार का नाम आते ही अक्सर कैरी, हरी मिर्च और नींबू की याद आती है, लेकिन राजस्थान की पारंपरिक रसोई में बबूल की हरी फलियों का अचार एक बेहद खास और विशिष्ट स्थान रखता है. यह अचार न केवल अपने अनोखे और सोंधे स्वाद के लिए मशहूर है, बल्कि औषधीय गुणों का खजाना भी माना जाता है. ग्रामीण इलाकों में, विशेषकर गर्मियों के मौसम में जब बबूल के पेड़ों पर ताजी फलियां आती हैं, इसे बड़े चाव से तैयार किया जाता है. इसका तीखा, खट्टा और चटपटा स्वाद सादे खाने के जायके को भी दोगुना कर देता है और सही तरीके से रखने पर यह लंबे समय तक खराब नहीं होता.

बबूल की फलियों का अचार बनाना जितना सरल है, सेहत के लिए यह उतना ही गुणकारी भी माना जाता है. इसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाने में सहायक होते हैं. इस अचार को तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक मसाले जैसे मेथी, सौंफ और शुद्ध सरसों का तेल न केवल इसके स्वाद को बढ़ाते हैं, बल्कि पाचन तंत्र को भी दुरुस्त रखते हैं. यही वजह है कि औषधीय गुणों से भरपूर यह अचार अब गाँवों की चौखट लांघकर शहरों में भी अपनी खास पहचान बना रहा है और लोग इसे बड़े चाव से अपने भोजन का हिस्सा बना रहे हैं.

गृहणी सुशीला के अनुसार, इस स्वादिष्ट और पारंपरिक अचार को तैयार करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण सामग्री ताजी और कच्ची बबूल की फलियां हैं. इसके अलावा, शुद्ध सरसों का तेल, राई, मेथी दाना, सौंफ, हल्दी, तीखी लाल मिर्च, नमक और थोड़ी सी हींग की आवश्यकता होती है. ये सभी मसाले न केवल अचार को एक बेहतरीन सोंधी खुशबू देते हैं, बल्कि इसके स्वाद को भी निखारते हैं. यदि आप अचार में थोड़ा खट्टापन अधिक पसंद करते हैं, तो इसमें अमचूर पाउडर भी मिलाया जा सकता है. मसालों और तेल का सही अनुपात ही इस अचार को लंबे समय तक खराब होने से बचाता है और इसका जायका बरकरार रखता है.

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बबूल की फली का अचार तैयार करने की प्रक्रिया बहुत ही सरल और पारंपरिक है. सबसे पहले ताजी हरी फलियों को साफ पानी से अच्छी तरह धो लें. इसके बाद, एक कुकर में पानी भरकर फलियों को 3 से 4 सीटी आने तक उबालें. उबालने की यह प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे फलियों का स्वाभाविक कड़वापन पूरी तरह निकल जाता है. उबलने के बाद फलियों को पानी से छानकर अलग कर लें और उन्हें धूप या हवा में अच्छी तरह सूखने के लिए छोड़ दें. जब फलियों की नमी पूरी तरह खत्म हो जाए, तब उन्हें अपनी पसंद के छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें. यह तैयारी न केवल अचार के स्वाद को संतुलित करती है, बल्कि मसालों को फलियों के अंदर तक समाने में मदद करती है.

सूखी हुई फलियों को एक बड़े बर्तन में लेकर उसमें राई, दरदरी पिसी मेथी, सौंफ, हल्दी, चटपटी लाल मिर्च, स्वादानुसार नमक और हींग का मिश्रण तैयार करें. सभी मसालों को फलियों के साथ अच्छी तरह मिलाना बेहद जरूरी है ताकि मसालों का स्वाद हर एक टुकड़े में गहराई तक समा जाए. इस प्रक्रिया के दौरान सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फलियों में ज़रा भी नमी (Moisture) नहीं होनी चाहिए; यदि फलियां पूरी तरह सूखी होंगी, तभी अचार लंबे समय तक सुरक्षित और टिकाऊ बना रहेगा. मसालों का यह सही तालमेल ही अचार के असली राजस्थानी ज़ायके को निखारता है.

अंत में, सरसों के तेल को एक कड़ाही में तब तक अच्छी तरह गर्म करें जब तक कि उसमें से धुआं न निकलने लगे, और फिर उसे पूरी तरह ठंडा होने दें. तेल के ठंडा होने के बाद इसे मसालेदार फलियों के मिश्रण में डालें और अच्छी तरह मिलाएं. तैयार अचार को एक साफ और पूरी तरह सूखे कांच के जार में भरें. अचार के स्वाद को और अधिक निखारने के लिए इसे 2 से 3 दिन तक हल्की धूप में रखें. कुछ ही दिनों में मसालों का स्वाद फलियों में अच्छी तरह समा जाएगा और यह खाने के लिए तैयार हो जाएगा. इस पारंपरिक विधि से बना अचार कई महीनों तक खराब नहीं होता और अपने औषधीय गुणों के साथ भोजन का ज़ायका बढ़ाता रहता है.



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