आज जब लोग ऑर्गेनिक फूड, पारंपरिक कुकवेयर, कोल्ड-प्रेस्ड ऑयल और घर में पिसे मसालों की तरफ लौट रहे हैं, तब पुराने समय की रसोई भी चर्चा में आ जाती है. आजादी के आसपास के दौर में भारतीय घरों में खाना बनाने का तरीका आज के मुकाबले काफी अलग था. उस समय हर घर का भोजन एक जैसा नहीं होता था. अलग-अलग राज्यों, मौसम, स्थानीय खेती और परिवार की आर्थिक स्थिति के हिसाब से खाने की चीजें बदलती थीं. फिर भी कई ऐसी आदतें थीं, जिन्हें आज हेल्दी और नेचुरल लाइफस्टाइल का हिस्सा माना जाता है.

मिट्टी के बर्तनों में पकता था खाना

भारतीय रसोई में मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल कोई नई परंपरा नहीं है. कई इलाकों में हांडी, मटकी और दूसरे मिट्टी के बर्तनों में दाल, सब्जियां और अनाज पकाए जाते थे. धीमी आंच पर खाना पकाने की वजह से भोजन धीरे-धीरे तैयार होता था और इसका स्वाद भी अलग होता था. आज मिट्टी के बर्तनों को लोग फिर से किचन में शामिल कर रहे हैं. हालांकि, यह मान लेना सही नहीं है कि मिट्टी के बर्तन में बना हर खाना अपने आप ज्यादा पौष्टिक हो जाता है. बर्तन की गुणवत्ता, उसकी कोटिंग और साफ-सफाई भी उतनी ही जरूरी है.

सिल्ली-लोढ़े पर पिसते थे मसाले

आज मिक्सर कुछ सेकंड में मसाले पीस देता है, लेकिन पहले सिल-बट्टा और सिल्ली-लोढ़ा रसोई का जरूरी हिस्सा हुआ करते थे. हरी मिर्च, धनिया, लहसुन, अदरक और दूसरे मसालों की चटनी या पेस्ट इसी तरह तैयार किए जाते थे. इस तरीके में मेहनत जरूर ज्यादा लगती थी, लेकिन मसाले घर में ताजे पीसे जाते थे. आज भी कई लोग सिल-बट्टे पर तैयार चटनी के स्वाद और टेक्सचर को पसंद करते हैं. हालांकि, केवल पारंपरिक तरीके से पीसने से भोजन ज्यादा हेल्दी हो जाता है, ऐसा दावा करना सही नहीं होगा.

रिफाइंड तेल की जगह इस्तेमाल होते थे देसी तेल

आज रिफाइंड तेल कई घरों की रोजमर्रा की कुकिंग का हिस्सा है, लेकिन पहले खाना पकाने में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध तेल और घी का ज्यादा इस्तेमाल होता था. अलग-अलग क्षेत्रों में सरसों का तेल, तिल का तेल, मूंगफली का तेल, नारियल तेल और घी जैसी चीजें प्रचलित थीं. कौन सा तेल इस्तेमाल होगा, यह काफी हद तक उस इलाके में होने वाली खेती और स्थानीय खान-पान पर निर्भर करता था. आज भी बिना ज्यादा प्रोसेसिंग वाले तेलों को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है, लेकिन किसी एक तेल को हर व्यक्ति के लिए सबसे बेहतर कहना सही नहीं है. तेल की मात्रा और पूरी डाइट का संतुलन ज्यादा महत्वपूर्ण है.

मोटे अनाज थे खाने का हिस्सा

आज बाजरा, ज्वार, रागी और मक्का जैसे मिलेट्स को हेल्दी फूड के तौर पर खूब प्रमोट किया जा रहा है. लेकिन भारत में इन अनाजों का इस्तेमाल सदियों से होता आया है. कई ग्रामीण और स्थानीय आहार में ये अनाज रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा रहे हैं. इनके साथ दाल, मौसमी सब्जियां, साग और स्थानीय खाद्य पदार्थ थाली में शामिल किए जाते थे. यानी भोजन में सिर्फ एक चीज पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल किया जाता था.

खाना सादा और मौसम के हिसाब से होता था

पुराने समय की रसोई की एक खास बात यह भी थी कि भोजन काफी हद तक स्थानीय और मौसमी चीजों पर निर्भर रहता था. गर्मियों में मिलने वाली चीजें अलग होती थीं और सर्दियों में थाली में दूसरी सब्जियां और अनाज जगह बनाते थे. आज के समय में भी मौसमी फल-सब्जियां, साबुत अनाज, दालें और घर का संतुलित खाना डाइट का अच्छा हिस्सा हो सकते हैं. हालांकि, पुराने जमाने की हर खान-पान की आदत को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सही मान लेना भी ठीक नहीं है.

पुरानी रसोई से आज क्या सीख सकते हैं?

आज हम पुराने जमाने की पूरी रसोई को उसी तरह दोहरा नहीं सकते और इसकी जरूरत भी नहीं है. लेकिन कम प्रोसेस्ड भोजन, स्थानीय और मौसमी सामग्री, घर में तैयार मसाले और तेल की सीमित मात्रा जैसी आदतों से जरूर सीख ली जा सकती है. आज जिसे ऑर्गेनिक या नेचुरल लाइफस्टाइल कहा जाता है, उसकी कई झलक पारंपरिक भारतीय खान-पान में पहले से दिखाई देती थी.



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