15 अगस्त 1947 को जब हमारा भारत देश आजाद हुआ, तब हमारे सामने महज राष्ट्र निर्माण का चैलेंज नहीं था, बल्कि अपने समंदर की सीमाओं और सामरिक हितों की सुरक्षा के लिए एक ताकतवर नेवी खड़ी करने की भी बड़ी जिम्मेदारी थी। देश के विभाजन के बाद नौसेना के संसाधनों का बंटवारा हुआ, तो उसमें नौसैनिक अड्डों और युद्धपोतों का बड़ा भाग पाकिस्तान में चला गया। लेकिन सीमित संसाधनों के साथ भारत ने एक ऐसी समुद्री ताकत बनने की यात्रा शुरू की, जो आज Aircraft Carriers, Stealth Guided-Missile Destroyers Nuclear Submarines और अत्याधुनिक Naval Aviation से लैस है।
शक्तिशाली बनने की इस यात्रा में 1961 का गोवा मुक्ति संग्राम, 1971 की जंग और Operation Trident जैसे अध्यायों ने Indian Navy की रणनीतिक सोच और आक्रामक क्षमता को दिखाया। भारतीय नौसेना सिर्फ जंग लड़ने वाली शक्ति नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी, डिजाइन, शिप मैन्युफैक्चरिंग और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ते हुए एक Builder’s Navy भी बन चुकी है। लेकिन इस बदलाव के पीछे की कहानी महज युद्धपोतों और जंगों की गाथा नहीं, यह दशकों के परिश्रम, रणनीतिक फैसलों, चुनौतियों से पार पाने और तकनीकी बदलाव की कहानी है।
स्वतंत्रता दिवस के इस खास अवसर पर Indian Navy के इसी 79 साल के शानदार सफर को समझने के लिए इंडिया टीवी ने भारतीय नौसेना के कमोडोर सी.डी. बालाजी (रिटायर्ड) से एक्सक्लूसिव बातचीत की। जिसमें उन्होंने बताया कि 1947 की सीमित ताकत वाली नेवी आखिर कैसे Blue-Water Navy बनी, 1971 की जंग में Karachi Port पर हुए अटैक के पीछे क्या स्ट्रैटेजिक सोच थी और 2047 तक Indian Navy को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के रास्ते में अभी कौन सी चुनौतियां बाकी हैं।
सवाल: 1947 में जब हम आजाद हुए तब विरासत में हमें कैसी नौसेना मिली थी? आजादी के समय हमारी नेवी के पास संसाधन सीमित थे। ऐसे में छोटी कोस्टल फोर्स से ब्लू वाटर नेवी बनने का सपना कैसे पूरा हुआ और इसमें सबसे बड़ी चुनौतियां क्या रहीं।
जवाब: सी.डी. बालाजी ने कहा कि विभाजन के समय, ज्यादातर संसाधन और नौसैनिक अड्डे पाकिस्तान को मिल गए थे। इसलिए भारतीय हिस्से में हमारे पास बहुत सीमित संसाधन बचे थे। वहां से, हमने ‘ब्लू-वाटर नेवी’ बनने की दिशा में बहुत तेजी से छलांग लगाई है। जैसा कि आप जानते हैं, आज हम Aircraft Carriers, न्यूक्लियर सबमरीन, Modern Guided-Missile Destroyer और फ्रिगेट्स का संचालन कर रहे हैं।
नेवल एविएशन, फास्ट पेट्रोल वेसल और सपोर्ट जहाजों ने भी बड़ा गेम-चेंजिंग योगदान दिया है। साथ ही, देश के भीतर Manufacturing और डिजाइन इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास हुआ है। नौसेना के इस बदलाव को हम मुख्य रूप से तीन प्रमुख चरणों में बांट सकते हैं:
पहला चरण (1947-1960 के दशक की शुरुआत): अप्रैल 1958 तक नौसेना का नेतृत्व एक ब्रिटिश अधिकारी के पास रहा। अप्रैल 1958 में एडमिरल रामदास कटारी पहले भारतीय नौसेना प्रमुख बने। जनवरी 1950 में गणतंत्र बनने पर हमने नाम से ‘रॉयल’ शब्द हटा दिया। इस दौरान, हमने ब्रिटिश नौसेना के कुछ पुराने जहाज खरीदे, जैसे क्रूजर INS दिल्ली, 1957 में INS मैसूर और 1961 में INS विक्रांत, जिससे भारत शुरुआत में ही विमान वाहक पोत की शक्ति बन गया।
