Desi Traditional Storage: आज के समय में फ्रिज हर घर की सबसे जरूरी चीजों में गिना जाता है. दूध से लेकर सब्जियां, बचा हुआ खाना, फल और दही तक सब कुछ फ्रिज में रखा जाता है ताकि जल्दी खराब न हो. गर्मियों में तो बिना फ्रिज के एक दिन निकालना भी मुश्किल लगने लगता है, लेकिन जरा सोचिए, जब गांवों में बिजली नहीं पहुंची थी और फ्रिज जैसी सुविधा मौजूद नहीं थी, तब लोग खाने को खराब होने से कैसे बचाते थे? हमारे दादा-दादी और नाना-नानी बिना किसी मशीन के भी खाने को कई दिनों तक ताजा रखते थे. दरअसल पुराने समय के लोग मौसम, मिट्टी और प्राकृतिक चीजों को अच्छे से समझते थे. इसी समझ की वजह से उन्होंने ऐसे देसी तरीके अपनाए जो आज भी कई गांवों और पहाड़ी इलाकों में काम आते हैं.
खास बात ये है कि ये तरीके सिर्फ सस्ते ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहतर माने जाते हैं, अगर आप भी जानना चाहते हैं कि बिना फ्रिज के पहले लोग खाना कैसे सुरक्षित रखते थे, तो ये जानकारी आपके लिए काफी दिलचस्प साबित हो सकती है.
मिट्टी का घड़ा देता था प्राकृतिक ठंडक
पुराने समय में मिट्टी के घड़े और मटके सिर्फ पानी ठंडा रखने के काम नहीं आते थे. लोग इनमें दूध, दही, छाछ और पका हुआ खाना भी रखते थे. मिट्टी की सतह से धीरे-धीरे पानी सूखता रहता है जिससे अंदर का तापमान कम हो जाता है. यही वजह है कि घड़े के अंदर रखी चीजें लंबे समय तक ठंडी बनी रहती थीं. कई जगह लोग घड़े को गीले कपड़े से ढक देते थे ताकि ज्यादा देर तक ठंडक बनी रहे.
जीर पॉट को कहा जाता था देसी फ्रिज
अफ्रीका और मध्य पूर्व के इलाकों में इस्तेमाल होने वाला जीर पॉट काफी मशहूर तरीका था. इसमें एक बड़े मिट्टी के बर्तन के अंदर छोटा बर्तन रखा जाता था और दोनों के बीच गीली रेत भरी जाती थी. ऊपर से गीला कपड़ा ढक दिया जाता था. जब रेत का पानी सूखता था तो अंदर ठंडक पैदा होती थी. इससे फल, सब्जियां और दूध एक-दो दिन तक ताजा रह जाते थे. भारत के कई गर्म इलाकों में भी इसी तरह के तरीके अपनाए जाते थे.
बहते पानी से बचता था खाना
पहाड़ी राज्यों में लोग झरनों और बहते पानी का इस्तेमाल करते थे. खाने के बर्तन को पानी के पास या ऊपर लटका दिया जाता था. लगातार बहता ठंडा पानी खाने को जल्दी खराब नहीं होने देता था. इससे खाने में बदबू भी नहीं आती थी और बैक्टीरिया कम पनपते थे. आज भी कुछ दूरदराज गांवों में ये तरीका देखने को मिल जाता है.
नमक और धूप का था बड़ा रोल
फ्रिज न होने के समय में नमक और धूप सबसे बड़े सहारे थे. लोग मछली, मांस और सब्जियों को नमक लगाकर धूप में सुखा देते थे. इससे खाने की नमी निकल जाती थी और खराब होने का खतरा कम हो जाता था. भारत में आज भी अचार, पापड़, बड़ी और सूखी मछली इसी तरीके से तैयार की जाती है. कच्चे आम को नमक लगाकर सुखाने की परंपरा भी काफी पुरानी है.
जमीन के अंदर रखा जाता था सामान
कश्मीर, नेपाल और ठंडे इलाकों में लोग जमीन के अंदर गड्ढे बनाकर आलू, प्याज और दूसरी सब्जियां रखते थे. जमीन के नीचे तापमान सामान्य बना रहता है, जिससे सब्जियां जल्दी खराब नहीं होती थीं. कुछ गांवों में आज भी लोग घर के आंगन में छोटे भंडारण गड्ढे बनाकर अनाज और सब्जियां रखते हैं.
राख और भूसी से बचती थीं सब्जियां
ग्रामीण इलाकों में लोग अदरक, हल्दी, लहसुन और शकरकंद जैसी चीजों को सूखी राख या भूसी में दबाकर रखते थे. राख नमी को सोख लेती थी और कीड़ों को दूर रखती थी. इससे सब्जियां ज्यादा दिनों तक सुरक्षित रहती थीं. ये तरीका खासकर गांवों में काफी लोकप्रिय था.
फर्मेंटेशन से बढ़ता था स्वाद
पहाड़ी इलाकों में लोग सब्जियों को नमक और मसालों के साथ बंद करके रखते थे. कुछ दिनों बाद उनमें प्राकृतिक फर्मेंटेशन शुरू हो जाता था. इससे खाना जल्दी खराब नहीं होता था और स्वाद भी बढ़ जाता था. हिमालयी इलाकों में आज भी कई पारंपरिक चीजें इसी तकनीक से बनाई जाती हैं.
आज भी काम आ सकते हैं ये देसी तरीके
आज भले ही हर घर में फ्रिज मौजूद हो, लेकिन पुराने देसी तरीके आज भी बेहद काम के हैं. बिजली जाने पर या गांवों में रहने वाले लोगों के लिए ये तरीके काफी मददगार साबित हो सकते हैं. साथ ही ये पर्यावरण को नुकसान भी नहीं पहुंचाते. यही वजह है कि अब कई लोग फिर से पारंपरिक तरीकों की तरफ लौट रहे हैं.