चीन का एक पसंदीदा व्यंजन है. सदियों से ये वहां हिट है. जब कोई खास मेहमान आता है तो इसे जरूर खिलाते हैं. इस डिश को कहा जाता है हजार साल का अंडा. इसे सदियों पुराना अंडा या पीडान भी कहा जाता है. ये चीन का एक पारंपरिक और बेहद लोकप्रिय व्यंजन है . इसका नाम भले ही “हज़ार साल” पुराना हो, लेकिन इसे बनने में कुछ हफ्तों से लेकर कई महीनों का समय लगता है.

इसको बनाने की कहानी रोचक है. सबसे पहले तो हम आपको ये बता देते हैं कि हजार साल का अंडा होता क्या है. ये एक संरक्षित अंडा होता है, जिसे अक्सर बतख के अंडे से बनाया जाता है, हालांकि मुर्गी या बटेर के अंडे का भी उपयोग होता है . खास प्रक्रिया से गुजरने के बाद इसकी बनावट और रंग पूरी तरह से बदल जाते हैं.

अंडे में क्या बदलाव आ जाता है

सफेद भाग पारदर्शी, गहरे भूरा या एम्बर रंग का जिलेटिन जैसा हो जाता है
पीला भाग यानि योक गहरे हरे या भूरे रंग का मलाईदार और ठोस बन जाता है
इसे “सोंगहुआ दान” यानी “पाइन-पैटर्न वाला अंडा” भी कहा जाता है, क्योंकि कभी-कभी इसके सफेद भाग पर बर्फ के फूलों जैसी सुंदर आकृतियां बन जाती हैं.

स्वाद और सुगंध कैसी होती है?

यह पूरी तरह से सुरक्षित और पौष्टिक होता है. इसका स्वाद और महक बहुत ही अनोखी होती है. इसमें थोड़ी सी सल्फर और अमोनिया जैसी गंध आती है. स्वाद नमकीन, तीखा और बहुत ही समृद्ध स्वाद होता है, जिसे लोग धीरे-धीरे अपनाया जाने वाला स्वाद मानते हैं.

चूने और नमक के मिश्रण में अंडे रखने से एक रासायनिक प्रक्रिया शुरू होती है, जो धीरे-धीरे अंडे के अंदर प्रवेश करती है, उसके प्रोटीन को तोड़ती है और उसे यह अनोखा रूप, बनावट और स्वाद देती है. (News18 AI Image)

कैसे तैयार किया जाता है?

अब बताते हैं इसका असली राज कि इसे कैसे तैयार किया जाता है. इसके पीछे का विज्ञान अल्कलाइन यानि क्षारीय संरक्षण है. परंपरागत और आधुनिक, दोनों
तरीकों में अंडे को एक क्षारीय पेस्ट या घोल में रखा जाता है. यह प्रक्रिया सोडियम हाइड्रोक्साइड बनाती है, जो धीरे-धीरे अंडे के अंदर प्रवेश कर उसे बदल देती है.

पुराना पारंपरिक तरीका

यह सबसे पुराना तरीका है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसकी खोज मिंग राजवंश में करीब 600 साल पहले हुई. चूना, लकड़ी की राख, नमक और चावल की भूसी या मिट्टी से एक मिश्रण तैयार किया जाता है. इसमें गरम चाय की पत्तियां मिलाई जाती हैं ताकि एक गाढ़ा पेस्ट बन जाए. कच्चे अंडों को इस पेस्ट में लपेटकर चावल की भूसी में रोल किया जाता है ताकि वे आपस में चिपके नहीं. इन लपेटे हुए अंडों को मिट्टी के बर्तन या टोकरियों में कई हफ्तों से लेकर कई महीनों के लिए रख दिया जाता है.

जब रेफ्रिजरेटर नहीं थे, तब चीन में पुराने तरीकों से अंडों को लंबे समय तक रखने के लिए खास तरीके अपनाए जाते थे. चूने की क्षारीयता ने ये काम कर दिया (News18 AI Image)

अब आधुनिक तरीका क्या

आजकल बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए एक तेज़ और साफ-सुथरा तरीका अपनाया जाता है. अंडों को नमक, कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड और सोडियम कार्बोनेट के घोल में करीब 10 दिनों के लिए डुबोया जाता है. इसके बाद उन्हें निकालकर एयरटाइट कंटेनर में कुछ हफ्तों के लिए रख दिया जाता है, जहां वे पकना पूरा करते हैं.

कैसे खाया जाता है?

