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छपरा की यह मशहूर लस्सी पिछले 50 सालों से अपने पुराने स्वाद के लिए जानी जाती है। साल 1974 से शुरू हुई इस दुकान पर लस्सी पीने के लिए लोगों की कतार लगती है। मिट्टी के कुल्हड़ में परोसी जाने वाली इस लस्सी में खोआ, काजू और केसर मिलाया जाता है। इसकी शुद्धता और स्वाद का जादू आज भी बरकरार है।

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छपरा: छपरा शहर की यह सबसे मशहूर लस्सी स्वाद के मामले में अपनी एक अनोखी पहचान बना चुकी है. पर्व-त्योहार ही नहीं, बल्कि इस भीषण गर्मी के मौसम में भी इसे पीने के लिए लोगों की लंबी कतारें लग रही हैं. इसका स्वाद ऐसा है कि एक बार चखने के बाद लोग यहां बार-बार खींचे चले आते हैं.

छपरा में ऐसी कई चीजें हैं जो अपनी शुद्धता के लिए जानी जाती हैं. जिले के लोग ही नहीं, बल्कि विदेशों में रहने वाले प्रवासी भी जब 5 साल बाद छपरा आते हैं, तो इस स्वादिष्ट लस्सी का लुत्फ उठाना कभी नहीं भूलते. हम बात कर रहे हैं सारण जिले की सबसे मशहूर लस्सी की. इसका स्वाद लेने के लिए आपको छपरा शहर के हथुआ मार्केट स्थित पूर्वी गेट के पास जाना होगा. जहां दयानंद राय पूरी शुद्धता के साथ इस लस्सी को तैयार करते हैं.

पूरी तरह प्राकृतिक और शुद्ध है तैयारी
दयानंद राय ग्रामीण क्षेत्रों से शुद्ध दूध लाकर सबसे पहले गाढ़ी दही तैयार करते हैं. इसके बाद उस दही में कई खास सामग्रियां मिलाकर लस्सी बनाई जाती है. यहां साफ-सफाई और शुद्धता का विशेष ख्याल रखा जाता है। सबसे खास बात यह है कि ग्राहकों को यह लस्सी मिट्टी के कुल्हड़ में परोसी जाती है. इस लस्सी को और भी लाजवाब बनाने के लिए इसमें काजू, किशमिश, खोआ, चेरी और इलायची जैसी चीजें डाली जाती हैं.

जानिए कैसे तैयार होती है यह स्वादिष्ट लस्सी

  • दूध को उबालना: सबसे पहले ग्रामीण इलाकों से मंगाए गए शुद्ध दूध को कोयले की आंच पर देर तक उबाला जाता है. जिससे दूध पर मलाई की मोटी परत जम जाती है.
  • दही जमाना: दूध जब हल्का गुनगुना रह जाता है, तो उसमें जामन डालकर पारंपरिक तरीके से दही जमाया जाता है. 24 घंटे के भीतर बेहतरीन गाढ़ी दही तैयार हो जाती है.
  • सामग्रियों का मिश्रण: इस तैयार दही में खोआ, इलायची, किशमिश, काजू और केसर जैसी कीमती सामग्रियां मिलाकर मथनी से लस्सी तैयार की जाती है.
  • कुल्हड़ का कमाल: तैयार लस्सी को मिट्टी के गिलासों में भरकर फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दिया जाता है. पूरी तरह ठंडी होने के बाद जब यह ग्राहकों को मिलती है, तो मिट्टी की सौंधी खुशबू इसका स्वाद दोगुना कर देती है.

साल 1974 से बरकरार है वही पुराना स्वाद

दयानंद राय ने मुस्कुराते हुए बताया ‘हम इस लस्सी में सामग्रियों के साथ-साथ अपना प्यार भी मिलाते हैं. साल 1974 से हमारी दुकान पर लोगों को पूरी शुद्धता के साथ लस्सी पिलाई जा रही है. यही वजह है कि लोग दूर-दूर से यहां आते हैं. दुबई में रहने वाले लोग भी जब 5 साल बाद वतन लौटते हैं, तो हमारी दुकान पर लस्सी पीने जरूर आते हैं.’

उन्होंने आगे बताया कि साल 1974 में उनके पिताजी ने इस दुकान की शुरुआत की थी. तब से लेकर आज तक लस्सी की लोकप्रियता लगातार बढ़ती ही गई है. जिस शुद्धता और स्वाद के साथ पहले लस्सी मिलती थी, आज भी उसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है. मिट्टी के पारंपरिक बर्तनों का उपयोग ही इस लस्सी के असली स्वाद को आज भी बरकरार रखे हुए है.

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Prashun Singh

मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.



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