Banarasi Paan Secret : बनारस का नाम आते ही घाट, गंगा आरती और किशोर कुमार की आवाज में “खइके पान बनारस वाला” की धुन कानों में गूंजने लगती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर बनारसी पान का स्वाद इतना खास क्यों माना जाता है? दरअसल, यह सिर्फ एक माउथ फ्रेशनर नहीं, बल्कि 500 साल पुरानी परंपरा, इसे बेहतर बनाने की बेहतरीन कारीगरी और खास तकनीक का अनोखा मेल है. मगही और जगन्नाथी पत्तों से लेकर पारंपरिक पकाना प्रक्रिया और चुनिंदा मसालों तक, हर छोटी-बड़ी चीज इसे दूसरे पानों से अलग पहचान देती है. आइए जानते हैं बनारसी पान के आइकॉनिक टेस्ट का वो सीक्रेट, जिसने इसे भारत ही नहीं, दुनिया भर में मशहूर बना दिया.

सबसे प्रीमियम ‘मगही’ पत्ता पड़ोसी राज्य बिहार से आता है, जबकि ‘जगन्नाथी’ पत्ता ओडिशा से विशेष रूप से मंगवाया जाता है. Image Credit: AI

मस्त बनारसी पान के फाउंडर और सीईओ पीएन ठाकुर के अनुसार, बनारसी पान सिर्फ कोई खाने की चीज नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुभव है जो वाराणसी की समृद्ध विरासत को दर्शाता है. इस खास व्यंजन का विकास मुख्य रूप से मुगल काल के दौरान हुआ था, जब शाही रसोइयों में बेहद कुशल पान कारीगर (पनवाड़ी) तैनात हुआ करते थे.  बनारस के स्थानीय कारीगरों ने इस अनूठे हुनर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी निखारा और आज इसके स्वाद के दीवाने पूरी दुनिया में हैं. इसी खासियत के कारण अप्रैल 2023 में बनारसी पान को प्रतिष्ठित जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI Tag) से भी नवाजा गया.

तो कहां से आता है पान का ये पत्‍ता?
आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी कि असली बनारसी पान की शुरुआत जिस पत्ते से होती है, वह खुद बनारस की धरती पर नहीं उगता! पीएन ठाकुर के अनुसार, इसके लिए सबसे प्रीमियम ‘मगही’ पत्ता पड़ोसी राज्य बिहार से आता है, जबकि ‘जगन्नाथी’ पत्ता ओडिशा से विशेष रूप से मंगवाया जाता है. ये सभी पत्ते वाराणसी के ऐतिहासिक ‘पान दरीबा’ बाजार में पहुंचते हैं, जो दशकों से पूर्वी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी मंडी है.

इस पत्ते को जो चीज सबसे अलग और खास बनाती है, वह है इसकी पारंपरिक ‘पकाना’ तकनीक. पत्तों को बहुत सावधानी से हीट देकर प्रोसेस किया जाता है और इसके चूने को दूध तथा दही के साथ मिलाकर फेंटा जाता है. यही वजह है कि इसका तीखापन पूरी तरह खत्म हो जाता है और यह मुंह में जाते ही मक्खन की तरह घुल जाता है.

आखिर क्यों इतना स्पेशल है बनारसी पान?
-यह हर बार ग्राहकों के सामने बिल्कुल ताजा (Fresh) तैयार किया जाता है.
-इसे बनाने में केवल चुनिंदा मगही और जगन्नाथी पत्तों का ही इस्तेमाल होता है.
-पारंपरिक पकाना तकनीक के कारण यह मुंह में जाते ही आसानी से घुल जाता है.
-14 से ज्यादा वैरायटी हैं जिसमें सादा, मीठा, मसाला, जर्दा से लेकर आज के दौर के चॉकलेट और आइस पान भी शामिल हैं.
-यह आम आदमी के बजट से लेकर चांदी और सोने के वर्क वाले हजारों रुपये के शाही अंदाज में उपलब्ध है.
-इसमें इस्तेमाल होने वाली सौंफ, इलायची और गुलकंद खाने के बाद डाइजेशन को बेहतर करते हैं.

‘कत्था’ तैयार करने का 40 दिनों का गुप्त फॉर्मूला
जैसे चूने को दूध और दही में फेंटकर तैयार किया जाता है, वैसे ही बनारसी पान में इस्तेमाल होने वाले कत्थे (Catechu) को तैयार करने की एक बेहद गोपनीय और लंबी प्रक्रिया है. असली पनवाड़ी खैर (Acacia catechu) की लकड़ी से निकले कत्थे को बड़े मिट्टी के बर्तनों में गन्ने के रस, जड़ी-बूटियों और गुलाब जल के साथ लगभग 30 से 40 दिनों तक गाढ़ा होने के लिए छोड़ देते हैं. इस पारंपरिक प्रक्रिया के बाद जो कत्था तैयार होता है, वह गाढ़ा होने के बावजूद मुंह या जीठ को काटता नहीं है, बल्कि एक मखमली अहसास देता है.

रानी विक्टोरिया तक पहुंचा था इसका क्रेज
बनारसी पान का इतिहास सिर्फ पुरुषों के शौक तक सीमित नहीं रहा है. अवध और बनारस के नवाबों के दौर में राजघरानों की महिलाओं (बेगमों) के लिए ‘गिलौरी’ तैयार की जाती थी. यह बिना तंबाकू, सुपारी या चूने का एक बेहद नाजुक पान होता था, जिसमें केवल कीमती केवड़ा, कस्तूरी, गुलाब का अर्क और चांदी का वर्क इस्तेमाल होता था. इतिहास के कुछ दस्तावेजों के अनुसार, अवध के नवाबों ने इस खास बनारसी गिलौरी को ब्रिटिश हुकूमत के दौरान लंदन में रानी विक्टोरिया के पास उपहार स्वरूप भी भेजा था.

पिछले 500 से अधिक वर्षों से बनारसी पान उत्तर प्रदेश की सबसे गौरवशाली पाक परंपराओं में से एक रहा है, जिसे अब सरकार की ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन कुजीन’ पहल के तहत भी बड़ी पहचान मिली है. फूड एक्‍सपर्ट मानते हैं कि अब वे पारंपरिक स्वाद से समझौता किए बिना हाइजीनिक तैयारी, स्टैंडर्ड क्वालिटी और प्रीमियम पैकेजिंग के जरिए इस विरासत को नए जमाने के हिसाब से आधुनिक बना रहे हैं. इतिहास और आधुनिकता का यही बैलेंस इसके कभी न खत्म होने वाले जादू का सबसे बड़ा राज़ है.



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