हजार साल के अंडे को अकेले या कई व्यंजनों के हिस्से के रूप में खाया जाता है. अक्सर इसे छीलकर टुकड़ों में काटा जाता है. अदरक के स्लाइस या सोया सॉस के साथ ऐपेटाइज़र की तरह परोसा जाता है.चावल का दलिया बनाते समय उसमें इसके टुकड़े डाले जाते हैं, जो उसे एक खास स्वाद और बनावट देता है. इसे मसले हुए टोफू के साथ मिलाकर भी खाया जाता है.

यह सड़ा हुआ या खराब अंडा नहीं है. सही प्रक्रिया से बनाया गया ये अंडा बैक्टीरिया और फफूंद से मुक्त और पूरी तरह सुरक्षित होता है. क्षारीय प्रक्रिया के कारण ये अंडा ताजे अंडे की तुलना में पचाने में थोड़ा आसान हो सकता है. इसमें कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम हो जाता है.

माना जाता है कि इसकी खोज मिंग राजवंश में करीब 600 साल पहले हुई थी.  (News18 AI Image)

जब इसे रवींद्रनाथ टैगोर को परोसा गया

जब रवींद्रनाथ टैगोर चीन गए, तो कहा जाता है कि चीनियों ने भारत के इस महान कवि और रहस्यवादी के स्वागत में भव्य भोज का आयोजन किया. प्रोफेसर क्षितिमोहन सेन (अमर्त्य सेन के दादा) और प्रसिद्ध चित्रकार नंदलाल बसु भी अन्य प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे. चीन में उन्हें सबसे पसंदीदा व्यंजन, ‘हजार साल का अंडा’ परोसा गया.

रवींद्रनाथ ने उन्हें खाना शुरू कर दिया. इसलिए बाकी दोनों को भी ऐसा ही करना पड़ा. इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का परिणाम रात में सामने आने लगा. नंदलाल को पेट में तेज दर्द हुआ. क्षितिमोहन ने पूरी रात करीब शौचालय में ही बिताई. अगले दिन, दोनों का चेहरा पीला पड़ गया था, लेकिन गुरुदेव एकदम स्वस्थ थे. नंदलाल ने उनसे पूछा कि उन्होंने इतने सारे अंडे कैसे खा लिए. उन्हें कोई नुकसान भी नहीं हुआ। हल्की मुस्कान के साथ उन्होंने उत्तर दिया, ‘क्योंकि मैंने उन्हें खाया ही नहीं.’

‘गुरुदेव, ऐसा कैसे हो सकता है? हमने देखा कि आप इन्हें एक-एक करके खा रहे हैं!’
‘मैंने उन्हें अपनी लंबी दाढ़ी से गुजारा और अपने लंबे लबादे के नीचे से अपनी गोद में रख लिया.’ टैगोर के इस जवाब दोनों बस उनका मुंह देखते रह गए.

क्या इसे चीन आने वाले राष्ट्रप्रमुखों को भी परोसते हैं

नहीं, ऐसा बहुत कम ही होता है. दरअसल चीन के राष्ट्रीय भोज में “हज़ार साल का अंडा” परोसा जाना करीब असंभव जैसा ही है. इसके पीछे दिलचस्प कारण हैं. ये व्यंजन भले ही चीन में लोकप्रिय हो, लेकिन राजकीय समारोहों में इसे परोसने से बचा जाता है.

इसकी तेज़ सुगंध और अनोखी बनावट कई पश्चिमी देशों के मेहमानों को अजीब लग सकती है. एक रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत में बने मेन्यू में जानबूझकर हज़ार साल के अंडे को शामिल नहीं किया गया था क्योंकि ये पश्चिमी भोजन संबंधी संवेदनशीलताओं को परेशान कर सकता है.
चीन के राष्ट्रीय भोज की विशेषता यह होती है कि यह हल्का, कम मसालेदार और कम तेल वाला होता है.

क्या ये भारत में भी मिल सकता है

हां, ‘हज़ार साल का अंडा’ भारत में, खासतौर पर कोलकाता के चाइनाटाउन में मिल सकता है. हालांकि कहना चाहिए कि ये वहां भी आम नहीं है जितना चिली चिकन या मंचूरियन. लिहाजा ये आसानी से भारत में हर चीनी रेस्तरां में नहीं मिलेगा. कोलकाता में डेढ़ दो सदियों से चाइनीज लोगों की बस्ती है, जिसे चाइनाटाउन कहा जाता है. यहां पर प्रामाणिक चीनी व्यंजन मिलते हैं, इसलिए हजार सालों का अंडा यहां मिल जाएगा. दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर और चेन्नई में कुछ ऑथेंटिक चीनी रेस्तरां, जिन्हें अक्सर ‘हाई-एंड’ रेस्तरां कहा जाता है, वहां भी ये डिश परोसते हैं.



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