Highlights

  • AI लेखन में कुछ खास शब्द, वाक्य संरचनाएं और पैटर्न का दोहराव अक्सर नजर आते हैं।
  • AI डिटेक्टर उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन वे इंसानी लेखन को भी गलत पहचान लेते हैं।
  • LLM के बढ़ते इस्तेमाल से लेखन की विविधता और इंसानी भाषा की मौलिकता घट सकती है।

क्या आपको कभी कोई पोस्ट, मैसेज या लेख पढ़कर लगा है कि इसे इंसान ने नहीं, AI ने लिखा है? ऐसा महसूस होना अब असामान्य नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI चुपचाप हमारी लिखने की शैली बदल रहा है। बदलाव सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि वाक्यों और पूरे लेख की संरचना भी बदल रही है। AI से तैयार टेक्स्ट अब कम गुणवत्ता वाली वेबसाइटों, सोशल मीडिया कैप्शन और यहां तक कि किताबों की स्क्रिप्ट में भी नजर आने लगा है। लेकिन सवाल है कि क्या सिर्फ पढ़कर यह पता लगाया जा सकता है कि टेक्स्ट AI ने लिखा है या इंसान ने? इसका जवाब है, कुछ हद तक आप पकड़ सकते हैं, लेकिन इसका कोई फूलप्रूफ तरीका नहीं है।

क्या इस लेख की शुरुआत AI ने लिखी थी?

आपको बता दें कि इस लेख की शुरुआत जानबूझकर ऐसी लिखी गई थी कि वह AI से लिखी हुई लगे। यानी लेखक ने खुद ऐसी भाषा और शैली अपनाई, जैसी किसी बड़े लैंग्वेज मॉडल (LLM) से तैयार टेक्स्ट में अक्सर दिखाई देती है। इसका मकसद यह दिखाना था कि AI वाली भाषा को पहचानने की हमारी समझ कितनी विकसित हो चुकी है। ऐसी भाषा अब इंटरनेट पर तेजी से दिखाई दे रही है। कम गुणवत्ता वाली वेबसाइटें विज्ञापनों से क्लिक और कमाई जुटाने के लिए इसका इस्तेमाल करती हैं।

सोशल मीडिया पर ज्यादा एंगेजमेंट पाने वाले कैप्शन में भी इसका इस्तेमाल हो रहा है और किताबों की स्क्रिप्ट भी इससे अछूती नहीं हैं। क्राइम राइटर जेरी फालाडे को हाल ही में 20 लाख डॉलर (करीब 19 करोड़ रुपये) से ज्यादा की बुक डील गंवानी पड़ी। उनके साहित्यिक एजेंटों ने कहा कि वे इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रहे थे कि उनकी पांडुलिपि आखिर तैयार कैसे हुई थी। इसी तरह मार्च में हॉरर उपन्यास ‘Shy Girl’ को भी इसी तरह के संदेह के चलते प्रकाशक हाशेट ने वापस ले लिया।

तो AI से लिखे टेक्स्ट को पहचानें कैसे?

जनरेटिव AI के आने से पहले आम तौर पर यह मान लिया जाता था कि लिखी गई सामग्री किसी इंसान ने तैयार की है, लेकिन अब ऐसा मानना खतरे से खाली नहीं है। AI से लिखे लेख को पहचानने के लिए कोई एक ‘जादुई शब्द’ या पक्का संकेत नहीं है। इसके बजाय कुछ पैटर्न देखने को मिलते हैं, जैसे खास शब्दों का बार-बार इस्तेमाल, वाक्यों की एक जैसी बनावट और लिखने की कुछ खास आदतें। लेकिन एक और समस्या है। LLM तेजी से अपडेट होते हैं। इसलिए जो चीज आज AI के लिखे टेक्स्ट की पहचान बन रही है, हो सकता है कुछ महीनों बाद वही संकेत काम न करे।

‘Quietly’ और ‘Genuinely’ देते हैं इशारा?

