प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 के तहत अपनी नाबालिग बेटी का स्वाभाविक अभिभावक (natural guardian) होने के नाते, पिता को उसकी कस्टडी देने से तब तक मना नहीं किया जा सकता जब तक कि यह साबित न हो जाए कि वह अभिभावक के तौर पर काम करने के लायक नहीं है।

हाई कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की डिवीजन बेंच ने प्रयागराज के वकील अभिषेक यादव की अपील को मंज़ूरी देते हुए यह बात कही। अभिषेक ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील की थी जिसमें उन्हें अपनी नाबालिग बेटी की कस्टडी देने से मना कर दिया गया था। मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 के प्रावधानों को देखते हुए, बच्चों की कस्टडी का सबसे बड़ा अधिकार पिता का होता है।   

2019 में हुई थी दंपत्ति की शादी

वकील अभिषेक यादव का विवाह 2019 में हुआ था और 2022 में दंपति की एक बेटी हुई। वर्ष 2023 में उनकी पत्नी के भाई उसे मायके ले गए। वर्ष 2024 में उनकी पत्नी की मौत हो गई। अभिषेक की पत्नी के पिता और उसके तीन भाइयों ने बच्ची की कस्टडी अभिषेक यादव को सौंपने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्होंने अदालत का रुख किया। 

नाना और मौसी के घर रह रही थी बच्ची

प्रतिवादियों ने आरोप लगाया कि अभिषेक यादव ने दहेज के लिए अपनी पत्नी को प्रताड़ित किया था और उसके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार किया था। उन्होंने यह भी कहा कि बच्ची कुछ महीनों की उम्र से ही अपने नाना के साथ रह रही है और अभिषेक के दोबारा शादी करने की संभावना है। ट्रायल कोर्ट ने यादव की याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद वह हाई कोर्ट गए। हाई कोर्ट ने गौर किया कि बच्ची बारी-बारी से अपने नाना और अपनी मौसी के साथ रह रही थी, जिनके खुद के पांच बच्चे हैं। इसलिए प्रतिवादी अकेले उसकी देखभाल नहीं कर रहे थे।

कोर्ट ने, “हालांकि हम इस बात से वाकिफ हैं कि नाबालिग बेटी को अपीलकर्ता और उसके परिवार के साथ घुलने-मिलने में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन साथ ही हम इस बात का भी ध्यान रख रहे हैं कि अगर नाबालिग बेटी को प्रतिवादियों के साथ रहने दिया जाता है, तो उसका भविष्य बहुत सुरक्षित और स्थिर नहीं दिखता है”। अदालत ने कहा, “अगर नाबालिग की कस्टडी अपील करने वाले को दी जाती है, तो बदली हुई परिस्थितियों की वजह से उसे जो मुश्किलें झेलनी पड़ सकती हैं, उनकी वजह से उसके बेहतर भविष्य की संभावनाओं को खतरे में नहीं डाला जा सकता।” इसके बाद अदालत ने अपील मंज़ूर कर ली और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे एक महीने के भीतर नाबालिग की कस्टडी अभिषेक यादव को सौंप दें। वहीं, एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसी साल अप्रैल में पत्नी से गुजारा भत्ता मांगने वाले एक पति पर 15 लाख रुपये का हर्जाना लगा दिया था। 

(पीटीआई इनपुट)

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