Last Updated:

Rohat Famous Mogar Kachori Recipe: पाली जिले के रोहट की मोगर कचौरी पिछले 57 वर्षों से शुद्धता और स्वाद का प्रतीक बनी हुई है. इसकी शुरुआत 1968 में मांगीलाल प्रजापत ने एक ट्रक ड्राइवर की विशेष मांग पर की थी, जिसे सफर के दौरान लंबे समय तक चलने वाले नाश्ते की जरूरत थी. इस कचौरी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं होता, जिसके कारण यह भीषण गर्मी में भी अगले दिन तक खराब नहीं होती. आज मांगीलाल की तीसरी पीढ़ी इस विरासत को संभाल रही है और दादाजी की ‘सीक्रेट’ रेसिपी का पालन कर रही है. कचौरी बनाने के लिए मूंगफली के तेल और नागौर की खास हरी मेथी का इस्तेमाल किया जाता है. मूंग दाल को बारीक पीसकर मसाले तैयार किए जाते हैं ताकि यह पेट के लिए हल्की रहे.

ख़बरें फटाफट

पाली. राजस्थान की तपती सड़कों पर जब पारा 45 डिग्री के पार चला जाता है, तब हाईवे पर दौड़ने वाले ट्रक ड्राइवरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती खाने की होती है. केबिन की झुलसा देने वाली गर्मी और लंबी दूरी के सफर के बीच उन्हें एक ऐसे नाश्ते की तलाश रहती है जो सस्ता, स्वादिष्ट और सबसे महत्वपूर्ण—जल्दी खराब न होने वाला हो. यही वजह है कि पाली-जोधपुर हाईवे पर स्थित ‘रोहट’ कस्बा आज ट्रक ड्राइवरों के लिए एक अनिवार्य पड़ाव बन चुका है. यहाँ की मशहूर ‘मोगर कचौरी’ न केवल भूख मिटाती है, बल्कि ड्राइवरों के अगले दिन के सफर का बैकअप भी बनती है.

रोहट कचौरी की शुरुआत की कहानी किसी फिल्म के किस्से से कम नहीं है. आज से करीब 57 साल पहले, मूल रूप से जोधपुर के रहने वाले मांगीलाल प्रजापत रोहट में एक छोटी सी चाय की थड़ी चलाते थे. साल 1968 की एक दोपहर, एक ट्रक ड्राइवर ने उनसे गुजारिश की कि वे चाय के साथ कुछ ऐसा नाश्ता रखें जो पेट भर सके और सफर में खराब न हो. इसी मांग ने मांगीलाल को सोचने पर मजबूर किया और उन्होंने एक खास कचौरी तैयार की, जिसकी कीमत उस समय मात्र 2 आना थी. शुरुआत में भले ही दिन भर में 4-5 कचौरियां बिकती थीं, लेकिन आज इसके स्वाद ने रोहट को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला दी है.

बिना प्याज-लहसुन का ‘सीक्रेट’ मसाला
इस कचौरी की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खूबी यह है कि इसमें प्याज और लहसुन का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाता. यही मुख्य कारण है कि यह कचौरी भीषण गर्मी और उमस के बावजूद अगले दिन तक एकदम ताजी बनी रहती है. मांगीलाल के बाद उनके पुत्र प्रहलाद प्रजापत और अब उनकी तीसरी पीढ़ी—सुनील, तुलसीराम और विनोद—इस विरासत को बखूबी संभाल रहे हैं. परिवार आज भी दादाजी द्वारा तय किए गए मसालों के अनुपात और शुद्धता के मानकों का कड़ाई से पालन करता है.

शुद्धता और बनाने का अनूठा तरीका
स्वाद को बरकरार रखने के लिए यहाँ आज भी केवल उत्तम दर्जे के मूंगफली के तेल का उपयोग किया जाता है. खास बात यह है कि तेल को कभी भी दोबारा (Reuse) इस्तेमाल नहीं किया जाता, जो इसे स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतर बनाता है. आमतौर पर कचौरियों में साबुत दाल होती है, लेकिन रोहट की कचौरी में मोगर (मूंग दाल) को बारीक पीसकर डाला जाता है. खुशबू के लिए खास तौर पर नागौर की प्रसिद्ध हरी मेथी का उपयोग किया जाता है और गरम मसालों से परहेज किया जाता है, ताकि यह पेट पर भारी न पड़े. आज यह कचौरी न केवल हाईवे के मुसाफिरों, बल्कि विदेशों में रहने वाले प्रवासियों की भी पहली पसंद बन चुकी है.

About the Author

vicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with News18 Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें



Source link

Write A Comment