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जबलपुर के ‘देवा मंगौड़े’ का नाम मुंह से निकल जाए तो मुंह में पानी आ जाता है. यह सुनकर जरूर हैरानी होगी कि गर्म खौलते हुए तेल से आखिर मंगौड़े कैसे निकाले जाते हैं, जवाब होगा कल्चुरी से. लेकिन नहीं जबलपुर का यह शख्स कलचुरी से नहीं. खौलते तेल में हाथ डालकर मंगौड़े निकाल लेता है.
जबलपुर के ‘देवा मंगौड़े’ का नाम मुंह से निकल जाए तो मुंह में पानी आ जाता है. यह सुनकर जरूर हैरानी होगी कि गर्म खौलते हुए तेल से आखिर मंगौड़े कैसे निकाले जाते हैं, जवाब होगा कल्चुरी से. लेकिन नहीं जबलपुर का यह शख्स कलचुरी से नहीं. खौलते तेल में हाथ डालकर मंगौड़े निकाल लेता है.
जबलपुर में देवा मंगौड़े की दुकान 107 साल पुरानी है, लेकिन स्वाद आज भी वही है जो 107 साल पहले हुआ करता था. यह दुकान चौथी पीढ़ी के अतुल जैन संभाल रहे हैं. इसके पहले यह दुकान 1918 में स्व. कंछेदी जैन ने शुरू की थी. उस समय 10 पैसे में 50 ग्राम मंगौड़े मिला करते थे.
अतुल जैन ने बताया कि यह परंपरा शुरू से चली आ रही है. जहां दुकान में मंगौड़े तलने के पहले पूजन अर्चन के लिए यह विधि अपनाई जाती है और खोलते हुए तेल में हाथ को डाला जाता है. उन्होंने यह हुनर अपने पिता से सीखा है.
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अतुल बताते हैं कि मंगौड़े से राजनीति भी जुड़ी हुई है जब भी कोई मंत्री जबलपुर में आता है तब मंगोड़े का लुत्फ उठाने दुकान में जरूर आता है. हालांकि केंद्रीय मंत्री रहे शरद यादव से लेकर कई मंत्री दुकान में आ चुके हैं.
अतुल जैन बताते हैं कि मंगौड़े को बिना प्याज और लहसुन के तैयार किया जाता है. अतुल की चाची सिलबट्टे से 5 घंटे में मसाला और दाल पीसकर तैयार करती हैं.
मंगौड़े का मसाला और चटनी बनाने में करीब 5 घंटे लगते हैं, सुबह 8 बजे से लेकर दोपहर 1 तक मसाला तैयार किया जाता हैं.
मंगौड़े का मसाला तैयार होने के बाद दुकान में ले जाया जाता है. जहां गर्मा-गर्म मंगौड़े निकाले जाते हैं.
चटनी भी काफी पसंद की जाती है. खट्टी-मीठी और टमाटर की चटनी मंगौड़े के साथ दी जाती है.