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बारिश आते ही बदल गया मारवाड़ का स्वाद! ताजी सब्जियां हुईं कम, दाल-बाटी और कढ़ी

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Jalore News: मानसून के मौसम में राजस्थान, खासकर मारवाड़ के ग्रामीण इलाकों की रसोई का स्वाद बदल जाता है. खेतों में ताजी सब्जियों की उपलब्धता कम होने पर लोग फिर से पारंपरिक देसी व्यंजनों की ओर लौटते हैं. दाल-बाटी, राजस्थानी कढ़ी, गट्टे की सब्जी, बाजरे की रोटी, लहसुन की चटनी और अन्य पारंपरिक पकवान इस मौसम में खास पसंद किए जाते हैं. ये व्यंजन न केवल स्वादिष्ट होते हैं, बल्कि मौसम के अनुरूप पौष्टिक और ऊर्जा देने वाले भी माने जाते हैं. मानसून के दौरान ग्रामीण रसोई में लौटता यह पारंपरिक जायका राजस्थान की समृद्ध खानपान संस्कृति और लोकजीवन की अनूठी पहचान को दर्शाता है.

दाल-बाटी मारवाड़ की रसोई में दाल-बाटी का खास स्थान है. जालोर के ग्रामीण इलाकों में मानसून के दिनों में इसका स्वाद और बढ़ जाता है. यहां दाल-बाटी कई अंदाज में बनाई जाती है,साधारण बाटी,खे वाली बाटी जिसे चूल्हे या छान व ओवन में सेंककर तैयार किया जाता है, बाफला बाटी, जिसमें बाटी को पहले उबालकर फिर घी में सेंका जाता है, और इंदौरी बाटे, जो अब मारवाड़ के कई घरों में पसंद किए जाने लगे हैं. पंचमेल दाल और देसी घी के साथ परोसी जाने वाली ये बाटियां स्वाद के साथ पारंपरिक पहचान भी हैं.

ढोकली मारवाड़ की रसोई में ढोकली मानसून के दिनों का खास पारंपरिक व्यंजन है. जालोर के ग्रामीण इलाकों में इसे आमतौर पर मूंग दाल और चने की दाल को मिलाकर तैयार किया जाता है, जिसमें आटे की ढोकली डालकर पकाई जाती है. इसके अलावा यहां ग्वार फली की ढोकली और कुल्थ की ढोकली भी बनाई जाती है, जो देसी स्वाद और स्थानीय सामग्री से जुड़ी खास पहचान रखती हैं. गर्मागर्म ढोकली बारिश के मौसम में स्वाद के साथ शरीर को गर्माहट भी देती है.

ढोकला मारवाड़ की रसोई में मानसून के मौसम में ढोकला भी खूब पसंद किया जाता है. राजस्थान में ढोकले की कई देसी वैरायटी देखने को मिलती हैं. जालोर के ग्रामीण इलाकों में गेहूं के आटे के ढोकले, मक्की के आटे के ढोकले, बाजरे के ढोकले और मैदे के ढोकले भी बनाए जाते हैं. अलग-अलग अनाज से तैयार होने वाले ये ढोकले स्वाद के साथ स्थानीय खान-पान और मौसम के अनुसार बदलती ग्रामीण रसोई की परंपरा को बताते हैं.

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घेरिया मारवाड़ की पारंपरिक रसोई में घेरिया मानसून के मौसम का खास व्यंजन माना जाता है. यह गेहूं के आटे से तैयार होने वाला ऐसा स्वादिष्ट पकवान है, जिसे कम समय और कम सामग्री में आसानी से बनाया जा सकता है. जालोर के ग्रामीण इलाकों में बारिश के दिनों में घेरिया को बड़े चाव से खाया जाता है. देसी घी के साथ इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है और यह पारंपरिक देसी खान-पान की एक खास पहचान है.

कढ़ी मारवाड़ की रसोई में कढ़ी एक ऐसा पारंपरिक व्यंजन है, जिसे राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में बड़े चाव से खाया जाता है. जालोर में भी मानसून के मौसम में कढ़ी की मांग बढ़ जाती है. इसे खासतौर पर चावल, ढोकला और बाजरे की रोटी के साथ पसंद किया जाता है. कढ़ी की भी कई वैरायटी बनाई जाती हैं,कहीं पकौड़े वाली कढ़ी, तो कहीं प्याज वाली कढ़ी और कुमटिया कढ़ी अलग-अलग मसालों के साथ तैयार की गई देसी कढ़ियां. दही और बेसन से बनने वाली यह कढ़ी स्वाद के साथ मानसून के मौसम का खास जायका बन जाती है.

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