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पहाड़ी रसोई का असली स्वाद है पोटा कलेजी, जानें इसे बनाने का आसान तरीका

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उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में पहाड़ी मुर्गी का पोटा-कलेजी पारंपरिक और बेहद लोकप्रिय व्यंजन माना जाता है. जाखिया, जंबू और पहाड़ी लहसुन जैसे स्थानीय मसालों के साथ लोहे की कढ़ाई में तैयार यह डिश स्वाद के साथ पोषण भी देती है. मंडुवे की रोटी या झंगोरे के भात के साथ परोसा जाने वाला यह व्यंजन आज भी पहाड़ी खानपान की खास पहचान बना हुआ है.

उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में पहाड़ी मुर्गी का पोटा-कलेजी स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजन माना जाता है. इसे बनाने के लिए सबसे पहले पोटा और कलेजी को अच्छी तरह साफ कर लें. इसके बाद हल्दी, नमक और थोड़ा सा लहसुन-अदरक लगाकर कुछ देर मेरिनेट करें. लोहे की कढ़ाई में सरसों का तेल गर्म करें और उसमें जाखिया या जीरा डालें. फिर प्याज, टमाटर, लहसुन और अदरक को सुनहरा होने तक भूनें. मसालों में हल्दी, धनिया और लाल मिर्च मिलाने के बाद पोटा-कलेजी डालकर अच्छी तरह चलाएं. थोड़ी मात्रा में पानी डालकर धीमी आंच पर पकाएं. जब मसाला अच्छी तरह चढ़ जाए तो ऊपर से हरा धनिया डालें. यह व्यंजन मंडुवे की रोटी या चावल के साथ स्वादिष्ट लगता है.

कुशल गृहिणी किरन पांडे बताती है कि पहाड़ के कई घरों में आज भी लोहे की कढ़ाई में खाना पकाने की परंपरा बनी हुई है. पोटा-कलेजी को लोहे की कढ़ाई में पकाने से इसका स्वाद अधिक गहरा और देसी लगता है. लोहे की कढ़ाई गर्मी को लंबे समय तक बनाए रखती है, जिससे मसाले धीरे-धीरे पकते हैं, उनका स्वाद अच्छी तरह व्यंजन में घुल जाता है. लोहे के बर्तनों में भोजन पकाने से उसमें थोड़ी मात्रा में आयरन भी मिल सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में इसे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है. साथ ही लोहे की कढ़ाई में तैयार पोटा-कलेजी का रंग और खुशबू भी आकर्षक बनती है. सही तरीके से उपयोग और देखभाल करने पर यह कढ़ाई वर्षों तक चल सकती है.

उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों में जाखिया, जंबू और स्थानीय लहसुन का विशेष महत्व है. पोटा-कलेजी बनाते समय जाखिया का तड़का लगाने से उसमें अलग तरह की खुशबू और स्वाद आता है. जंबू को हल्का भूनकर डालने से व्यंजन का जायका और भी बढ़ जाता है. पहाड़ी लहसुन सामान्य लहसुन की तुलना में अधिक सुगंधित माना जाता है, इसलिए इसका उपयोग विशेष रूप से किया जाता है. इन मसालों का उपयोग सदियों से पहाड़ी रसोई में होता आया है. ये मसाले भोजन को स्वादिष्ट बनाने के साथ पाचन में भी मदद करते हैं. पोटा-कलेजी जैसे पारंपरिक व्यंजनों में इनका प्रयोग आज भी खूब किया जाता है.

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पोटा और कलेजी को पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है. इसमें प्रोटीन, आयरन, विटामिन बी-12 और कई आवश्यक खनिज पाए जाते हैं. कलेजी में आयरन की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है, इसलिए इसे ऊर्जा देने वाला खाद्य पदार्थ माना जाता है. वहीं प्रोटीन शरीर की मांसपेशियों के विकास और मरम्मत में मदद करता है. विटामिन बी-12 शरीर में रक्त कोशिकाओं के निर्माण और तंत्रिका तंत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. पहाड़ी क्षेत्रों में मेहनत करने वाले लोग इसे ताकत देने वाले भोजन के रूप में भी देखते हैं. हालांकि किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका सेवन भी संतुलित मात्रा में करना चाहिए, ताकि शरीर को आवश्यक पोषण मिल सके.

