नई दिल्ली. डायरेक्टर अभिषेक डोगरा की फिल्म ‘जीवन या भीमा कोन?’, जो 4 सितंबर 2026 को थिएटर में रिलीज हो रही है, वो क्राइम, कॉमेडी और कन्फ्यूजन का एक मजेदार कॉकटेल पेश करती है. ‘डॉली की डोली’ जैसी हल्की-फुल्की कॉमेडी थ्रिलर बनाने वाले अभिषेक डोगरा ने इस बार डबल कैरेक्टर, कर्ज के दबाव, गलत पहचान और डायमंड स्मगलिंग का ऐसा जाल बुना है जो दर्शकों को जरूर हंसाएगा. इस फिल्म में अरशद वारसी एक बार फिर अपनी सिग्नेचर कॉमिक टाइमिंग से सबका दिल जीत लेते हैं.

कहानी
फिल्म जीवन (अरशद वारसी) और उसकी पत्नी (संजीदा शेख) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक बड़े फाइनेंशियल संकट और भारी कर्ज के बोझ से बहुत परेशान हैं. यह कपल अपनी रोजमर्रा की मुश्किलों से निकलने का रास्ता लगातार ढूंढता रहता है. कहानी में असली मोड़ तब आता है जब ‘भीमा’ (अरशद वारसी का दूसरा अवतार) उनकी जिंदगी में आता है. भीमा तो बिल्कुल जीवन जैसा दिखता है, लेकिन उसका नेचर और दुनिया बिल्कुल अलग है. गलत पहचान और डबल स्टैंडर्ड की इस भूलभुलैया में पैसा, इंसानी लालच और क्राइम उलझ जाते हैं. ट्विस्ट तब और भी दिलचस्प और रोमांचक हो जाते हैं जब एक बड़ा इंटरनेशनल डायमंड स्मगलिंग रैकेट आपस में जुड़ जाता है. एक तरफ पुलिस का डर है, तो दूसरी तरफ बेरहम क्रिमिनल्स का नेटवर्क है. इन दोनों के बीच फंसा यह कपल कैसे अपनी जान बचाता है और इस डायमंड गेम से खुद को निकालता है, यही फिल्म के सस्पेंस और कॉमेडी का सेंट्रल थीम है.

एक्टिंग
अरशद वारसी फिल्म की सबसे मजबूत बैकबोन और जान हैं. जिस आसानी से उन्होंने ‘जीवन’ के सीधे-सादे, डरपोक पति और ‘भीम’ के बेफिक्र, चालाक और लापरवाह किरदार को निभाया है. वह तारीफ के काबिल है. उनकी कॉमिक टाइमिंग, चेहरे के हाव-भाव और सटीक डायलॉग डिलीवरी हर सीन में जान डाल देती है. इमोशनल सीन में भी वह अपनी मैच्योरिटी साबित करते हैं. संजीदा शेख ने जीवन की पत्नी के रूप में शानदार और प्रभावशाली परफॉर्मेंस दी है. उनका रोल सिर्फ एक ग्लैमरस डॉल या साइडकिक नहीं है. वह कहानी की अहम घटनाओं को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं. विजय राज अपने खास अनोखे स्टाइल से कॉमिक और क्राइम टोन को एक नए लेवल पर ले जाते हैं. उनकी हर एंट्री थिएटर में हंसी लाती है. इसके अलावा पूजा चोपड़ा और अनुभवी एक्टर बृजेंद्र काला ने अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है. बृजेंद्र काला की डायलॉग डिलीवरी फिल्म के हल्के-फुल्के, अफरा-तफरी वाले माहौल को और बढ़ा देती है.

डायरेक्शन
डायरेक्टर अभिषेक डोगरा सिटकॉम और क्राइम को मिलाने में अपनी महारत के लिए जाने जाते हैं. ‘जीवन या भीमा कौन?’ में उन्होंने किरदारों के बीच पैदा होने वाली गलतफहमियों का शानदार इस्तेमाल किया है. उनका डायरेक्शन फिल्म को एक भारी-भरकम, सीरियस क्राइम ड्रामा बनने से रोकता है और इसे एक फैमिली-फ्रेंडली एंटरटेनर बनाए रखता है. अभिषेक ने पूरी कहानी में उथल-पुथल और ह्यूमर का शानदार बैलेंस बनाया है. जिस तरह से उन्होंने डायमंड स्मगलिंग जैसे सीरियस मुद्दे को दो एक जैसे जुड़वां बच्चों की कॉमेडी के साथ बुना है, उसके लिए वह तारीफ के काबिल हैं. हालांकि, अगर दूसरे हाफ के कुछ हिस्सों में डायरेक्शन और कसा होता, तो फिल्म का ओवरऑल इम्पैक्ट और भी दमदार हो सकता था.

सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी कहानी के मूड से पूरी तरह मेल खाती है. सिनेमैटोग्राफर ने फिल्म के कलर पैलेट को ब्राइट, वाइब्रेंट और कलरफुल रखा है, जिससे हर फ्रेम फ्रेश और एंटरटेनिंग लगता है. खासकर अरशद वारसी के स्प्लिट-स्क्रीन सीक्वेंस में सिनेमैटोग्राफी और VFX का काम इतना बारीकी से किया गया है कि कोई टेक्निकल कमी नजर नहीं आती. दोनों किरदारों (जीवन और भीम) के एक ही फ्रेम में आमने-सामने वाले सीन काफी नेचुरल लगते हैं. दौड़ने और पीछा करने वाले सीन के दौरान डायनामिक कैमरा एंगल का इस्तेमाल किया गया है, जो फिल्म की पेस बनाए रखने में मदद करते हैं.

म्यूजिक
फिल्म का म्यूजिक इसकी पेस बनाए रखने में अहम रोल निभाता है. गाने ज्यादा लंबे या जबरदस्ती के नहीं लगते, बल्कि वे कहानी के फ्लो के साथ बहते हैं. ‘जीवन या भीमा कौन?’ का बैकग्राउंड स्कोर हर कॉमिक और सस्पेंस वाले सीन का पंच दोगुना कर देता है. फिल्म के कुछ प्रमोशनल और डांस ट्रैक काफी थिरकाने वाले हैं, जो थिएटर से निकलने के बाद भी आपके दिमाग में रहते हैं. गानों की कोरियोग्राफी में अरशद वारसी के सिग्नेचर डांस मूव्स का बहुत अच्छा इस्तेमाल किया गया है, जिससे दर्शकों का भरपूर मनोरंजन होता है.

कमियां
अपनी कई खूबियों के बावजूद, फिल्म में कुछ बड़ी कमियां भी हैं. सबसे बड़ी कमी इसका स्क्रीनप्ले है. पहले हाफ की तुलना में दूसरे हाफ में कहानी कुछ जगहों पर बहुत ज्यादा मुश्किल लगती है. क्लाइमैक्स से ठीक पहले, कुछ सीन ऐसे हैं जो कहानी को बेवजह खींचते हुए लगते हैं, जिससे फिल्म की स्पीड थोड़ी धीमी हो जाती है. इसके अलावा, डायमंड स्मगलिंग सबप्लॉट को कुछ जगहों पर और लॉजिकल या बेहतर तरीके से दिखाया जा सकता था. कुछ जगहों पर सिनेमैटिक लिबर्टी पर थोड़ा ज्यादा भरोसा किया गया है, जहां लॉजिक लड़खड़ा जाता है. अगर एडिटिंग थोड़ी और टाइट होती, तो फिल्म और भी शार्प होती.

अंतिम फैसला
कुल मिलाकर, ‘जीवन या भीमा कौन?’ भले ही ऑस्कर-लेवल की सिनेमा न हो, लेकिन यह अपने मेन मकसद में कामयाब होती है… ऑडियंस का पूरा मनोरंजन करना. अरशद वारसी का डबल रोल, उनकी टाइमलेस कॉमिक टाइमिंग, विजय राज का मजेदार स्टाइल और यह डायमंड-स्मगलिंग की कहानी आपको शुरू से आखिर तक हंसाती रहती है. अगर आप इस वीकेंड कोई हल्की-फुल्की, मजेदार, क्राइम-कॉमेडी ढूंढ रहे हैं, न कि कुछ भारी या दिमागी तौर पर थका देने वाली, तो अरशद वारसी की बड़े पर्दे की यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.



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