Gelato History: इटली की गलियों में घूमते हुए अगर हाथ में ठंडी, मलाईदार जिलेटो की कोन मिल जाए, तो सफर का मजा ही बदल जाता है. पिस्ता, चॉकलेट, स्ट्रॉबेरी या क्लासिक क्रीम-जिलेटो आज इटली की पहचान का हिस्सा है. मगर इसकी आधुनिक कहानी सिर्फ इतालवी हुनर और पारंपरिक रेसिपी तक सीमित नहीं है. इसके पीछे युद्ध के बाद की एक ऐसी कहानी भी है, जिसमें अमेरिकी मिल्ट्री इक्युपमेंट्स की भूमिका अहम रही. टस्कनी के एम्पोली शहर में एक साधारण डेयरी और बार चलाने वाले बगनोली परिवार ने पुराने अमेरिकी फ्रीजर और मशीनों को नए काम में लगाया.
इसी प्रयोग ने जिलेटो को छोटे स्थानीय कारोबार से निकालकर बड़े स्तर पर पहुंचाने की राह तैयार की. दिलचस्प बात यह है कि जिस मिठाई को आज लोग पूरी तरह इतालवी मानते हैं, उसकी आधुनिक यात्रा में अमेरिकी टेक्नोलॉजी का एक अनोखा चैप्टर भी जुड़ा हुआ है.
जिलेटो की जड़ें बहुत पुरानी हैं
जिलेटो का इतिहास एडवांस मशीनों से शुरू नहीं हुआ. पुराने समय में बर्फ, फलों के रस और मीठे सिरप से ठंडी चीजें तैयार की जाती थीं. इटली के अलग-अलग हिस्सों में मौसम और स्थानीय सामग्री के हिसाब से इनका रूप बदलता रहा. पुनर्जागरण के दौर में फ्लोरेंस के रसोइयों और कारीगरों ने दूध, क्रीम, अंडे और फलों को बर्फ के साथ जमाकर ज्यादा मुलायम और स्वादिष्ट मिठाइयां बनानी शुरू कीं. धीरे-धीरे यही प्रयोग उस शैली की ओर बढ़ा, जिसे आज जिलेटो के नाम से जाना जाता है, लेकिन एक बड़ी परेशानी थी-इसे ठंडा रखना आसान नहीं था. प्राकृतिक बर्फ, नमक और हाथ से चलने वाली मशीनों पर निर्भरता के कारण उत्पादन छोटा रहता था. जिलेटो बनाना मेहनत वाला काम था और इसे दूर तक पहुंचाना लगभग मुश्किल था.
युद्ध के बाद आया बड़ा बदलाव
सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद इटली में बहुत कुछ बदल रहा था. इसी दौर में एम्पोली के बगनोली परिवार ने अपनी डेयरी और बार के कारोबार में जिलेटो को जगह दी. परिवार के सदस्यों ने युद्ध के बाद उपलब्ध पुराने अमेरिकी सैन्य फ्रीजर और मशीनों को हासिल किया. ये उपकरण उनके लिए सिर्फ कबाड़ नहीं थे. उन्हें समझ आया कि इनसे जिलेटो को ज्यादा स्थिर तापमान पर जमाया जा सकता है और एक जैसे बैच तैयार किए जा सकते हैं. मशीनों को दोबारा इस्तेमाल करने के लिए कई हिस्सों में बदलाव किए गए. धीरे-धीरे ऐसा तरीका विकसित हुआ, जिससे जिलेटो की क्वालिटी बनाए रखते हुए ज्यादा मात्रा में उत्पादन संभव हुआ. यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया. पहले जिलेटो किसी दुकान या मोहल्ले तक सीमित था, लेकिन अब इसे दूसरे इलाकों में भी पहुंचाने की संभावना दिखाई देने लगी.
छोटे कारोबार से बना बड़ा नेटवर्क
बगनोली परिवार ने केवल मशीनों पर काम नहीं किया, बल्कि जिलेटो पहुंचाने का तरीका भी बदला. उस समय आज जैसी आधुनिक कोल्ड-चेन व्यवस्था नहीं थी. इसलिए ठंडे कंटेनरों और अस्थायी इंसुलेटेड बॉक्स का इस्तेमाल किया गया. जिलेटो को छोटे कनस्तरों में भरकर आसपास के बार और कैफे तक पहुंचाया जाने लगा. कुछ जगहों पर परोसने के लिए फ्रीजर भी उपलब्ध कराए गए. इस मॉडल से दुकानदारों को अपनी मशीन खरीदने की जरूरत कम हुई और निर्माता के लिए बाजार बढ़ता गया. यही व्यवस्था आगे चलकर सैमोंटाना ब्रांड की पहचान बनी. स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ कारोबार धीरे-धीरे टस्कनी से बाहर पहुंचा और फिर पूरे इटली में फैलने लगा.
Sammontana ने बदली जिलेटो की तस्वीर
युद्ध के बाद इटली में आर्थिक बदलाव तेज हो रहे थे. लोगों की आमदनी बढ़ रही थी, शहरों का विस्तार हो रहा था और समुद्र किनारे छुट्टियां बिताने की संस्कृति भी लोकप्रिय हो रही थी. ऐसे समय में जिलेटो बिल्कुल सही उत्पाद साबित हुआ-ठंडा, आसानी से मिलने वाला और चलते-फिरते खाया जा सकने वाला. समुद्र तट के छोटे कियोस्क से लेकर कैफे और सड़क किनारे की दुकानों तक जिलेटो पहुंचने लगा. बच्चों के लिए यह गर्मी की छुट्टियों की याद बना, जबकि बड़ों के लिए शाम की सैर का हिस्सा. बाद में दूसरी बड़ी फ्रोजन-डेजर्ट कंपनियां भी बाजार में आईं. इससे औद्योगिक उत्पादन बढ़ा, लेकिन इसके साथ पारंपरिक जिलेटेरिया भी अपनी पहचान मजबूत करते गए. बेहतर स्वच्छता, मशीनों और नई टेक्नोलॉजी ने कारीगर जिलेटो बनाने वालों को भी अपने काम को और बेहतर करने का मौका दिया.
आज भी जुड़ी है पुरानी कहानी
आज इटली में जिलेटो केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि रोजमर्रा की संस्कृति का हिस्सा है. फिर भी इसकी मॉर्डन पॉपुलेरिटी के पीछे एम्पोली के उस छोटे कारोबार और युद्ध के बाद दोबारा इस्तेमाल किए गए अमेरिकी इक्युपमेंट्स की कहानी कम ही लोग जानते हैं. सैमोंटाना ने जिस मॉडल को आगे बढ़ाया, उसने दिखाया कि परंपरा और टेक्नोलॉजी हमेशा एक-दूसरे के विरोध में नहीं होतीं. सही टेक्नोलॉजी किसी पुराने स्वाद को खत्म करने के बजाय उसे ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकती है.