दूसरा चरण (1965-1971): 1965 के युद्ध में नौसेना की भूमिका मुख्य रूप से रक्षात्मक थी। उस युद्ध ने हमें अपनी कमियों का विश्लेषण करने, चुनौतियों को पहचानने और सतह, पनडुब्बी और उड्डयन शाखाओं में तेजी से आधुनिकीकरण करने की सीख दी। यह समय अपनी स्थिति मजबूत करने का था।
तीसरा चरण (1971- अब तक): 1971 में नौसेना ने रक्षात्मक के बजाय आक्रामक रुख अपनाया। कराची पोर्ट पर हमला किया और बंगाल की खाड़ी में नाकेबंदी की। इसके बाद ‘ब्लू-वाटर’ विस्तार हुआ। हमने रूस से परमाणु पनडुब्बी INS चक्र लीज पर ली, यूनाइटेड किंगडम से INS विराट और रूस से INS विक्रमादित्य खरीदे। फिर हमने स्वदेशी जहाज-निर्माण और इन्फ्रास्ट्रक्चर की ओर कदम बढ़ाया।
हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती Infrastructure का निर्माण करना था। इसमें डिजाइन, विश्लेषण, सिमुलेशन, परीक्षण और निर्माण का ढांचा शामिल था। नौसेना ने इन-हाउस डिजाइन के लिए एक ‘नेवल डिजाइन ब्यूरो’ बनाया। मुंबई में मझगांव डॉक्स, कोलकाता में गार्डन रीच शिपबिल्डर्स, गोवा शिपयार्ड और हिंदुस्तान शिपयार्ड जैसे रक्षा शिपयार्ड विकसित किए गए। इसके अलावा, केवल जहाज बनाना ही काफी नहीं था, उनका रखरखाव भी उतना ही महत्वपूर्ण था, जिसके लिए शिपयार्ड और नौसेना के डॉकयार्ड्स को सक्षम बनाया गया: कमोडोर सी.डी. बालाजी (रिटायर्ड)
सवाल: आधुनिक भारतीय नौसेना के इतिहास के पहले आमने-सामने के समुद्री युद्ध यानी 1961 के गोवा मुक्ति संग्राम में नौसेना की भूमिका कितनी अहम थी, क्योंकि इसकी चर्चा कम ही होती है।
जवाब: सी.डी. बालाजी ने कहा, ”दिसंबर 1961 में इसे ‘ऑपरेशन विजय’ का नाम दिया गया था। गोवा को घेरकर एक नाकेबंदी की गई थी। इस ऑपरेशन में पुर्तगाली फ्रिगेट ‘अल्फोंसो डी अल्बुकर्क’ को नष्ट कर दिया गया, अंजेदिवा द्वीप पर कब्जा किया गया और दीव में सेना का समर्थन किया गया। तब 450 साल का औपनिवेशिक शासन महज 40 घंटे के ऑपरेशन में खत्म कर दिया गया।”
उन्होंने आगे बताया कि इस नाकेबंदी में प्रमुख युद्धपोतों जैसे INS मैसूर, INS दिल्ली, INS बेतवा, INS ब्यास और INS त्रिशूल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंजेदिवा द्वीप पर पुर्तगाली सैनिकों के कड़े विरोध के बाद नौसैनिकों ने द्वीप को मुक्त कराया। दीव में सेना के समर्थन के लिए INS दिल्ली ने दुश्मन के ठिकानों को नष्ट किया, जिससे पुर्तगाली सेना को जल्दी आत्मसमर्पण करना पड़ा।
सवाल: 1971 की जंग Indian Navy के इतिहास का सबसे सुनहरा पन्ना है। Operation Trident की प्लानिंग के पीछे का क्या माइंडसेट था और उसके तुरंत बाद Operation Python लॉन्च करना रणनीतिक रूप से कितना शानदार था, जिसमें कराची पोर्ट तबाह हो गया।
जवाब: सी.डी. बालाजी ने कहा, ”यह एक बहुत ही दिलचस्प ऑपरेशन था। अगर आप बड़े युद्धपोत लेकर जाते हैं, तो दुश्मन उन्हें बहुत पहले ही रडार पर डिटेक्ट कर लेता है। इसलिए एक अनूठा फैसला लिया गया। हमारे पास सोवियत संघ की तरफ से दी गईं P-15 मिसाइलों से लैस छोटी मिसाइल बोट्स थीं। ये बहुत छोटी थीं, जिससे इन्हें रात में रडार पर पकड़ना लगभग असंभव था, लेकिन इनकी अपनी रेंज कम थी। इसलिए रणनीति यह बनी कि बड़े जहाज इन छोटी बोट्स को खींचकर लक्ष्य के करीब ले जाएं, और फिर उन्हें छोड़ दें।”
ऑपरेशन ट्राइडेंट के तहत इन मिसाइल बोट्स ने कराची बंदरगाह पर बड़ा हमला किया और पाकिस्तानी विध्वंसक PNS खैबर और माइंसवीपर PNS मुहाफिज को डुबो दिया। इसी हमले की याद में 4 दिसंबर को नौसेना दिवस मनाया जाता है: कमोडोर सी.डी. बालाजी (रिटायर्ड)
