मध्यप्रदेश के खंडवा जिले से एक अनोखी और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जहां पारंपरिक तरीके से तैयार किया गया गिर नस्ल की गायों का शुद्ध देसी घी इन दिनों खासा चर्चा में है. इस घी की कीमत बाजार में 4200 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है, जो इसे आम घी से बिल्कुल अलग और खास बनाती है. जहां एक ओर बाजार में साधारण घी 800 से 1000 रुपए प्रति किलो के बीच मिलता है, वहीं खंडवा के इस गांव में तैयार किया जा रहा गिर गाय का घी अपनी शुद्धता और औषधीय गुणों के कारण कई गुना महंगा बिक रहा है. खास बात यह है कि लोग इस घी को सिर्फ खाने के लिए ही नहीं, बल्कि औषधि के रूप में भी उपयोग कर रहे हैं.
यह खास घी खंडवा जिले के ग्राम रोशनी स्थित राधेकृष्ण आजीविका स्वयं सहायता समूह की गौशाला में तैयार किया जा रहा है. यहां की महिलाएं पारंपरिक भारतीय विधि से घी बनाकर न केवल शुद्धता बनाए रख रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में भी मजबूत कदम बढ़ा रही हैं.
ऐसे शुरू हुआ घी बनाने का सफर
ग्राम पंचायत रोशनी के सचिव राधेश्याम नागोले के अनुसार, पहले इस गौशाला का दूध पास के एकलव्य विद्यालय और छात्रावास में सप्लाई किया जाता था. लेकिन गर्मी की छुट्टियों में स्कूल बंद होने के कारण दूध की खपत कम हो गई, जिससे महिलाओं के सामने आर्थिक चुनौती खड़ी हो गई.
ऐसे में समूह की महिलाओं ने हार मानने की बजाय नया रास्ता चुना और दूध से पारंपरिक तरीके से घी बनाने की शुरुआत की. शुरुआत में ही उन्होंने लगभग 12 किलो घी तैयार किया, जिसे बाजार में अच्छा दाम मिला. धीरे-धीरे यह घी आसपास के इलाकों में लोकप्रिय होता गया और अब खंडवा शहर तक अपनी पहचान बना चुका है.
पारंपरिक विधि से बनता है ‘अमृत’ घी
आयुर्वेद में गिर गाय के घी को ‘अमृत’ के समान माना गया है. यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और मानसिक स्पष्टता में भी सहायक माना जाता है.
बढ़ती मांग, बढ़ रहा उत्पादन
इस शुद्ध घी की मांग लगातार बढ़ रही है. वर्तमान में गौशाला में हर सप्ताह लगभग 5 किलो घी तैयार किया जा रहा है. बढ़ती मांग को देखते हुए अब संचालन समिति ने दो और गिर नस्ल की गाय खरीदने का निर्णय लिया है. साथ ही, एकलव्य विद्यालय को दोबारा दूध की आपूर्ति भी शुरू की जा रही है, जो करीब 62 रुपए प्रति लीटर की दर से दी जाएगी.
महिलाओं के लिए बना आत्मनिर्भरता का जरिया
इस पहल से न केवल गौशाला की आय बढ़ी है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को भी रोजगार और आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है. घी की बिक्री से होने वाली आय से गायों का चारा, देखभाल, चरवाहों का वेतन और अन्य व्यवस्थाएं आसानी से पूरी हो रही हैं.
खंडवा की यह पहल न सिर्फ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ा रही है, बल्कि पारंपरिक भारतीय उत्पादों को नई पहचान भी दिला रही है. यह कहानी बताती है कि अगर सोच सकारात्मक हो और मेहनत सच्ची, तो गांव की महिलाएं भी बड़े स्तर पर सफलता हासिल कर सकती हैं.