अंग्रेजी में लिखे लेखों में ‘quietly’ यानी ‘चुपचाप’ शब्द को AI की भाषा का एक संभावित संकेत बताया गया है। Google Trends पर दिसंबर 2021 से इस शब्द को लेकर सर्च इंटेरेस्ट लगातार बढ़ा है। हालांकि यह आंकड़ा यह नहीं बताता कि शब्द लेखन में कितनी बार इस्तेमाल हुआ। इसलिए इसे सिर्फ एक संकेत माना जा सकता है, पक्का सबूत नहीं। लेकिन इसी दौरान लोगों ने LLM की मदद से लिखना भी तेजी से शुरू किया।

Image Source : INDIA TVAI की भाषा पहचानने का कोई पक्का संकेत नहीं होता है।

AI मॉडल इंसानी औसत लेखन की तुलना में ‘quiet’ और ‘quietly’ जैसे शब्दों की ओर ज्यादा झुकते हुए दिखाई देते हैं। अंग्रेजी में ‘Genuinely’ यानी ‘वास्तव में’ भी ऐसा ही एक शब्द है। लेखक के व्यक्तिगत अनुभव में AI आउटपुट, जिसमें Claude भी शामिल है, में इसका इस्तेमाल सामान्य बातचीत करने वाले इंसान की तुलना में ज्यादा नजर आता है। हालांकि इस खास शब्द पर अभी कोई ठोस रिसर्च नहीं हुई है।

कुछ शब्दों का इस्तेमाल अचानक क्यों बढ़ा?

वैज्ञानिक लेखन में भी AI जैसी भाषा के कुछ पैटर्न दर्ज किए गए हैं। 2022 के बाद PubMed के वैज्ञानिक लेखों के सारांश में कुछ शब्दों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा। ऐसे शब्दों में शामिल हैं:

  1. Delve: गहराई से पड़ताल करना
  2. Meticulous: बहुत सावधानी से किया गया
  3. Underscore: किसी बात को खास तौर पर रेखांकित करना
  4. Boast: गर्व से बताना
  5. Intricate: जटिल और बारीकी से जुड़ा हुआ

शोधकर्ताओं ने इन शब्दों में हुई बढ़ोतरी को ChatGPT जैसी भाषा के इस्तेमाल से जोड़ा है। हालांकि इनमें से कोई भी शब्द अकेले यह साबित नहीं करता कि टेक्स्ट AI ने लिखा है। लेकिन जब ‘quietly’, ‘genuinely’, ‘delve’ और ‘meticulous’ जैसे शब्दों के साथ एक जैसी बढ़िया से बनाई गई वाक्य संरचना भी दिखाई दे, तो टेक्स्ट में एक तरह की ‘हाउस स्टाइल’ नजर आने लगती है।

AI की भाषा में दिखने वाले 2 आसान पैटर्न

AI से लिखे टेक्स्ट में कुछ खास तरह के वाक्य बार-बार नजर आते हैं। इनमें से एक है ‘यह X नहीं, बल्कि Y है’ वाली भाषा। यानी पहले किसी बात से इनकार किया जाता है और फिर उसके बजाय उससे बड़ी या अलग बात कही जाती है। इसके साथ AI अक्सर किसी बात को 3 हिस्सों में बताता है। इसे ‘रूल ऑफ थ्री’ कहा जाता है। जैसे किसी चीज को बताते हुए कहा जाए, यह आसान है, तेज है और काम का है। इससे वाक्य ज्यादा सधा हुआ और प्रभावशाली लगता है।

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Image Source : INDIA TV6 संकेतों के आधार पर AI की भाषा पहचान सकते हैं।

एक और तरीका है छोटी बात को तुरंत बहुत बड़ा बना देना। पहले किसी सामान्य बात का जिक्र किया जाता है और अगले ही वाक्य में उसे बहुत बड़ा बदलाव या उपलब्धि बताया जाता है। मसलन, पहले कहा जाए कि AI ने लिखने का काम आसान कर दिया है। इसके तुरंत बाद कहा जाए कि AI ने इंसानों के लिखने और सोचने का पूरा तरीका बदल दिया है। ऐसी शैली इंसान भी लंबे समय से इस्तेमाल करते आए हैं। फर्क यह है कि जनरेटिव AI इस तरह के दावों को बार-बार और एक जैसे अंदाज में पेश करता है।

क्या ‘Em Dash’ AI की पक्की पहचान है?

