‘मी नो पॉज मी प्ले’ भारतीय सिनेमा में उन फिल्मों में शामिल होती है जो समाज के संवेदनशील विषयों को न केवल छूती हैं, बल्कि उन्हें मुख्यधारा की चर्चा में भी लाती हैं. पहली बार मेनोपॉज जैसे मुद्दे को इतने वास्तविक, भावनात्मक और जिम्मेदार तरीके से दिखाया गया है. फिल्म की कहानी डॉली खन्ना (काम्या पंजाबी) के जीवन के बदलते चरण को केंद्र में रखती है- जहां उसकी दुनिया, रिश्ते और आत्मविश्वास एक बड़े शारीरिक बदलाव के साथ उलट-पुलट होने लगते हैं.

डॉली का पति, रजत खन्ना, जिसे मनोज कुमार शर्मा ने निभाया है, इस फिल्म की रीढ़ की हड्डी जैसा किरदार है. जहां डॉली का संघर्ष भावनात्मक है, वहीं रजत ने कहानी के अनुरूप अभिनय किया है. आम दर्शक पहले उनसे नाराज हो सकता है, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म बढ़ेगी उनकी अदाकारी पसंद आएगी. डॉक्टर जसमोना (दिपशिखा नागपाल) इस यात्रा में एक मार्गदर्शक की तरह उभरती हैं, जो डॉली और रजत दोनों को इस कठिन दौर से निकलने में मदद करती हैं.

यही नहीं कहानी में एक त्रिकोणीय प्रेम एंगल भी अलग देखने को मिलेगा जो दर्शकों में आखिर तक उत्सुकता बनाए रखेगा. फिल्म की सबसे खास बात है मनोज कुमार शर्मा का मल्टी-डायमेंशनल योगदान. वे न सिर्फ निर्माता हैं, बल्कि अभिनेता के रूप में फिल्म के भावनात्मक भार को भी संतुलित करते हैं. उनका किरदार रजत खन्ना सिर्फ एक पति नहीं, बल्कि एक ऐसा साथी है जो अपनी पत्नी की बदलती परिस्थितियों को समझने की कोशिश करता है, सीखता है, गलती करता है, फिर आगे बढ़ता है.

उनकी परफॉर्मेंस शांत, परिपक्व और बहुत वास्तविक है.ऐसी कि दर्शक खुद को उनकी जगह महसूस कर सकते हैं. निर्माता के तौर पर मनोज शर्मा ने जिस संवेदनशील विषय को कैमरे पर लाने का साहस दिखाया है, वह काबिल-ए-तारीफ है. कहानी को जिस संतुलन, ईमानदारी और रिसर्च के साथ गढ़ा गया है, उसमें उनका गहरा योगदान साफ झलकता है. समर के मुखर्जी ने एक चुनौतीपूर्ण विषय को सरल भाषा और मजबूत विजुअल स्टोरीटेलिंग के साथ परदे पर उतारा है.
उन्होंने मनोज शर्मा की दृष्टि को बखूबी एक सिनेमेटिक अनुभव में बदल दिया.

फिल्म आपको शुरुआत से बांधे रखती है, क्योंकि हर सीक्वेंस दर्शक को किसी न किसी भावनात्मक स्तर पर छूने की कोशिश करता है. एक्टिंग की बात करें तो काम्या पंजाबी का दमदार, भावुक और बेहद वास्तविक प्रदर्शन देखने को मिलता है. मनोज कुमार शर्मा का संजीदा, संतुलित और गहराई से भरा अभिनय, जो कहानी में एक स्थिर एंकर का काम करते हैं. दिपशिखा नागपाल डॉक्टर जसमोना के रूप में प्रभावशाली और मैच्योर लगती हैं. सह कलाकारों का अभिनय भी स्वाभाविक और कहानी को समर्थन देने वाला है.

संगीत कहानी की संवेदनशीलता को बरकरार रखते हुए भावनाओं को ऊंचाई देता है. बैकग्राउंड स्कोर कई दृश्यों को और प्रभावी बनाता है. यह फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक विचार है-कि महिलाओं के इस जीवन चरण को समझा जाए, स्वीकारा जाए और उसके बारे में खुलकर बात की जाए. मनोज कुमार शर्मा की विजन, अभिनय और निर्माण की तीनों भूमिकाएं फिल्म को एक खास गहराई देती हैं. बस फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी रफ्तार है. फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा स्लो है, जो कहानी को धीमा कर देता है, लेकिन सेकंड हाफ आते ही फिल्म अपनी गति में वापस लौट आती है. अगर आप कंटेंट-ड्रिवन, सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्मों को पसंद करते हैं, तो मी नो पॉज मी प्ले निश्चित रूप से आपकी पसंद बनेगी. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3 स्टार.



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