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महुए की राब एक पारंपरिक पेय पदार्थ है, जो महुआ के ताजे फूल या सुखे फूलों के रस को निकालकर पकाया जाता है. इससे शरीर को ऊर्जा के साथ ठंडक भी मिलती है. वहीं, स्वाद काफी अच्छा होता है. बुजुर्ग बताते है कि इसमें प्राकृतिक मिठास होती है. ऐसे में इसका सेवन आज की पीढ़ी को भी करना चाहिए.
बालाघाट जिला एक आदिवासी बहुल जिला है. वहीं, इस जिले में 53 प्रतिशत भू-भाग पर वन है. ऐसे में जीवन जीने के लिए और औषधियों के लिए स्थानीय लोग जंगल की वनस्पति पर ही निर्भर रहते हैं. वहीं, गर्मी के दिनों में भी कई तरह के वनोपज को जंगल से लोग चुन कर लाते हैं और कई चीजें बनाते हैं, जो सेहत के लिए बेहद लाभकारी है. ऐसे इसी में से एक है महुआ.
महुआ चुनकर लोग आजीविका चलाते हैं. महुआ से बनने वाली कई चीज है, जिससे कई पोषक तत्वों से भरपूर चीजें बनाई जाती है. इन्हीं में से एक राब. जी हां महुआ की राब, जो ताकत का खजाना, पोषण का केंद्र और औषधीय गुणों से भरपूर है. बालाघाट में महुआ के फूलों से तैयार की जाती है.
सबसे पहले जानिए क्या है महुए की राब
महुए की राब एक पारंपरिक पेय पदार्थ है, जो महुआ के ताजे फूल या सुखे फूलों के रस को निकालकर पकाया जाता है. इससे शरीर को ऊर्जा के साथ ठंडक भी मिलती है. वहीं, स्वाद काफी अच्छा होता है. बुजुर्ग बताते है कि इसमें प्राकृतिक मिठास होती है. ऐसे में इसका सेवन आज की पीढ़ी को भी करना चाहिए.
घर पर भी बना सकते है महुए की राब
अगर आप महुए की राब को घर पर बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले गीले महुआ को साफ कर ले. फिर उनका रस निकाल ले. अगर सूखे महुआ का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो पहले महुआ को कुछ घंटों तक पानी में भिगो कर रखे. फिर उन्हें दबाकर रस निकाल ले. इस रस को धीमी आंच पर उबालकर गाढ़ा किया जाता है. इसमें आमतौर पर मिठास के लिए शक्कर या गुड़ नहीं मिलाया जाता लेकिन कुछ लोग इसमें फ्लेवर के तौर थोड़ा सा गुड़ डाल सकते हैं. आखिर में यह तैयार हो जाती है. इसे आप किसी कांच की बोतल में स्टोर कर के भी रख सकते हैं. वहीं, ठंड में भी इसका सेवन कर सकते हैं.
सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है ये पेय पदार्थ
महुए की राब में कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं. इसमें प्राकृतिक शर्करा, विटामिन और औषधीय तत्व पाए जाते हैं. यह शरीर को ताजगी और स्फूर्ति देती है. यह पाचन शक्ति को बढ़ाने में मदद करता है. ग्रामीण अंचलों में गर्मी और थकान से बचने के लिए पिया जाता है. ग्रामीणों का यह भी मानना है कि ग्रामीण अंचलों में प्रसव के बाद मां को शक्ति देने के लिए हर दिन एक चम्मच पिलाया जाता है.