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Bihar Pidkiya Recipe: बिहार की पिड़किया सिर्फ एक पारंपरिक मिठाई नहीं, बल्कि गांव की रसोई, त्योहारों और पारिवारिक यादों से जुड़ा स्वाद है. गुड़, आटा और खोया जैसे साधारण ingredients से बनने वाली यह मिठाई आज भी लोगों को अपनी ओर खींचती है.

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बिहार की पारंपरिक पिड़किया कैसे बनती है और इसकी खासियत क्या है? (Image-AI generated)

Bihar Pidkiya Recipe: बिहार के गांवों में त्योहार या किसी खास मौके पर घर की रसोई से आने वाली खुशबू कई बार पूरे माहौल को बदल देती है. कहीं गुड़ पक रहा होता है, कहीं आटा गूंथा जा रहा होता है और कहीं महिलाएं मिलकर ऐसी मिठाई तैयार कर रही होती हैं, जिसका स्वाद बाजार की चमकदार मिठाइयों से बिल्कुल अलग होता है. इन्हीं पारंपरिक पकवानों में पिड़किया का नाम खास तौर पर लिया जाता है. देखने में यह गुजिया जैसी लग सकती है, लेकिन इसका स्वाद और बनाने का स्थानीय तरीका इसे अलग पहचान देता है.

बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में पिड़किया को त्योहारों, पूजा-पाठ और पारिवारिक अवसरों पर बनाया जाता रहा है. खास बात यह है कि इसकी पहचान किसी महंगे ingredient से नहीं, बल्कि घर में मौजूद साधारण चीजों और हाथ के हुनर से बनी है.

कैसे बनती है बिहार की पिड़किया?

पिड़किया की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसकी तैयारी बहुत जटिल नहीं होती. आमतौर पर इसके लिए आटा या मैदा लेकर नरम आटा तैयार किया जाता है. इसके बाद अंदर भरने के लिए खोया, गुड़ या चीनी, नारियल और सूखे मेवों का इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, अलग-अलग परिवार और इलाकों में इसकी filling में थोड़ा फर्क देखने को मिलता है.

देसी स्वाद का असली राज

पिड़किया का स्वाद केवल उसकी सामग्री से नहीं आता. इसे आकार देना और ठीक तरह से बंद करना भी एक कला है. आटे की छोटी लोई बेलकर उसमें तैयार मिश्रण भरा जाता है और किनारों को दबाकर बंद किया जाता है. इसके बाद इसे घी या तेल में सुनहरा होने तक तला जाता है. कुछ जगहों पर इसे अलग तरीके से पकाने की परंपरा भी मिलती है. यही वजह है कि एक ही नाम की पिड़किया अलग-अलग घरों में थोड़ी अलग नजर आ सकती है. किसी के यहां इसमें नारियल ज्यादा होता है तो किसी के यहां गुड़ और खोये का स्वाद प्रमुख रहता है.

त्योहारों से जुड़ी है गहरी परंपरा

गांव की रसोई में बनने वाली ऐसी मिठाइयां केवल खाने की चीज नहीं होतीं. इनके साथ परिवार की यादें और स्थानीय परंपराएं भी जुड़ी रहती हैं. खास मौकों पर घर की महिलाएं मिलकर पिड़किया तैयार करती हैं. बच्चे पास बैठकर कभी भरावन चखते हैं तो कभी तैयार मिठाई को देखकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं. आज बाजार में कई तरह की आधुनिक मिठाइयां आसानी से मिल जाती हैं, लेकिन पिड़किया का आकर्षण अब भी बना हुआ है. इसकी वजह शायद वही घरेलू स्वाद है, जिसे मशीनों और पैकेजिंग से दोहराना आसान नहीं.

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बदलते दौर में भी कायम है देसी मिठाई की पहचान

शहरों में रहने वाले बिहार के लोग भी त्योहारों के दौरान पारंपरिक मिठाइयों को याद करते हैं. कई परिवार अब घर पर पिड़किया बनाने की कोशिश करते हैं, जबकि कुछ जगहों पर स्थानीय दुकानों में भी इसकी मांग देखने को मिलती है. पिड़किया हमें यह भी याद दिलाती है कि स्वाद हमेशा महंगी सामग्री का मोहताज नहीं होता. आटा, गुड़, खोया और नारियल जैसी साधारण चीजें जब सही तरीके और अपनापन के साथ मिलती हैं, तो वही घर की पहचान बन जाती हैं. शायद इसी वजह से बिहार के गांवों की यह देसी मिठाई आज भी लोगों की यादों में उतनी ही ताजा है.

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Keerti Rajpoot

कीर्ति राजपूत हिंदी डिजिटल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की एक अनुभवी पत्रकार हैं. उन्हें मीडिया इंडस्ट्री में करीब 13 साल का अनुभव है. वर्तमान में वह साल 2021 से News18 हिंदी की धर्म टीम के साथ जुड़ी हैं, जहां…

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