उन्होंने कहा कि इसके बाद 8 और 9 दिसंबर को Operation Python एक बॉक्सिंग के ‘वन-टू पंच’ की तरह था। कराची पोर्ट पहले ही कमजोर हो चुका था, इसलिए INS विनाश और अन्य फ्रिगेट्स ने उनके फ्यूल स्टोरेज टैंकों पर हमला किया और कराची के 50 प्रतिशत से अधिक तेल भंडार को नष्ट कर दिया।
सी.डी. बालाजी ने कहा, ”पश्चिमी मोर्चे पर हमने INS खुकरी को खो दिया। कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला और उनके 176 नाविकों व 18 अधिकारियों की टीम ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। हम उन्हें हमेशा नमन करते हैं। वहीं, पूर्वी मोर्चे पर INS विक्रांत ने अपने ‘सी हॉक’ और ‘एलिज’ विमानों की मदद से पूर्वी पाकिस्तान की पूरी तरह नाकेबंदी कर दी। साथ ही, INS विक्रांत का पीछा कर रही पाकिस्तानी पनडुब्बी PNS गाजी को भी नष्ट कर दिया गया।”
सवाल: आपने नेवी में टेक्नोलॉजी का एक लंबा दौर खुद देखा। पुराने बेसिक रडार वाले जहाजों से लेकर आज के मॉडर्न स्टील्थ गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर तक, यह Technological Transformation कितना चैलेंजिंग रहा है?
जवाब: कमोडोर सी.डी. बालाजी (रिटायर्ड) ने बताया, ”किसी भी नई तकनीक को अपनाने के लिए एक बहुत बड़े बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षण सुविधाओं और डॉकयार्ड्स के अपग्रेडेशन की जरूरत होती है। जब आप पारंपरिक जहाजों से ‘स्टील्थ’ प्लेटफॉर्म की ओर जाते हैं, तो निर्माण तकनीक, मैटेरियल और कोटिंग पूरी तरह से अलग हो जाती है। डिजिटल तकनीक बहुत तेजी से पुरानी होती है, इसलिए आपको तकनीक से एक कदम आगे रहना पड़ता है।
उन्होंने आगे कहा कि उदाहरण के लिए हमने पुराने वैक्यूम ट्यूब रडार की जगह Active Electronically Scanned Array रडार अपनाए हैं। पहले मैन्युअल तरीके से बंदूकें चलाई जाती थीं और आज हमारे पास ऑटोमेटिक गाइडेड-मिसाइल सिस्टम हैं। मैंने INS विक्रांत पर फ्रेंच टर्बो-प्रोपेलर विमान ‘एलिज’ पर काम किया था। चूंकि मैंने एयरोस्पेस में मास्टर्स और पीएचडी की थी, इसलिए नौसेना ने मुझे एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) में लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस) का नेवल वर्जन बनाने के लिए भेजा। 2003 में कैबिनेट की मंजूरी से लेकर 2012 में इसकी पहली उड़ान तक, मैं इससे जुड़ा रहा।
सवाल: Sea-based Nuclear Deterrence ने भारत की जियो-पॉलिटिकल ताकत को कैसे बढ़ाया है? इसमें सबसे बड़ा रणनीतिक मील का पत्थर क्या था।
जवाब: सी.डी. बालाजी के मुताबिक, Deterrence असल में समुद्र के अंदर मौजूद पनडुब्बियों से आता है। पहले हमने रूस से INS चक्र लीज पर ली थी, लेकिन फिर हमने अपनी खुद की परमाणु ऊर्जा चालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां जैसे INS अरिहंत का निर्माण किया। पारंपरिक डीजल पनडुब्बियों को हवा लेने के लिए समय-समय पर सतह पर आना पड़ता है, जबकि परमाणु पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के भीतर छिपी रह सकती हैं। यह हमारे Nuclear Triad- भूमि, हवा और पानी के नीचे से मार करने की क्षमता को पूरा करता है। जब दुश्मन को पता होता है कि आपके पास यह क्षमता है, तो वह किसी भी संघर्ष में उलझने से डरता है।
सवाल: ब्रह्मोस मिसाइल के नेवल वर्जन ने भारतीय युद्धपोतों की मारक क्षमता को कैसे री-डिफाइन किया है?
