(डॉ. रामेश्वर दयाल)
Famous Food Outlets In Delhi: हिंदी साहित्य में रीतिकाल के चार प्रतिष्ठित कवियों में से एक कवि बिहारी ने ‘बिहारी सतसई’ नामक ग्रंथ लिखा है, जिसके बारे में उन्होंने कहा है कि ‘सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर, देखन में छोटे लगे घाव करें गंभीर.’ इसका मोटा-मोटा अर्थ यह है कि उनके दोहे फूंकनी से फेंके जाने वाले तीर के समान हैं, जो देखने में तो छोटे लगते हैं लेकिन घाव (गहरा अर्थ) करते हैं. अब कहा जा सकता है कि इस खान-पान के कॉलम में बिहारी जी और उनका यह दोहा कहां से आ गए.
तो हम आपको बताते हैं कि आज हम आपको चाट-पकौड़ी की ऐसी दुकान पर लेकर चल रहे हैं, जो है तो बहुत छोटी सी, लेकिन अगर आप उसके दही-भल्ले, पापड़ी-चाट आदि खा लेंगे तो वे आपके दिल-दिमाग और पेट में गहरी छाप छोड़ देंगे. असल में इस दुकान को पुरानी दिल्ली की ऐतिहासिक दुकान कहा जा सकता है. इस छोटी सी दो-मंजिला दुकान के मालिक दावा करते हैं कि उनकी यह दुकान मुगलकाल से है.
चार फुट की ऊंचाई पर चार फुट की दुकान के हैं जलवे
सीधी सी बात यही है कि अगर यह दुकान मुगलकाल की है तो चांदनी चौक में ही होगी. आपने सही समझा. चांदनी चौक मेन बाजार में चलते हुए जब आप फव्वारा चौक को पार करेंगे तो बंगाली मिठाईयों की मशहूर दुकान ‘अन्नपूर्णा’ के बगल में ही मेनरोड पर आपको ‘श्री बालाजी चाट भंडार’ नाम से एक बहुत ही छोटी दुकान दिख जाएगी. यह दुकान करीब चार फुट की ऊंचाई पर है और इतनी ही चौड़ी होगी. इसमें सिर्फ एक ही व्यक्ति ही बैठ सकता है. बाकी स्पेस में खान-पान का सामान फंसा सा दिखाई देता है. इस चार फुट की दुकान के नीचे एक और छोटी सी दुकान है, जहां पर आलू की सब्जी और कचौड़ी बेची जाती है. यह दुकान अभी कुछ साल पहले की खोली गई है. असली दुकान तो ऊपर वाली है, जहां चाट-पकौड़ी मिलती है. इलाके के लोग भी मानते हैं कि बाजार में जितनी भी खाने-पीने की दुकानें हैं, उसमें यह दुकान सबसे पुरानी है और नाम भी कमा रही है. हम आपको यह भी बताना चाहते हैं कि दही-भल्ले या भल्ला-पापड़ी का मौलिक (Original) चखना है तो इस दुकान से बेहतर कोई दुकान नहीं है.
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दही-भल्ले और भल्ले-पापड़ी के चाहने वालों की कमी नहीं
इस दुकान पर ले-देकर कुछ आइटम ही बिकते हैं, जिनमें दही-भल्ले, भल्ले-पापड़ी, कलमी-बड़ा चाट, गोलगप्पे, पापड़ी चाट शामिल हैं. लेकिन इन गिने-चुने आइटमों के बावजूद इस दुकान का स्वाद जुबान पर बोलता है. जब भी आप इस दुकान पर पहुंचेंगे, आपको हमेशा मजमा सा लगा दिखाई देगा. दुकानदार भी मानते हैं कि इन आइटमों में सबसे अधिक मांग दही-भल्ले, भल्ले-पापड़ी की है. आप पैसे पकड़ाकर ऑर्डर देंगे तो एक बड़े दोने में पानी में रखे भल्ली को निचोड़कर उस पर फैला दिया जाएगा, उस पर पापड़ी रखी जाएगी. फिर इस पर उबलू आलू व चने छिड़के जाएंगे, साथ में चटपटा कचालू भी रखा जाएगा. फिर इस डिश पर दो प्रकार का मसाला भुरका जाएगा, जो इनकी डिश की यूएसपी है. इसके बाद गाढ़ी दही उडेंली जाएगी, ऊपर से अमचूर वाली मीठी चटनी (पुरानी दिल्ली में इसे सौंठ कहा जाता है) और उसके ऊपर पुदीने वाली चटनी डालकर लकड़ी के चम्मचों के साथ परोस दिया जाएगा.
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इस डिश को खाते ही आप महसूस करेंगे कि दही-भल्ले का असली स्वाद है तो यही है और यहीं पर है. इसी तरह इनके गोलगप्पे और उनका हींग वाला पानी और कांजी वड़ा का अजवायन वाला पानी अलग ही स्वाद देता है. इस पानी में इनके अलावा 10 अलग किस्म के मसाले और जड़ी-बूटी मिलाई जाती है. गोलगप्पे 30 रुपये के चार हैं, कांजी वड़ा 40 रुपये का और बाकी आइटम 50 रुपये के हैं.
152 साल पुरानी है दुकान, भल्ले-पापड़ी का काम पहले से जारी है
इस दुकान की जिम्मेदारी अब पांचवीं पीढ़ी के दो भाइयों तरुण और वरुण कश्यप के पास है. ये भाई अपने खानदानी काम को जिम्मेदारी से संभाले हुए हैं. यह दुकान करीब 152 साल पुरानी है. लेकिन इससे पहले भी बाजार में इन्हें छाबे (टोकरी) पर बेचा जा रहा था. दुकान को वर्ष 1870 में रघुनाथ प्रसाद ने शुरू किया था. उनके बेटे दर बेटे यह दुकान छन्नूमल, चंदूलाल और राजकुमार ने संभाली. आज उनके दो बेटे इस काम को बखूबी संभाल रहे हैं. उनका कहना है कि हमारी हर आइटम घर में ही तैयार की जाती है और मसालों की लिस्ट भी सालों पुरानी है.
‘श्री बालाजी चाट भंडार’की दुकान करीब 152 साल पुरानी है.
पुरानी दिल्ली के जो लोग विदेश चले गए, जब वे दिल्ली आते हैं तो हमारे बाप-दादों के बारे में बताते हुए दही-भल्ले खाते हैं और कहते हैं कि भाई, तुम्हारा स्वाद नहीं बदला है. सुबह 11 बजे दुकान खुल जाती है और सामान्य दिनों में रात 11 बजे तक चलती है. कोई अवकाश नहीं है.
नजदीकी मेट्रो स्टेशन: चांदनी चौक
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