देवघर. झारखंड की पारंपरिक खानपान संस्कृति में कई ऐसे व्यंजन शामिल हैं, जो स्वाद के साथ-साथ परंपरा और भावनाओं से भी जुड़े होते हैं. उन्हीं में से एक बेहद खास पकवान है ओकोपोको. कई जगहों पर इसे अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है, लेकिन इसका स्वाद और इसकी परंपरा हर जगह लगभग एक जैसी रहती है. खासकर पूजा-पाठ, व्रत और पारिवारिक त्योहारों के समय इसे बड़े प्रेम से बनाया जाता है. गांवों में आज भी महिलाएं इस पकवान को पारंपरिक तरीके से बनाती हैं.

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह महीनों तक खराब नहीं होता, चाहे गर्मी कितनी भी ज्यादा क्यों न हो. यही वजह है कि पुराने समय में लोग इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखकर खाते थे. कम सामग्री में बनने वाला यह पकवान स्वाद में इतना बेहतरीन होता है कि एक बार खाने के बाद लोग इसका स्वाद भूल नहीं पाते.

इन सामग्री की होती है जरूरत
बहुत से पकवान ऐसे होते हैं, जिन्हें बनाने के लिए कई सामग्रियों की जरूरत होती है और वे जटिल भी लगते हैं, लेकिन ओकोपोको बनाने के लिए ज्यादा सामग्री की जरूरत बिल्कुल भी नहीं होती है. इसे बनाने में मुख्य रूप से गेहूं का आटा, गुड़ और घी का इस्तेमाल किया जाता है और बेहद कम समय में आप घर में ओकोपोको तैयार कर सकते हैं.

ओकोपोको बनाने की क्या है रेसिपी
सबसे पहले एक बड़े बर्तन में आटा लिया जाता है. इसके बाद गुड़ को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर या हल्का कूटकर आटे में मिला दिया जाता है. कई लोग गुड़ को हल्का गर्म करके भी डालते हैं, ताकि वह आसानी से आटे में मिल जाए. सबसे जरूरी बात यह होती है कि इसमें पानी बिल्कुल नहीं मिलाया जाता. गुड़ की नमी और घी की मदद से ही पूरा मिश्रण तैयार किया जाता है. अब हाथों से अच्छी तरह आटा और गुड़ को मसलते हुए मिलाया जाता है, ताकि हर हिस्से में गुड़ का स्वाद बराबर पहुंच जाए.

मनमाफिक शेप दे सकते हैं
इसके बाद थोड़ा-थोड़ा घी डालकर मिश्रण को सख्त लेकिन चिकना बनाया जाता है. जब मिश्रण अच्छी तरह तैयार हो जाता है, तब उसके छोटे-छोटे गोले बनाए जाते हैं. कई जगह लोग इसे लंबा या चपटा आकार भी देते हैं. इसके बाद कढ़ाई में घी या तेल गर्म किया जाता है. घी में बनने पर इसका स्वाद और खुशबू दोनों काफी बढ़ जाते हैं. जब घी अच्छी तरह गर्म हो जाए, तब धीरे-धीरे ओकोपोको को उसमें डाला जाता है.

धीमी आंच पर पकाना जरूरी
इसे धीमी आंच पर पकाना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि तेज आंच पर यह बाहर से जल्दी लाल हो जाएगा, लेकिन अंदर से कच्चा रह सकता है. धीरे-धीरे पकने पर इसका रंग सुनहरा भूरा हो जाता है और इससे बहुत ही अच्छी खुशबू आने लगती है. जब यह अच्छी तरह कुरकुरा हो जाए, तब इसे निकालकर ठंडा होने के लिए रख दिया जाता है.

भीषण गर्मी में भी महीनों तक नहीं होता खराब
ठंडा होने के बाद ओकोपोको और भी ज्यादा स्वादिष्ट लगने लगता है. इसकी बाहरी परत हल्की कुरकुरी और अंदर का हिस्सा मीठा व नरम रहता है. गांवों में लोग इसे चाय के साथ, व्रत के बाद या मेहमानों को भी खिलाते हैं. बच्चे भी इसे बड़े चाव से खाते हैं, क्योंकि इसमें गुड़ की प्राकृतिक मिठास होती है. गुड़ शरीर के लिए भी फायदेमंद माना जाता है और घी इसे ताकत देने वाला भोजन बना देता है. यही कारण है कि पुराने समय में खेतों में काम करने वाले लोग भी इसे साथ लेकर जाते थे, ताकि लंबे समय तक ऊर्जा बनी रहे.

खास है यह पारंपरिक पकवान
आज के समय में, जहां लोग बाजार की पैकेट वाली चीजों की तरफ ज्यादा बढ़ रहे हैं, वहीं ओकोपोको जैसे पारंपरिक पकवान हमारी पुरानी संस्कृति और देसी स्वाद की याद दिलाते हैं. यह सिर्फ एक मिठाई या पकवान नहीं, बल्कि झारखंड की परंपरा, गांव की खुशबू और घरेलू स्वाद का प्रतीक है. त्योहारों में जब घरों में इसकी खुशबू फैलती है, तब पूरा माहौल और भी खास बन जाता है. यही वजह है कि आज भी लोग इस पारंपरिक पकवान को बड़े गर्व और प्रेम के साथ बनाते और खिलाते हैं.



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