Last Updated:

Lote-wale ka Jaleba Nainital : नैनीताल में ‘लोटे वाले की दुकान’ अपने जलेबे के लिए हमेशा से चर्चा में रही है. करीब 176 साल पुरानी इस दुकान की नींव साल 1850 में शिवलाल शाह ने रखी थी. उस समय नैनीताल अंग्रेजी शासन के अधीन था. दुकान पर बनने वाले जलेबा का स्वाद धीरे-धीरे इतना लोकप्रिय हुआ कि कई ब्रिटिश अधिकारी भी उसके मुरीद हो गए. यह दुकान समय के साथ नैनीताल के पुराने बाजार की पहचान बन गई. लोकल 18 से दुकान के मालिक रक्षित साह बताते हैं कि यहां मिलने वाला जलेबा आम जलेबी से आकार में काफी बड़ा और मोटा होता है. बाहर से कुरकुरा और अंदर से रसदार होता है.

Top Deals Inside

नैनीताल. सरोवर नगरी नैनीताल की पहचान सिर्फ नैनी झील, पहाड़ों और खूबसूरत वादियों से नहीं है, बल्कि यहां की गलियों में बसी कई दशकों पुरानी दुकानों से भी है. इन दुकानों के स्वाद में शहर का इतिहास और संस्कृति आज भी जिंदा है. नैनीताल के बड़ा बाजार में स्थित नैनी जलेबा भंडार, जिसे स्थानीय लोग आज भी ‘लोटे वाले की दुकान’ के नाम से जानते हैं, ऐसी ही दुकान है. करीब 176 साल पुरानी इस दुकान की कहानी देश की आजादी से भी जुड़ी हुई है. दुकान के मालिक रक्षित साह लोकल 18 से बताते हैं कि इस दुकान की शुरुआत साल 1850 में उनके दादा शिवलाल शाह ने की थी. उस समय नैनीताल अंग्रेजी शासन के अधीन था. दुकान पर बनने वाले जलेबा का स्वाद धीरे-धीरे इतना लोकप्रिय हुआ कि कई ब्रिटिश अधिकारी भी खास तौर पर यहां जलेबा खाने पहुंचने लगे. यही वजह है कि यह दुकान समय के साथ नैनीताल के पुराने बाजार की पहचान बन गई.

पांचवीं पीढ़ी के पास कमान

इस दुकान की सबसे खास और ऐतिहासिक कहानी 15 अगस्त 1947 से जुड़ी हुई है. रक्षित साह के मुताबिक, जब देश आजाद हुआ और नैनीताल में पहली बार तिरंगा फहराया गया, तो आजादी की खुशी में उनकी दुकान का जलेबा पूरे शहर में मुफ्त बांटा गया. उस दिन मिठाई सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि आजादी के जश्न और खुशी का हिस्सा बन गई. आज भी दुकान की जगह और जलेबा बनाने की पारंपरिक विधि पीढ़ियों से चली आ रही है. रक्षित साह इस विरासत की पांचवीं पीढ़ी हैं और आज भी अपने पूर्वजों की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.

जलेबी से कितना अलग

रक्षित साह बताते हैं कि यहां मिलने वाला जलेबा आम जलेबी से आकार में काफी बड़ा और मोटा होता है. इसका स्वाद और बनावट ही इसे दूसरी मिठाइयों से अलग बनाती है. शुद्ध देसी घी में तैयार होने वाला यह जलेबा बाहर से बेहद कुरकुरा और अंदर से रसदार होता है. रक्षित के मुताबिक, पुराने समय में आसपास के इलाकों से लोग मवेशियों के चारे के लिए पैदल या घोड़े पर सवार होकर नैनीताल आया करते थे. रास्ते में भूख लगने पर लोग इस दुकान पर रुककर जलेबा खाते थे. धीरे-धीरे यही बड़ा आकार और इसकी खास पहचान लोगों की जुबान पर चढ़ गई और इसे जलेबा कहा जाने लगा.

‘जलेबा किंग’ के नाम से मशहूर

इस जलेबे की लोकप्रियता सिर्फ स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रसिद्ध लेखिका गौरा पंत ‘शिवानी’ भी इस मिठाई की प्रशंसक थीं. रक्षित साह बताते हैं कि शिवानी ने उनके दादा सूरज प्रसाद शाह को ‘जलेबा किंग’ की उपाधि दी थी. आज भी दुकान पर लगी तस्वीरों और पुरानी यादों में इस उपाधि की कहानी दिखाई देती है. दुकान पर कई नामी हस्तियां और देशभर से आने वाले पर्यटक भी जलेबा चख चुके हैं. रक्षित साह के मुताबिक, उनकी दुकान के जलेबे की चर्चा लोकप्रिय कॉमेडी शो ‘द कपिल शर्मा शो’ तक में हो चुकी है.

नयना देवी महोत्सव से कनेक्शन

इस जलेबे का संबंध नैनीताल की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी रहा है. रक्षित साह बताते हैं कि नयना देवी महोत्सव के दौरान जलेबा विशेष रूप से माता को अर्पित किया जाता है. महोत्सव के अंतिम दिन जब माता का डोला नगर भ्रमण पर निकलता है, तब करीब चार किलो वजनी विशाल जलेबा विशेष प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है और बाद में श्रद्धालुओं में बांटा जाता है. यही वजह है कि ‘लोटे वाले की दुकान’ आज सिर्फ मिठाई की दुकान नहीं, बल्कि नैनीताल के स्वाद, संस्कृति और इतिहास की विरासत भी है.

About the Author

Priyanshu Gupta

प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…

और पढ़ें



Source link

Write A Comment