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Sabudana Kaise Banta Hai : साबूदाना की खीर, खिचड़ी और टिक्की आपने भी खाई होगी. व्रत-त्योहार में तो साबूदाना का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है. फलाहारी खिचड़ी से लेकर खीर तक. आपके भी मन में कभी ना कभी यह सवाल जरूर आया होगा कि यह बनता कैसे है? क्या यह खेत में उगाया जाता है? मोती जैसा गोल-गोल दिखने वाला साबूदाना भारत में कहां होता है? फैक्ट्री में कैसे बनाया जाता है? क्या यह कीड़ों से बनता है? तमिलनाडु के सेलम जिले में बनने वाला सेलम साबूदाना ही क्यों फेमस है? आइये जानते हैं इन सभी सवालों के जवाब……..
How Sabudana Made Inside Factory : साबूदाना खेत में नहीं उगाया जाता. यह टैपिओका नामक एक जड़ वाली फसल से बनाया जाता है. यह शकरकंद की प्रजाति जैसी होती ऐ. टैपिओका को यूरोप के कुछ देशों में कसावा के नाम से जाना जाता है. टैपिओका की फसल 10-11 महीने में तैयार होती है. देश का लगभग 99% साबूदाना अकेले तमिलनाडु में तैयार किया जाता है. तमिलनाडु के सेलम और उसके आस-पास के जिलों में इसकी सैकड़ों प्रोसेसिंग यूनिट हैं. साबूदाना में कार्बोहाइड्रेट काफी मात्रा में होता है. इसमें स्टार्च होता है जो हमारी मांसपेशियों और हड्डियों के लिए अच्छा होता है, जो एक्सरसाइज करते हैं. इसमें एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं. फैक्ट्री में साबूदाना को कैसे बनाया जाता है, आइये जानते हैं पूरा प्रोसेस…
साबूदाना कसावा की जड़ से बनाया जाता है. कसावा की जड़ों को बिल्कुल गन्ने की तरह लगाया जाता है. कसावा के तने की कटिंग को जमीन में गन्ने की तरह लगा देते हैं. मिट्टी के अंदर दबा देते हैं. यह जंगली प्लांट है. 9-11 माह में इसकी जड़े बनती हैं. कसावा की जड़ों को खोदकर निकाल लेते हैं जो शकरकंद जैसी दिखती हैं. कसावा रूट्स को हार्वेस्ट करने के बाद जल्दी से जल्दी प्रोसेसिंग यूनिट पहुंचाया जाता है. इसका छिलका जहरीला होता है. इसे किसानों से लेकर फैक्ट्री तक पहुंचाया जाता है जहां इसे मैकेनिकल बेल्ट के जरिये स्क्रबर तक पहुंचाया जाता है. स्क्रबर में जड़ों में लगी मिट्टी को अच्छे से धोया जाता है. यानी स्क्रबर मशीन मिट्टी हटाती है. फिर कन्वेयर के जरिये इसे पीलिंग मशीन में डाला जाता है. जड़ों का छिलका उतार जाता है.
मिट्टी हटाने के बाद इसे मशीन से छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. फिर कन्वेयर के जरिये इसे पीलिंग मशीन में डाला जाता है. जड़ों का छिलका उतार जाता है. फिर से इसे मशीन से अच्छे से धोते हैं. छिलका निकालने के बाद अगला स्टेप क्रशिंग का होता है. गूदे से निकलने वाले दूध को कई फिल्टरों के जरिये साफ किया जाता है ताकि इसके फाइबर अलग हो जाएं. फाइबर को एक जगह इकट्ठा किया जाता है.
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फाइबर में मौजूद पानी को ब्रश से हटाया जाता है. इस फाइबर प्रोडक्ट को कन्वेयर बेल्ट के जरिये दूसरी जगह ले जाया जाता है. मिल्क में पानी और स्टार्च होता है. इस दूध को प्रोसेस किया जाता है. दूध में मौजूद पानी को स्टार्च से अलग कर दिया जाता है. यानी कसावा मिल्क में बिल्कुल दही जैसी प्रोसेस होती है. इसे बड़े टैंक में रखा जाता है. फर्मेंटेशन की प्रोसेस से उसका स्टार्च अलग हो जाता है और पानी अलग हो जाता है. स्टार्च एक जगह पर इकट्ठा हो जाता है, स्टार्च केक के जैसा बन जाता है.
स्टार्च को दोबारा फिल्टर किया जाता है. एक बार फिर से स्टार्च में पानी मिलाया जाता है. अब इस मिश्रण को और पतला किया जाता है और फिल्टर से गुजारा जाता है. फाइबर हटाने के बाद यह मुलायम हो जाता है. यानी स्टार्च को पाउडर के जैसा बनाया जाता है. अब इस पाउडर को एक मशीन में डाला जाता है जहां पर से रोस्ट किया जाता है. मशीन में ही साबूदाना बनाया जाता है. यानी 1 एमएम से लेकर 7 एमएम के गोल-गोल मोतियों के दाने जैसे साबूदाना बनते हैं. अब इन दानों को भूना जाता है ताकि नमी हट जाए. इनका आकार सही रहे.
इसके बाद साबूदाना को धूप में सुखाते हैं. नमी निकालने के बाद इनकी पॉलिशिंग की जाती है. पॉलिशिंग की वजह से ही इनमें चमक आती है. अगर चमक नहीं होगी तो अच्छे दाम नहीं मिलेंगे. पॉलिशिंग करने से इन दानों का रंग-रूप निखर जाता है. फिर साबूदाना को मशीन के जरिये पैकिंग की जाती है. इस तरह से यह हमारे घरों में पहुंचता है. साबूदाना बनाने की प्रक्रिया मशीनों से भी होती हैं और कहीं-कहीं पर इसे मैन्युअली भी बनाया जाता है. पहले फॉर्मेशन की प्रक्रिया खुले में होती थी, कई दिन तक कसावा मिल्क को सड़ाया जाता था लेकिन अब मशीन के युग में उन्नत तकनीकी आ गई है. यहां तक कि साबूदाने को शैड लगाकर सुखाया जाता है. फिर भी अनब्रांडेड साबूदाना खरीदने से बचें. एफएसएसएआई (FSSAI) रजिस्टर्ड ब्रांड का ही साबूदाना खरीदें.