Last Updated:

बहराइच की पारंपरिक मिठाई ‘लम्बी बुंदिया’ आज भी लोगों के बीच अपनी खास पहचान बनाए हुए है. बेसन से बनी इस देसी मिठाई को तलकर चाशनी में डुबोकर तैयार किया जाता है, जिसमें करीब आधे से एक घंटे की मेहनत लगती है. पहले यह शादियों और रस्मों में खास तौर पर परोसी जाती थी, जिसे ‘रसावल’ भी कहा जाता था. बदलते समय के साथ इसकी परंपरा भले ही कम हो गई हो, लेकिन बहराइच में आज भी यह मिठाई मात्र ₹60 प्रति किलो में उपलब्ध है और अपने अनोखे स्वाद के लिए जानी जाती है.

बहराइच. हम बात कर रहे हैं बेसन और चीनी से बनने वाली खास मिठाई लम्बी बुंदिया की जिसको यूपी में खूब पसंद किया जाता है, जो बच्चों संग सभी को पसंद आती है. जिसको कुछ खास तरीके से बहराइच जिले में बनाकर तैयार किया जाता है. पहले जमाने के लोग इसका सेवन शादियों में परंपरागत किया करते थे, बदलते वक्त के साथ अब धीरे-धीरे लोग इस परंपरा को भी भूल चुके हैं. हम जिस लंबी बुंदियो की बात कर रहे हैं इसको खास तरीके से आधी उंगली के बराबर बेसन को मोटा सेव बनाकर फ्राई किया जाता है, और फिर ठंडा हो जाने के बाद चीनी पानी से चासनी बनाई जाती है. फिर एक लोहे की कढ़ाई में बेसन के इस सेव को डालकर धीरे-धीरे उस पर चाशनी चढ़ाई जाती है, जिसको चढ़ाने में दो लोगों की आवश्यकता पड़ती है. एक लोग कढ़ाई में बेसन के सेव के ऊपर धीरे-धीरे चाशनी डालता जाता है तो दूसरे लोग कढ़ाई को निरंतर बार-बार हिला कर बुंदिया को पलड़ता जाता है, जिससे चाशनी पूरी तरीके से हर एक पर अच्छे से चढ़ जाए, यह प्रक्रिया आधे से 1 घंटे की होती है, तब जाकर या बुंदिया तैयार होती है.

मात्र ₹60 में मिल जाता है किलो भर
आज के इस महंगाई के युग में भी इसकी कीमत मात्र ₹60 प्रति केजी के हिसाब से है, यानी कि इसका स्वाद आप ₹60 प्रति केजी के हिसाब से ले सकते हैं. वहीं अगर आप दुकानदार है या बिक्री के लिए लेते हैं तो एक कुंटल आपको मात्र 5500 का मिल जाता है. जिसको बहराइच जिले में साबिर अली नाम के शख्स पिछले कई सालों से बनाने का काम करते हैं जिनकी दुकान बहराइच शहर के किनारे दरगाह शरीफ के पास पुराना स्टेट बैंक के सामने मौजूद है.

पहले जमाने में इसका इस्तेमाल लोग शादी विवाह में अक्सर किया करते थे
बुजुर्ग बताते हैं पहले शादियों में परंपरागत इसका सेवन कराया जाता था जिसको रसावल के नाम से भी जाना जाता था अब जो रस्म बदलकर गांव देहात में भात खाने की हो गई है, यह रस्म पहले रसावल और दूध खाने की हुआ करती थी. बदलते वक्त के साथ-साथ अब लोग या बात भूल भी चुके हैं. अब ग्रामीण इलाकों में इसका सेवन खाकर पानी पीने के रूप में किया जाता है.

About the Author

Monali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें



Source link

Write A Comment