नई दिल्ली. फिल्म ‘एक दिन’ आमिर खान के बेटे जुनैद खान के करियर की पहली कोशिश है, जिसमें वह साउथ इंडियन सिनेमा की मशहूर एक्ट्रेस साई पल्लवी को लेकर खुद को साबित करना चाहते हैं. हालांकि, कमजोर स्क्रिप्ट की वजह से फिल्म अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाती.

कहानी
फिल्म नोएडा की एक हलचल भरी एक आईटी कंपनी से शुरू होती है, जहां दिनेश नाम का एक लड़का काम करता है. दिनेश, जिसका रोल जुनैद खान ने किया है, एक सीधा-सादा और इंट्रोवर्ट आदमी है. वह अपने काम में इतना डूबा रहता है कि ऑफिस की भीड़ में उसे खुद को पूरी तरह गायब महसूस होता है. उसी ऑफिस में मीरा नाम की एक लड़की रहती है, जिसका रोल साई पल्लवी ने किया है. दिनेश मीरा से बहुत प्यार करता है, लेकिन मीरा को इस बात का पता नहीं होता. कहानी तब नया मोड़ लेती है जब पूरी टीम को जापान की ऑफिशियल ट्रिप पर भेजा जाता है. जापान इसलिए चुना गया क्योंकि मीरा को वहां का कल्चर और बर्फ से ढके पहाड़ बहुत पसंद हैं. जापान पहुंचने के बाद, मीरा एक मेंटल और इमोशनल क्राइसिस से गुजरती है, जहां उसे ट्रांजिएंट ग्लोबल एम्नेसिया (TGA) नाम की एक रेयर कंडीशन का पता चलता है. इस कंडीशन में इंसान की याददाश्त कुछ समय के बाद धुंधली हो जाती है, जिससे उसे अगले दिन कुछ भी नया याद नहीं रहता. एक दुर्घटना के दौरान मीरा इस स्थिति में पहुंचती है, लेकिन एक दिन बाद उसे सब कुछ याद आ जाएगा और यह फिल्म इसी एक दिन की कहानी पर बेस्ड है.

एक्टिंग
इस फिल्म से हिंदी में डेब्यू कर रही साई पल्लवी अपने रोल में पूरी ईमानदारी लाती हैं. इमोशनल सीन के दौरान उनकी मासूमियत और उनकी आंखों की गहराई फिल्म के सबसे अच्छे हिस्सों में से हैं. साई पल्लवी एक वर्सेटाइल एक्ट्रेस हैं और मीरा के बेबस किरदार को जिंदा करने की पूरी कोशिश करती हैं, हालांकि स्क्रिप्ट उनके टैलेंट को एक इंडिपेंडेंट औरत के बजाय एक बेबस किरदार तक ही सीमित रखती है. जुनैद खान यहां अपनी पिछली फिल्मों के मुकाबले ज्यादा संयमित दिखते हैं. उन्होंने दिनेश के सीधे-सादे स्वभाव को अच्छे से पकड़ा है, लेकिन उनमें एक लीड एक्टर के तौर पर जरूरी स्क्रीन प्रेजेंस और करिश्मा की कमी साफ दिखती है. उनका कैरेक्टर इतना शांत है कि कभी-कभी फिल्म की स्पीड धीमी हो जाती है. फिल्म में कुणाल कपूर का भी एक छोटा सा कैमियो है, जो इंप्रेसिव है, लेकिन उन्हें करने का बहुत कम स्कोप दिया गया. कुल मिलाकर, जुनैद अभी भी एक ऐसी कहानी की तलाश में हैं जो उनकी एक्टिंग स्किल्स को पूरी तरह से दिखा सके.