पोटा-कलेजी पौष्टिक जरूर है, लेकिन इसका सेवन संतुलित मात्रा में करना बेहतर माना जाता है. डॉ ऐजल पटेल बताते हैं कि जिन लोगों को कोलेस्ट्रॉल, हृदय संबंधी समस्याएं या कुछ विशेष चिकित्सीय स्थितियां हैं, उन्हें कलेजी का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए. अधिक मात्रा में किसी भी भोजन का सेवन स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है. इसलिए इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाकर खाना बेहतर रहता है. बच्चों, बुजुर्गों और अन्य लोगों के लिए भी मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है. यदि किसी व्यक्ति को विशेष स्वास्थ्य समस्या है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही इसका सेवन करना चाहिए. संतुलित भोजन और नियमित शारीरिक गतिविधि स्वस्थ जीवनशैली के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है.

लोहे की कढ़ाई का सही रखरखाव उसकी उम्र बढ़ा देता है. पोटा-कलेजी बनाने के बाद कढ़ाई को हल्के गर्म पानी से साफ करें और अच्छी तरह सुखा लें. यदि कढ़ाई में नमी रह जाए तो उस पर जंग लग सकती है. कई ग्रामीण परिवार सफाई के बाद उसमें हल्का सरसों का तेल लगाकर रखते हैं, जिससे कढ़ाई सुरक्षित रहती है. साबुन का अधिक उपयोग करने के बजाय सामान्य सफाई करना बेहतर माना जाता है. समय-समय पर कढ़ाई को गर्म करके तेल लगाने से उसकी सतह मजबूत बनी रहती है. अच्छी तरह रखी गई लोहे की कढ़ाई वर्षों तक उपयोग में लाई जा सकती है, और भोजन को पारंपरिक स्वाद देने में मदद करती है.

उत्तराखंड में पोटा-कलेजी को अक्सर मंडुवे की रोटी, गेहूं की रोटी या झंगोरे के भात के साथ परोसा जाता है. मंडुवा पहाड़ का पारंपरिक अनाज है, जो पौष्टिकता के लिए जाना जाता है. जब गर्मागर्म पोटा-कलेजी को मंडुवे की रोटी के साथ खाया जाता है, तो इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है. कई लोग इसके साथ पहाड़ी मूली, हरी मिर्च और भांग की चटनी भी परोसते हैं. यह संयोजन स्थानीय खानपान की पहचान माना जाता है. पर्वतीय क्षेत्रों में पारिवारिक समारोहों और विशेष अवसरों पर भी यह व्यंजन बनाया जाता है. स्थानीय खाद्य परंपराओं को पसंद करने वाले लोगों के बीच यह आज भी लोकप्रिय बना हुआ है.

यदि आप स्वादिष्ट पोटा-कलेजी बनाना चाहते हैं तो कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. हमेशा ताजा पोटा और कलेजी का उपयोग करें तथा उसे अच्छी तरह साफ करें. मसालों को धीमी आंच पर भूनने से उनका स्वाद बेहतर निकलकर आता है. लोहे की कढ़ाई में पकाने से मसाले और मांस अच्छी तरह गलते हैं. अधिक पानी डालने से स्वाद हल्का हो सकता है, इसलिए जरूरत के अनुसार ही पानी मिलाएं. पकने के बाद ऊपर से हरा धनिया और हरी मिर्च डालने से स्वाद बढ़ जाता है. यदि उपलब्ध हो तो जाखिया और जंबू जैसे स्थानीय मसालों का उपयोग करें. सही सामग्री और धैर्य के साथ पकाया गया पोटा-कलेजी व्यंजन हर किसी को पसंद आ सकता है.

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