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Sidhi News: जोरिमा बनाने की रेसिपी भी बहुत सरल है लेकिन इसमें सावधानी और पारंपरिक तरीका बेहद महत्वपूर्ण होता है. इसे बनाने के लिए सबसे पहले गेहूं के आटे को एक बड़े बर्तन में छान लिया जाता है.
सीधी. मध्य प्रदेश के बघेलखंड क्षेत्र में पारंपरिक व्यंजनों की परंपरा आज भी लोगों की जीवनशैली और संस्कृति में जीवित है. इन्हीं खास व्यंजनों में शामिल है जोरिमा, जो मेहमान नवाजी की पहचान है. खासतौर पर जब घर पर मेहमान आते हैं, तो उनका स्वागत जोरिमा के बिना अधूरा माना जाता है. यह सिर्फ एक भोजन नहीं बल्कि अपनापन, सम्मान और परंपरा का प्रतीक है. बघेलखंड के ग्रामीण क्षेत्र में जोरिमा को बड़े ही स्नेह और आदर के साथ परोसा जाता है. इसकी खासियत यह है कि इसे सब्जी के साथ नहीं बल्कि शुद्ध देसी घी और पिसी हुई चीनी के साथ खाया जाता है. मुलायम और सॉफ्ट जोरिमा जब घी और चीनी के साथ परोसा जाता है, तो इसका स्वाद हर किसी को याद रह जाता है.
जोरिमा बनाने की प्रक्रिया भी बेहद सरल है लेकिन इसमें सावधानी और पारंपरिक तरीका बेहद महत्वपूर्ण होता है. इसे बनाने के लिए सबसे पहले गेहूं के आटे को एक बड़े बर्तन में छाना जाता है. इसके बाद धीरे-धीरे पानी डालते हुए आटा गूंथा जाता है. ध्यान रखने वाली बात यह है कि आटा सामान्य रोटी के आटे से थोड़ा ज्यादा नरम होना चाहिए. आटा गूंथने के बाद उसे करीब 10 से 15 मिनट तक ढककर रखा जाता है ताकि वह अच्छे से सेट हो जाए.
रुमाली रोटी की तरह सेंकते हैं
इसके बाद गैस पर तवा चढ़ाकर मध्यम आंच पर गर्म किया जाता है. आटे की मध्यम आकार की दो लोई बनाकर उन्हें एक साथ बेल लिया जाता है, जिससे जोरिमा का खास आकार तैयार होता है. फिर इसे तवे पर रुमाली रोटी की तरह सेंक लिया जाता है. जोरिमा को ज्यादा कुरकुरा नहीं बल्कि हल्का और नरम ही रखा जाता है, जिससे इसका असली स्वाद बना रहता है.
घी और चीनी के साथ करते हैं सर्व
जोरिमा को हमेशा गरम-गरम ही परोसा जाता है. जब इसे प्लेट में घी और चीनी के साथ परोसा जाता है, तो इसकी खुशबू और स्वाद हर किसी को आकर्षित कर लेता है. यही वजह है कि बघेलखंड में यह व्यंजन सिर्फ भोजन नहीं बल्कि रिश्तों की मिठास और परंपरा की पहचान बन गया है.
आज भी जोरिमा का महत्व
आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में जोरिमा का महत्व उतना ही है, जितना पहले हुआ करता था. यह व्यंजन नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रहा है और बघेलखंड की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए है.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.