जवाब: कमोडोर सी.डी. बालाजी (रिटायर्ड) ने कहा, ”ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसकी गति Mach 3 से भी अधिक है। इतनी तेज गति के कारण इसे डिटेक्ट करना और नष्ट करना दुश्मन के लिए बहुत मुश्किल होता है। यह मिसाइल ‘सी-स्किमिंग’ तकनीक का इस्तेमाल करती है, जिसका मतलब है कि यह समुद्र की सतह के बहुत करीब उड़ती है, जिससे यह रडार की पकड़ में नहीं आती। यह हमारे फ्रंट-लाइन विध्वंसक जहाजों को सटीक हमले करने की क्षमता देती है। इसका इस्तेमाल जमीन पर मौजूद ठिकानों पर हमला करने के लिए भी किया जा सकता है।”
सवाल: आज के मॉडर्न दौर में नेवल टैक्टिक्स को साइबर वॉरफेयर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ने कितना कॉम्प्लेक्स बना दिया है?
जवाब: सी.डी. बालाजी ने कहा, ”साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में, हर उपाय का एक ‘काउंटर-मेजर’ होता है। अगर आप एक सक्रिय रडार का इस्तेमाल करते हैं, तो दुश्मन उसे डिटेक्ट कर सकता है। इसलिए Passive EW Receivers का महत्व बढ़ जाता है। इसमें Spectral Dominance महत्वपूर्ण है, यानी हथियारों का इस्तेमाल करने से पहले आप रेडियो और रडार फ्रीक्वेंसी को कितना नियंत्रित कर सकते हैं। आप सिग्नलों को जैम कर सकते हैं या Spoofing कर सकते हैं, जैसे मिसाइल को भटकाने के लिए ‘चैफ’ और ‘फ्लेयर्स’ का उपयोग करना। साथ ही, अपने जहाजों के सॉफ्टवेयर को साइबर हमलों से सुरक्षित करना बेहद जरूरी है।
सवाल: दुश्मन के मूवमेंट को ट्रैक करने और रियल-टाइम फैसले लेने में सैटेलाइट इमेजरी और AI का इस्तेमाल आज कैसे हो रहा है?
जवाब: कमोडोर सी.डी. बालाजी (रिटायर्ड) के अनुसार, हम सैटेलाइट इमेजरी और AI का उपयोग दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए करते हैं। आज हमारे पास ‘कंप्यूटर विजन मॉडल’ हैं जो बड़ी मात्रा में डेटा को स्कैन कर सकते हैं। हम ऐसे एल्गोरिदम विकसित कर रहे हैं जो रियल-टाइम में असामान्यताओं का पता लगा सकें, जो काम पहले मैन्युअल तरीके से तस्वीरें देखकर किया जाता था। रियल-टाइम इमेज प्रोसेसिंग इसमें सबसे अहम है। वहीं, पंखे वाले विमानों से सुपरसोनिक जेट तक का IAF का सफर कितना चुनौतीपूर्ण रहा, युद्धों में कैसे वायुसेना ने निर्णायक रोल निभाया? स्वतंत्रता दिवस के मौके पर वायुसेना ने पूर्व अधिकारी ने विस्तार से बताया।
सवाल: जब हम 2047 में आजादी के 100 साल मनाएंगे, तब आप Indian Navy को तकनीकी और रणनीतिक रूप से दुनिया में कहां खड़ा देखते हैं?
जवाब: सी.डी. बालाजी ने कहा, ”1947 से अब तक, हम Buyer’s Navy से Builder’s Navy बन चुके हैं। 2047 तक, हमें ‘बिल्डर्स नेवी’ से एक पूर्ण ‘आत्मनिर्भर नौसेना’ की ओर बढ़ना होगा। हम अभी 100 फीसदी स्वदेशीकरण तक नहीं पहुंचे हैं। कुछ प्रणालियां, विशेष रूप से प्रोपल्शन सिस्टम जैसे- नए INS विक्रांत में लगा GE LM 2500 मरीन गैस टर्बाइन हम अभी भी विदेशों से खरीदते हैं। मेरा यही विजन है कि हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनें।”