डायरेक्शन
सुनील पांडे का डायरेक्शन टेक्निकली तो अच्छा लगता है, लेकिन एक लव स्टोरी के लिए जो इमोशनल डेप्थ चाहिए होती है, वह यहां मिसिंग है. डायरेक्टर ने जापानी लोकेशंस का बहुत अच्छा इस्तेमाल किया है, लेकिन वह कैरेक्टर्स के बीच के इमोशंस को दिखाने में फेल हो जाते हैं. उन्होंने एक मैजिकल लव स्टोरी बनाने की कोशिश की, लेकिन उनका डायरेक्टिंग स्टाइल 90s की घिसी-पिटी फिल्मों की याद दिलाता है जो आज की मैच्योर ऑडियंस के लिए आउटडेटेड हो गई हैं. 2026 में ऑडियंस लॉजिकल और सेंसिबल कहानियों की डिमांड करती है, लेकिन सुनील पांडे का विजन यहां थोड़ा कमजोर और आउटडेटेड लगता है. ऑडियंस फिल्म के फर्स्ट हाफ में ही क्लाइमैक्स का अंदाजा लगा लेती है, जिसे एक डायरेक्टर की स्टोरीटेलिंग स्किल्स में एक बड़ी कमी माना जाता है.

सिनेमैटोग्राफी
सिनेमैटोग्राफी पूरी फिल्म का सबसे मजबूत और सबसे दिलचस्प पहलू है. होक्काइडो की खूबसूरत घाटियां, बर्फ से ढकी सड़कें और सर्दियों की हल्की रोशनी को खूबसूरती से कैप्चर किया गया है. हर फ्रेम एक पोस्टकार्ड जैसा लगता है. फिल्म देखते हुए ऐसा लगता है जैसे हम कोई सिनेमाई कहानी नहीं, बल्कि किसी ट्रैवल एजेंसी का विज्ञापन या ट्रैवल ब्रोशर देख रहे हैं. विजुअल्स इतने शानदार हैं कि वे कमजोर कहानी से ध्यान भटका देते हैं. बर्फीले लैंडस्केप और जापानी सड़कों का चित्रण फिल्म को एक शानदार फील देता है, जो निश्चित रूप से सिनेमैटोग्राफर के हुनर ​​को दिखाता है.

कमियां
फिल्म की सबसे बड़ी और सबसे बड़ी कमी जुनैद खान और साई पल्लवी के बीच केमिस्ट्री की पूरी कमी है. एक रोमांटिक फिल्म तभी सफल होती है, जब दर्शक ऑन-स्क्रीन कपल के बीच प्यार महसूस कर सकें, लेकिन ‘एक दिन’ में जुनैद और साई पल्लवी के बीच कोई स्पार्क नहीं है. वे लवर्स से ज्यादा अजनबी लगते हैं. इसके अलावा, कहानी का बासीपन और कमजोर राइटिंग फिल्म को नीचे खींचती है. स्क्रिप्ट दिनेश को एक ‘ग्रीन फ्लैग’ यानी एक अच्छे आदमी के तौर पर दिखाने की कोशिश करती है. फिल्म की टाइमिंग भी गलत साबित होती है. अप्रैल की चिलचिलाती गर्मी में रिलीज हुई यह बर्फीली फिल्म वैलेंटाइन डे या सर्दियों के मौसम में जो ठंडक दे सकती थी, वह नहीं दे पाती.

अंतिम फैसला
फिल्म ‘एक दिन’ को अगर एक वाक्य में बयां किया जाए, तो यह बेहतरीन पैकेजिंग के अंदर एक कमजोर कहानी की तरह है. निर्देशक सुनील पांडे ने जापान की बर्फीली वादियों और होक्काइडो की खूबसूरत गलियों के जरिए फिल्म को एक विजुअल ट्रीट बनाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन फिल्म की रूह यानी उसकी ‘लिखावट’ इतनी कमजोर है कि भव्य लोकेशन्स भी इसे डूबने से नहीं बचा पातीं. अगर आपके टाइम पास करना चाहते हैं, तो आप इसे देख सकते हैं. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 2 स्टार.



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