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Bhojpur Traditional Khurma History: भोजपुर के उदवंतनगर का प्रसिद्ध खुरमा आज सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ बन चुका है. करीब 100 साल पुरानी इस पारंपरिक मिठास ने पशुपालकों से लेकर छोटे दुकानदारों तक सैकड़ों परिवारों को रोजगार से जोड़ा है. शुद्ध देसी घी और दूध के अनूठे मेल से तैयार होने वाला यह जायका कैसे स्थानीय विकास का इंजन बन गया है, पढ़िए हमारी इस खास रिपोर्ट में.

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भोजपुर: बिहार का भोजपुर जिला अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के साथ-साथ अपने खास जायके के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है. यहां का उदवंतनगर आज महज एक प्रखंड या बाजार भर नहीं है, बल्कि अपनी एक अनूठी पहचान खुरमा के लिए जाना जाता है. यह मिठाई यहां के लोगों की जुबान पर तो बसती ही है. साथ ही यह पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था की मुख्य कड़ी बन चुकी है.

100 साल पुराना गौरवशाली इतिहास
उदवंतनगर में खुरमा बनाने की परंपरा करीब एक सदी पुरानी है. वरिष्ठ पत्रकार विजय ओझा बताते हैं कि इसकी शुरुआत महज एक छोटी सी दुकान से हुई थी. जहां बहुत ही सीमित मात्रा में खुरमा तैयार किया जाता था. लेकिन इसकी बेमिसाल मिठास ने देखते ही देखते इसे पूरे जिले में लोकप्रिय बना दिया. आज यहां 12 से 15 बड़ी दुकानें संचालित हैं. जहां रोजाना औसतन 30 से 35 किलो खुरमा की बिक्री होती है.

स्वाद का राज: शुद्धता और परंपरा
खुरमा की सबसे बड़ी खासियत इसकी निर्माण विधि है. इसे बनाने में आज भी आधुनिक मशीनों के बजाय पारंपरिक तरीके और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है. इसमें शुद्ध देसी घी, दूध से बना पनीर (छेना) और उत्तम दर्जे के मैदे का इस्तेमाल होता है. यही कारण है कि शादी-विवाह हो या कोई बड़ा त्योहार, उदवंतनगर का खुरमा भोजपुर की हर दावत का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है.

अर्थव्यवस्था की रीढ़, सैकड़ों घरों का जलता है चूल्हा
यह मिठाई सिर्फ दुकानदारों तक सीमित नहीं है. बल्कि इसने एक विशाल रोजगार चक्र तैयार कर दिया है.खुरमा के लिए भारी मात्रा में दूध की खपत होती है. रघुपुर और आसपास के गांवों के सैकड़ों दूध उत्पादकों की आजीविका सीधे तौर पर इस व्यापार से जुड़ी है. पनीर और खोवा तैयार करने वाले कारीगरों के लिए यह साल भर रोजगार का साधन है. किराना दुकानदार (मैदा-चीनी की आपूर्ति), पैकेजिंग कर्मी और परिवहन से जुड़े लोग भी इसी व्यापार के दम पर अपना परिवार चला रहे हैं.

ब्रांडिंग और मार्केटिंग की दरकार
स्थानीय बाजार में तो खुरमा की रौनक देखते ही बनती है. खासकर त्योहारों के सीजन में यहां व्यापार कई गुना बढ़ जाता है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस पारंपरिक मिठाई में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने की पूरी क्षमता है. यदि इसे बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और आधुनिक मार्केटिंग के साथ जोड़ा जाए तो यह न केवल भोजपुर बल्कि पूरे बिहार के लिए बड़े गर्व की बात होगी.

उदवंतनगर का खुरमा इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे एक लोकल उत्पाद वोकल होकर पूरे क्षेत्र के विकास का इंजन बन सकता है. इसकी मिठास में सिर्फ चीनी की चाशनी नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की मेहनत और सुनहरे भविष्य की उम्मीदें घुली हुई हैं.

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Amit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें



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