Last Updated:

Sitamarhi Famous Pedakiya: बिहार के पर्व-त्योहार और शुभ काम यहां की खास पिड़किया मिठाई के बिना पूरे नहीं होते. इसी क्रम में सीतामढ़ी के भिट्ठामोड़ की प्रसिद्ध पिड़किया का स्वाद नेपाल से गल्फ देशों तक फैल रहा है. कभी चार पैसे में मिलने वाली यह मिठाई अब 35 से 40 रुपये प्रति पीस पहुंच गई है.

सीतामढ़ी. भारत-नेपाल सीमा पर स्थित सीतामढ़ी जिले के सुरसंड प्रखंड और भिट्ठामोड़ की प्रसिद्ध ‘पिड़किया’ (गुझिया) का स्वाद केवल बिहार ही नहीं, बल्कि सरहद पार नेपाल और दुनिया के कई देशों में लोगों के दिलों पर राज कर रहा है. भारत और नेपाल के सांस्कृतिक व भावनात्मक संबंधों को मिठास से जोड़ने वाली यह खास मिठाई अपनी विशिष्ट बनावट, सोंधी खुशबू और लंबे समय तक खराब न होने की खूबी के लिए जानी जाती है. जनकपुर धाम जाने वाले श्रद्धालु और पर्यटक इसे बड़े चाव से अपने साथ ले जाते हैं.

कभी मिलती थी चार पैसे में
इस मिठाई का इतिहास ब्रिटिश काल से जुड़ा हुआ है. पुराने समय में जब लोग लंबी यात्राओं पर निकलते थे, तब खोवा से भरी यह पिड़किया सफर का मुख्य सहारा बनती थी. सुरसंड निवासी स्वर्गीय रामचंद्र साह ने अपने चार पुत्रों के साथ मिलकर इसे व्यापक पहचान दिलाई. शुरुआती दौर में चार पैसे और 10 पैसे में मिलने वाली यह पिड़किया समय के साथ आज 35 से 40 रुपये प्रति पीस के हिसाब से बिकती है. आम दिनों में यहां एक दुकान से 500 से 1,000 पिड़किया बिक जाती हैं, जबकि शादी-ब्याह और पर्व-त्योहारों में यह संख्या 5,000 से 10,000 तक पहुंच जाती है.

एक में भर जाएगा पेट
भिट्ठामोड़ के स्थानीय दुकानदारों के अनुसार, यहां बनने वाली पिड़किया में लगभग 35 से 50 ग्राम तक शुद्ध खोवा, काजू, किशमिश और इलायची की भरावन होती है. इसके बाद इसे चाशनी में डुबोया जाता है, जिससे इसका आकार काफी बड़ा, नरम और रसीला हो जाता है. एक पिड़किया का वजन इतना पर्याप्त होता है कि एक पीस खाने के बाद ही व्यक्ति का पेट भर जाता है. दुकानदारों का कहना है कि 1 किलो खोवा में लगभग 20 से 22 पीस पिड़किया तैयार की जाती हैं.

दूर-दूर तक जाती है यह मिठाई
इस मिठाई की मांग स्थानीय सीमाओं से परे बहुत दूर-दूर तक फैली हुई है. पटना, दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से आने वाले पर्यटकों के अलावा नेपाल के काठमांडू तक रोजाना दर्जनों डिब्बे भेजे जाते हैं. इतना ही नहीं, विदेशों में रहने वाले रिश्तेदार भी खाड़ी देशों तक इसे पैक करवाकर मंगवाते हैं. पिछले 30 से 40 वर्षों से लगातार बनते आ रहे इस व्यंजन की गुणवत्ता ही इसकी बढ़ती मांग की मुख्य वजह है.

इसके बिना अधूरे हैं त्योहार
मिथिलांचल की संस्कृति में पिड़किया का विशेष धार्मिक और पारंपरिक महत्व है. तीज, जितिया, होली, दुर्गापूजा, दीपावली और छठ जैसे बड़े पर्वों पर घर-घर में बिना पिड़किया के अनुष्ठान अधूरा माना जाता है. हालांकि, घरों में बनने वाली पिड़किया आकार में थोड़ी छोटी, सूखी और बिना चाशनी की होती है, लेकिन सुरसंड और भिट्ठामोड़ की रसीली मिठाई अपनी खास मिठास के कारण सबसे पहली पसंद बनी हुई है. इसे बेटियों के घर ‘सनेस’ (संदेश) के रूप में भी भेजा जाता है, जो भारत और नेपाल के पारिवारिक प्रेम का प्रतीक है.

About the Author

Raina Shukla

Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…

और पढ़ें



Source link

Write A Comment