पटनाः दानापुर के रहने वाले धीरज कुमार जब भी गांधी मैदान की ओर आते हैं, तो एक खास सत्तू की दुकान पर खींचे चले आते हैं. उनका कहना है कि मुझे जाना कहीं और होता है, लेकिन कदम खुद-ब-खुद इस दुकान तक पहुंच जाते हैं. वहीं, अस्पताल में काम करने वाले उमेश कुमार पिछले 10 सालों से रोज ऑफिस से घर लौटते वक्त यहां एक गिलास सत्तू पीना नहीं भूलते.

कुछ ऐसी ही दीवानगी आम से लेकर खास लोगों तक में इस मशहूर सत्तू दुकान को लेकर देखने को मिलती है. सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि आशीष विद्यार्थी जैसे सेलिब्रिटी भी यहां के सत्तू के दीवाने हैं. यही वजह है कि पिछले करीब 30 सालों से यह दुकान पटना की पहचान बनी हुई है.

तीन लेयर ने बनाया सबको दीवाना
गांधी मैदान से सटे बिस्कोमान भवन के ठीक नीचे हर रोज सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक भोला जी सत्तू की दुकान सजाते हैं और लोगों को स्पेशल थ्री लेयर वाला सत्तू पिलाते हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस सत्तू को खत्म करने के लिए आपको थोड़ा खाना भी पड़ता है और थोड़ा पीना भी पड़ता है. कीमत मात्र 15 रूपये प्रति ग्लास है. लोगों की भीड़ का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है कि भोला जी का हाथ कभी रुकता ही नहीं है. लोग चारों तरफ से ठेले को घेरे खड़े होते हैं. कोई ऑफिस जाने से पहले यहां रुकता है तो कोई ड्यूटी खत्म कर सीधे इसी ठिकाने पर पहुंचा है. किसी के लिए यह सुबह का एनर्जी ड्रिंक है, तो किसी के लिए दिनभर की थकान मिटाने का सहारा. शायद यही वजह है कि लोग इसे प्यार से बिहारी हॉर्लिक्स भी कहते हैं.

आखिर क्या है इस थ्री लेयर में खास
भोला जी अपने छोटे भाई और परिवार के करीब पांच सदस्यों के साथ सुबह-सुबह ही दुकान सजा देते हैं. सबसे पहले बड़े पीतल के बर्तन में शुद्ध चने का सत्तू डाला जाता है. फिर करीब 15 मिनट तक उसमें पानी मिलाकर लगातार घोला जाता है. सत्तू तैयार करने का उनका तरीका पूरी तरह पारंपरिक है.

उधर, उनके भाई ग्लासों में पहले से भुना हुआ जीरा पाउडर, पुदीने की चटनी, नींबू का रस, बारीक कटा प्याज और हरी मिर्च डालकर तैयार रखते हैं. इसी दौरान दुकान के आसपास ग्राहकों की भीड़ जुटने लगती है. करीब 15 मिनट बाद जब सत्तू का घोल पूरी तरह गाढ़ा हो जाता है, तब उसे ग्लास में डाला जाता है. पहले आधा ग्लास भरा जाता है. इसके बाद फिर से पुदीने की चटनी, नींबू, प्याज, मिर्च और जीरा पाउडर की एक परत डाली जाती है. फिर ऊपर से दोबारा सत्तू डालकर पूरा ग्लास भर दिया जाता है.

अंत में ऊपर से एक बार फिर मसाले और बाकी सामग्री डाली जाती है. यही तीन-लेयर वाला अंदाज इस सत्तू को खास बनाता है. हर घूंट के साथ प्याज की कच-कच और मसालों का स्वाद लोगों को अलग ही मजा देता है. ऊपर से अगर किसी को कुछ और चाहिए, तो उसकी भी व्यवस्था यहां मिल जाती है. एक बार में करीब 50 ग्लास सत्तू रेडी हो जाता है.

रोज बिक्री का हिसाब किताब जान चौंक जायेंगे आप
भोला जी बताते हैं कि उनकी दुकान साल के बारहों महीने लगती है. मौसम चाहे सर्दी का हो या बरसात का, बिस्कोमान भवन के नीचे सत्तू का यह स्वाद लोगों को हर दिन मिलता है. हालांकि, गर्मियों के चार महीनों में यहां सबसे ज्यादा भीड़ उमड़ती है.

उनके मुताबिक, रोजाना करीब 60 से 65 किलो सत्तू की खपत हो जाती है. यानी एक दिन में लगभग 2500 से 3000 गिलास सत्तू लोग पी जाते हैं. तीन दशक पुरानी इस दुकान की दिलचस्प बात यह है कि इसका कोई आधिकारिक नाम नहीं है. लोग इसे बस बिस्कोमान वाला सत्तू कहकर पहचानते हैं. पटना में शायद ही कोई ऐसा हो जिसने इस नाम को न सुना हो. यही वजह है कि यह दुकान अब सिर्फ सत्तू बेचने की जगह नहीं, बल्कि शहर की पहचान बन चुकी है.



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