हाल ही में घोषित हुए 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में राजकुमार राव स्टारर फिल्म ‘श्रीकांत’ ने सर्वश्रेष्ठ हिंदी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किया है। यह जीत केवल एक सिनेमाई सफलता नहीं, बल्कि श्रीकांत बोला के अटूट हौसले, संघर्ष और दूरदर्शिता को सलाम करने का एक जरिया भी है। इस बेहद खास मौके पर फिल्म में अहम भूमिका निभाने वाले अभिनेता शरद केलकर ने इंडिया टीवी के साथ बातचीत में अपनी खुशी और गर्व जाहिर किया।

‘श्रीकांत’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि प्रेरणा की एक मिसाल

फिल्म में शरद केलकर ने बिजनेसमैन रवि मांथा का किरदार निभाया था, जो श्रीकांत के सिर्फ निवेशक ही नहीं बल्कि उनके सबसे बड़े मार्गदर्शक और दोस्त बनकर हर मोड़ पर खड़े रहे। अपनी सशक्त आवाज़ और प्रभावकारी अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले शरद हमेशा से सामाजिक रूप से मजबूत संदेश देने वाली कहानियों से जुड़ना पसंद करते हैं। लेकिन ‘श्रीकांत’ उनके लिए बेहद भावनात्मक अनुभव रही। यह फिल्म किसी पारंपरिक मसालेदार फॉर्मूले पर आधारित होने के बजाय यह साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी दिव्यांगता सपनों की राह में रोड़ा नहीं बन सकती।

पुरस्कार से परे, सच्ची कहानी को बयां करने का संकल्प

इस ऐतिहासिक सम्मान पर अपनी बात रखते हुए शरद केलकर ने कहा, ‘कुछ फिल्में आप अपने अभिनय के लिए करते हैं और कुछ इसलिए, क्योंकि वे आपको याद दिलाती हैं कि कहानियां आखिर क्यों सुनाई जानी चाहिए। जब तुषार हिरानंदानी हमारे पास यह स्क्रिप्ट लेकर आए थे, तब हम पुरस्कारों के लिए नहीं बना रहे थे। हमारी सिर्फ यही कोशिश थी कि हम श्रीकांत बोला के अद्भुत जज्बे के साथ पूरा न्याय कर सकें। यह राष्ट्रीय पुरस्कार उन कहानियों के लिए एक बड़ी पहचान और सम्मान है, जो सच में मायने रखती हैं।’

विश्वास और मानवीय संवेदनाओं की जीत

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए शरद ने कहा, ‘रवि मांथा का किरदार निभाते हुए मैंने भरोसे और विश्वास की असली ताकत को करीब से महसूस किया। आज ‘श्रीकांत’ को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित होते देखना मेरे लिए बेहद गर्व और संतोष का क्षण है। यह साबित करता है कि सच्ची, दिल को छू लेने वाली मानवीय कहानियां आज भी सीधे देशवासियों के दिलों तक पहुंचती हैं।’

समावेशिता और बेहतरीन सिनेमा का अनोखा तालमेल

तुषार हिरानंदानी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में राजकुमार राव ने दृष्टिबाधित उद्योगपति श्रीकांत बोला की भूमिका को जीवंत किया था। फिल्म में ज्योतिका, अलाया एफ और शरद केलकर ने भी अपनी अदाकारी से जान फूंक दी। जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई थी, तब दर्शकों के साथ-साथ समीक्षकों ने भी इसकी जमकर तारीफ की थी। इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि इसमें कई दृष्टिबाधित कलाकारों को अभिनय का मौका देकर समावेशिता की एक बेहतरीन मिसाल कायम की गई। शरद केलकर के लिए यह पुरस्कार इस बात की पुष्टि करता है कि सच्ची नीयत और ईमानदारी से बनाई गई फिल्में हमेशा दर्शकों के दिलों पर छाप छोड़ती हैं।

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