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Bhang Chutney Recipe : खिचड़ी से लेकर रोटी तक का स्वाद बढ़ाने के लिए आप चटनी जरूर खाते होंगे. इसमें टमाटर की चटनी का कोई जवाब नहीं, लेकिन अगर आप एक बार पहाड़ी बीजों की चटनी चख लें तो दीवाने हो जाएंगे. हम बात कर रहे हैं भांग के बीजों की. शिवरात्रि पर भांग के पत्तों की ठंडाई आपने पी होगी, लेकिन इसके बीजों की चटनी का स्वाद ही अलग है. भांग के बीजों में प्रचुर मात्रा में ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड, प्रोटीन और फाइबर पाए जाते हैं. यही कारण है कि पहाड़ी बुजुर्ग हमेशा भोजन में इस सुपरफूड को शामिल करने की सलाह देते हैं. सादे से सादे खाने में भी एक चम्मच भांग की चटनी मिला देने से भोजन का जायका कई गुना बढ़ जाता है.
देवभूमि उत्तराखंड का खान-पान जितना सादा है, सेहत और स्वाद के मामले में उतना ही लाजवाब भी है. पहाड़ी रसोई की कई ऐसी खास रेसिपी भी है, जो आम सामग्री से हटकर तैयार की जाती हैं. ये है भांग के बीजों की चटनी. आमतौर पर भोजन के साथ टमाटर या धनिया की चटनी खाई जाती है, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ों में भांग के बीजों से बनी चटनी का स्वाद हर किसी का फेवरेट है.
आजकल देहरादून के युवाओं और स्ट्रीट फूड प्रेमियों के बीच ‘झोल मोमो’ की मांग तेजी से बढ़ रही है. मोमो के तीखे और मसालेदार झोल का स्वाद बढ़ाने के लिए अब पारंपरिक भांग के बीजों की चटनी का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसका अनोखा, नटी और हल्का खट्टा-तीखा स्वाद झोल मोमो के जायके में चार चांद लगा देता है. यही वजह है कि दून घाटी के स्ट्रीट फूड लवर्स की जुबान पर यह चटनी चढ़ रही है.
उत्तराखंड की संस्कृति में भांग के बीजों का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है. शिवरात्रि के मौके पर भांग के पत्तों से बनी ठंडाई और प्रसाद का धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व है. इसके बीजों को रोजमर्रा के भोजन का जरूरी हिस्सा माना जाता है. पहाड़ी इलाकों में बरसात और सर्दियों के मौसम में भांग के बीजों की चटनी, सब्जी और नमकीन बहुत चाव से खाई जाती है, क्योंकि यह शरीर को अंदरूनी रूप से गर्माहट देती है.
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भांग के बीज औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं और इनमें किसी भी तरह का नशा नहीं होता. इनमें प्रचुर मात्रा में ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड, प्रोटीन, फाइबर और जरूरी मिनरल्स पाए जाते हैं. यह पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और सर्दियों में जोड़ों के दर्द से राहत दिलाने में बेहद मददगार है. यही कारण है कि पहाड़ी बुजुर्ग हमेशा भोजन के साथ इस सुपरफूड को शामिल करने की सलाह देते हैं.
भांग की चटनी बनाने के लिए बहुत कम सामग्री की जरूरत होती है. इसके लिए मुख्य रूप से भांग के सूखे बीज, भुना हुआ जीरा, सूखी या हरी लाल मिर्च, स्वादानुसार नमक, हरा धनिया और खटास के लिए पहाड़ी नींबू या अनारदाने के रस इस्तेमाल किया जाता है. सभी मसालों और खटास का सही संतुलन ही इस चटनी को इसका बेजोड़ स्वाद देता है.
चटनी बनाने के लिए सबसे पहले भांग के बीजों को धीमी आंच पर तवे पर हल्का भून लिया जाता है, जब तक कि उनमें से चटकने की आवाज न आने लगे और हल्की खुशबू न फैले. इसके बाद भुने हुए बीजों को ठंडा करके सिलबट्टे पर या मिक्सर में हरी मिर्च, जीरा, लहसुन और हरे धनिये के साथ पीसा जाता है. अंत में इसमें ताजा नीबू का रस और नमक मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट तैयार कर लिया जाता है.
आजकल लोग समय बचाने के लिए मिक्सर ग्राइंडर का उपयोग करते हैं लेकिन भांग की चटनी का असली स्वाद आज भी सिलबट्टे पर ही आता है. जब पत्थरों के बीच भांग के बीज और ताजे मसाले पिसते हैं, तो उनका प्राकृतिक तेल और सुगंध पूरी तरह से निकलकर बाहर आता है जो मिक्सर में पीसने पर नहीं मिल पाता. यही तरीका इस चटनी के स्वाद को खास बनाता है.
भांग की यह चटनी सिर्फ मोमो या झोल के साथ ही नहीं, बल्कि खिचड़ी, मंडुवे की रोटी, दाल-चावल और पराठों के साथ भी बेहद स्वादिष्ट लगती है. सादे से सादे खाने में भी एक चम्मच भांग की चटनी मिला देने से भोजन का जायका कई गुना बढ़ जाता है. उत्तराखंड के इस स्वाद को अब देश-विदेश से आने वाले पर्यटक भी खूब पसंद कर रहे हैं और यह पहाड़ी पहचान का एक अभिन्न अंग बन चुकी है.