लंबी डैश यानी em dash (—) को भी AI की पहचान के तौर पर खूब चर्चा मिली है। यह शुरुआती दौर में AI की सबसे ज्यादा मजाक उड़ाई जाने वाली निशानियों में से एक था। लेकिन यह भी भरोसेमंद अकेला संकेत नहीं है। एक लेखक ने एक ही प्रॉम्प्ट को 6 अलग-अलग चैटबॉट में चलाया। ChatGPT ने 573 शब्दों में आठ em dash इस्तेमाल किए, लेकिन Gemini और Meta AI ने एक भी em dash इस्तेमाल नहीं किया। इससे एक अहम बात सामने आती है, किसी एक संकेत पर भरोसा नहीं किया जा सकता। कई संकेत एक साथ दिखाई दें, तभी शक मजबूत होता है।

लंबे मैसेज भी दे सकते हैं AI का संकेत

AI के इस्तेमाल का एक और संभावित संकेत है, जरूरत से ज्यादा लंबा और सधा हुआ टेक्स्ट। द अटलांटिक की एक रिपोर्ट में एक पत्रकार ने बताया कि जोहान्सबर्ग में एक ड्राइवर की गाड़ी से दुर्घटना होने के बाद मौके पर उसका व्यवहार घबराया हुआ और बिखरा हुआ था। लेकिन सिर्फ आधे घंटे बाद भेजा गया उसका मैसेज बेहद व्यवस्थित और शानदार भाषा में लिखा था। बाद में पत्रकार ने एक मैकेनिक से संपर्क किया, जिसके पुराने मैसेज छोटे-छोटे शब्दों और शॉर्टहैंड में होते थे। उसका नया जवाब भी उसी खास AI जैसी भाषा में आया।

इंसान छोटा लिखता है, AI बात को बढ़ा सकता है

मानवीय भाषा पर समय और मेहनत का दबाव होता है। AI इस दबाव को काफी हद तक खत्म कर देता है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति ट्रैफिक में फंसने पर सिर्फ इतना लिख सकता है: ‘सॉरी, देर हो रही है। ट्रैफिक बहुत बुरा है। 20 मिनट में पहुंचूंगा।’ लेकिन AI इसी संदेश को एक लंबे पैराग्राफ में बदल सकता है। उसमें अचानक ट्रैफिक की समस्या का विस्तार, गहरी माफी और सामने वाले के धैर्य के लिए धन्यवाद शामिल हो सकता है। यह लंबा मैसेज जरूरी नहीं कि गलत हो। समस्या सिर्फ इतनी है कि परिस्थितियों के हिसाब से वह जरूरत से ज्यादा भाषाई मेहनत करता हुआ लग सकता है।

क्या AI डिटेक्टर सॉफ्टवेयर भरोसेमंद हैं?

बाजार में कई ऐसे सॉफ्टवेयर हैं जो दावा करते हैं कि वे AI से लिखा टेक्स्ट पहचान सकते हैं, लेकिन ये सिस्टम पूरी तरह भरोसेमंद नहीं हैं और इनमें मौजूदा भाषाई पक्षपात भी बढ़ सकता है। 2023 के स्टैनफोर्ड अध्ययन में 7 लोकप्रिय AI डिटेक्टरों की जांच की गई। इन टूल्स ने गैर-मूल अंग्रेजी बोलने वाले लोगों के लिखे निबंधों में औसतन 61 प्रतिशत को गलत तरीके से AI से लिखा हुआ बताया। एक टूल ने तो ऐसे 97 प्रतिशत निबंधों को AI जनरेटेड बताया। इसके बाद AI डिटेक्शन तकनीक में सुधार हुआ है। हाल की रिसर्च बताती है कि कुछ परिस्थितियों में मौजूदा डिटेक्टर बेहतर काम कर सकते हैं, लेकिन उन्हें भी चकमा दिया जा सकता है और वे अब भी कई बार इंसान के लिखे टेक्स्ट को AI का लिखा बता देते हैं।

