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मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के चंबल संभाग के आदिवासी अंचलों में आज भी पारंपरिक खानपान की अनोखी परंपराएं जीवित हैं. यहां गर्मी के मौसम में एक खास देसी भरता तैयार किया जाता है, जिसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें तेल का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं होता है. पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से तैयार होने वाला यह भरता स्वाद के साथ सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद माना जाता है.

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के चंबल संभाग के आदिवासी अंचलों में आज भी पारंपरिक खानपान की अनोखी परंपराएं जीवित हैं. यहां गर्मी के मौसम में एक खास देसी भरता तैयार किया जाता है, जिसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें तेल का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं होता है. पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से तैयार होने वाला यह भरता स्वाद के साथ सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद माना जाता है.

ग्रामीण क्षेत्रों में लोग बैंगन और कच्चे आम को सीधे आग की आंच पर भूनते हैं. अच्छी तरह पकने के बाद दोनों का छिलका उतार लिया जाता है. इसके बाद इन्हें मिट्टी के मटके के ठंडे पानी में डालकर ठंडा किया जाता है. ग्रामीणों का कहना है कि मटके के पानी की ठंडक इस भरते के स्वाद को और भी खास बना देती है.

भुने बैंगन और आम का खास भरता
जब बैंगन और आम अच्छी तरह ठंडे हो जाते हैं, तो इन्हें हाथों से मैश किया जाता है। इसके बाद इसमें बारीक कटा प्याज, हरी मिर्च, लाल मिर्च पाउडर, हरा धनिया और स्वादानुसार नमक मिलाया जाता है. कई जगहों पर इसमें लहसुन भी डाला जाता है, जिससे इसका स्वाद और बढ़ जाता है. यह पूरा मिश्रण केवल 5 मिनट में तैयार हो जाता है.स्थानीय आदिवासी बताते हैं कि यह भरता गर्मी में शरीर को ठंडक पहुंचाता है और पाचन के लिए भी अच्छा माना जाता है. आम की हल्की खटास और आग में भुने बैंगन का स्मोकी स्वाद इसे बेहद लजीज बना देता है. यही वजह है कि यह व्यंजन गांवों में काफी लोकप्रिय है. ग्रामीणों का कहना है कि पहले के समय में जब संसाधन कम थे, तब लोग इसी तरह बिना तेल और मसालों के देसी व्यंजन तैयार करते थे. आज भी यह परंपरा कायम है और नई पीढ़ी भी इसे पसंद कर रही है.



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