अब सवाल सिर्फ पहचान का नहीं रहा

AI से बने कंटेंट की पहचान करने के बजाय अब दुनिया में यह बहस भी चल रही है कि ऐसे कंटेंट को लेबल या वॉटरमार्क किया जाए। यूरोपीय संघ अब AI से तैयार कंटेंट की पहचान के लिए लेबलिंग या वॉटरमार्किंग की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। इसका मतलब है कि भविष्य में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि ‘क्या यह AI ने लिखा है?’ बल्कि यह भी होगा कि क्या पाठक को बताया जाना चाहिए कि इसे AI ने तैयार किया है? इस सवाल पर हाल ही में Nature Human Behaviour में प्रकाशित एक स्टडी ने भी ध्यान खींचा। शोधकर्ताओं ने 8.8 लाख से ज्यादा Reddit पोस्ट, समाचार लेखों और अकादमिक लेखों का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि LLM के फैलने के साथ लेखन शैली में विविधता कम होने का संबंध दिखाई देता है। यानी अलग-अलग लोगों की भाषा धीरे-धीरे एक जैसी लगने लग सकती है।

आखिर इंसान की अपनी भाषा क्यों जरूरी है?

किसी व्यक्ति ने क्या लिखा है, यह जानना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भाषा का असर इस बात पर निर्भर करता है कि उसे कौन कह रहा है। क्या वह व्यक्ति भरोसेमंद है? क्या उसे विषय की जानकारी है? क्या वह मजेदार है? उसकी उम्र कितनी है? और सबसे बड़ी बात, क्या वह वास्तव में कोई इंसान है? इसके अलावा इंसानों की एक बड़ी ताकत है, भाषाई रचनात्मकता और समस्या सुलझाने की क्षमता। किसी इंसान की अपनी भाषा में अक्सर ऐसे शब्द, तुलना या वाक्य मिल जाते हैं जो बिल्कुल अप्रत्याशित होते हैं। कोई खास वाक्य संरचना किसी व्यक्ति की पहचान बन सकती है, लेकिन लाखों AI-generated टेक्स्ट में एक जैसे पैटर्न दिखाई देने लगें तो यह व्यक्तिगत आवाज को कमजोर कर सकता है।

AI से लिखे लेखों का सबसे बड़ा खतरा क्या है?

अगर मीडिया, सोशल मीडिया और इंटरनेट का ज्यादातर लेखन ऐसा लगने लगे जैसे उसे एक ही ऑटोमैटिक मशीन ने तैयार किया है, तो नुकसान सिर्फ भाषा का नहीं होगा। हम व्यक्तिगत आवाज, बारीकी और लेखन की मौलिकता खो सकते हैं। धीरे-धीरे पाठकों का लिखे हुए शब्दों और उन्हें लिखने वाले व्यक्ति की वास्तविकता पर भरोसा भी कम हो सकता है। इसलिए AI से लिखे टेक्स्ट को पहचानने का सबसे बेहतर तरीका फिलहाल किसी एक शब्द, em dash या डिटेक्टर पर निर्भर रहना नहीं है। कई भाषाई संकेतों, संदर्भ, लेखक की पुरानी शैली और उपलब्ध सबूतों को एक साथ देखना ज्यादा जरूरी है। बता दें कि हाल ही में AI को लेकर एक और रिसर्च सामने आई थी जिसमें बुजुर्गों ने इसे क्रांति बताया था और Gen Z ने सबसे बड़ा खतरा बताया था (द कन्वर्सेशन)

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